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पश्चिम एशिया के तनाव का असर भारत की सप्लाई चेन पर

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पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव अब भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाने वाली ‘सप्लाई चेन’ के लिए गंभीर खतरा पैदा करने लगा है. पिछले कुछ दिनों में खाड़ी क्षेत्र के प्रमुख ऊर्जा और लॉजिस्टिक्स केंद्रों पर हुए मिसाइल और ड्रोन हमलों ने हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से होने वाली तेल और गैस की सप्लाई रुकने का डर बढ़ा दिया है. यह रास्ता दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा गलियारों में से एक है.

भारत अपनी जरूरतों के लिए कच्चे तेल, एलएनजी (गैस), उर्वरक और औद्योगिक कच्चे माल के लिए भारी मात्रा में इस क्षेत्र पर निर्भर है. ऐसे में यहां होने वाली छोटी सी रुकावट भी भारत में ईंधन की कीमतों, खेती की लागत, मैन्युफैक्चरिंग खर्च और निर्यात उद्योगों पर गहरा असर डाल सकती है. यह स्थिति पश्चिम एशिया के व्यापारिक रास्तों पर भारत की आर्थिक निर्भरता को भी उजागर करती है.

ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) की एक संक्षिप्त रिपोर्ट के अनुसार, खाड़ी क्षेत्र में हो रहे हमलों ने दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक, हॉर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए होने वाली तेल और गैस की सप्लाई रुकने का डर बढ़ा दिया है. 1 से 3 मार्च के बीच सऊदी अरब, कतर, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और ओमान में प्रमुख केंद्रों को निशाना बनाया गया.

इन हमलों से सऊदी अरब का रास तनुरा तेल टर्मिनल, कतर के रास लफान और मेसैद स्थित LNG केंद्र, यूएई के फुजैराह में ईंधन भंडारण और ओमान के दुक्म और सलालाह बंदरगाह प्रभावित हुए हैं. टैंकरों के लिए बढ़ते जोखिम के कारण शिपमेंट में देरी हो रही है और उत्पादन भी प्रभावित हुआ है. रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि इन हालातों से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को बड़ा झटका लग सकता है.

आंकड़ों के अनुसार, साल 2025 में भारत ने पश्चिम एशिया से 98.7 अरब डॉलर का सामान आयात किया, जो इस क्षेत्र को ऊर्जा, उर्वरक और औद्योगिक कच्चे माल के लिए भारत का एक बेहद महत्वपूर्ण आपूर्तिकर्ता बनाता है. इस क्षेत्र में छह खाड़ी देशों (बहरीन, कुवैत, ओमान, कतर, सऊदी अरब, यूएई) के साथ-साथ ईरान, इराक, इजरायल, जॉर्डन, लेबनान, सीरिया और यमन जैसे देश शामिल हैं.

तेल और एलएनजी आपूर्ति में बाधा

GTRI के संस्थापक अजय श्रीवास्तव ने कहा कि सबसे बड़ी चुनौती पेट्रोलियम क्षेत्र में है. साल 2025 में भारत ने पश्चिम एशिया से लगभग 70 अरब डॉलर का पेट्रोलियम कच्चा तेल और उससे जुड़े उत्पाद आयात किए. इसमें सबसे बड़ा हिस्सा कच्चे तेल का था. 2025 में भारत ने इस क्षेत्र से 50.8 अरब डॉलर का कच्चा तेल खरीदा, जो उसके कुल तेल आयात का 48.7 प्रतिशत है.

यह कच्चा तेल भारत की रिफाइनरियों के लिए जरूरी है, जहां पेट्रोल, डीजल, हवाई ईंधन और पेट्रोकेमिकल उत्पाद बनते हैं. भारत के पास लगभग 30 दिनों का स्टॉक है, लेकिन अगर सप्लाई में लंबे समय तक रुकावट आती है, तो ईंधन की कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं, जिससे परिवहन लागत और महंगाई बढ़ेगी. इसका असर किसानों पर भी पड़ेगा क्योंकि सिंचाई पंपों और ट्रैक्टरों के लिए डीजल महंगा हो जाएगा.

उनके अनुसार, प्राकृतिक गैस की आपूर्ति पर भी ऐसा ही खतरा मंडरा रहा है. 2025 में भारत ने पश्चिम एशिया से 9.2 अरब डॉलर की एलएनजी आयात की, जो उसके कुल एलएनजी आयात का 68.4 प्रतिशत है. एलएनजी का उपयोग खाद कारखानों, गैस आधारित बिजलीघरों और सिटी गैस नेटवर्क (CNG और पाइप वाली रसोई गैस) में किया जाता है. इसका असर दिखने भी लगा है. जहाजों की आवाजाही पर लगी पाबंदियों के कारण कतर की पेट्रोनेट एलएनजी ने 4 मार्च, 2026 से गेल को एलएनजी की आपूर्ति बंद कर दी है.

एलपीजी और उर्वरक पर संकट

रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने साल 2025 में पश्चिम एशिया से 13.9 अरब डॉलर मूल्य की एलपीजी (LPG) आयात की, जो उसके कुल एलपीजी आयात का 46.9 प्रतिशत है. करोड़ों परिवारों के लिए एलपीजी आज भी खाना पकाने का मुख्य ईंधन है. भारत के पास वर्तमान में लगभग दो सप्ताह की खपत के बराबर स्टॉक है, ऐसे में आपूर्ति में कोई भी रुकावट रसोई गैस की उपलब्धता को तुरंत प्रभावित कर सकती है.

पेट्रोलियम से जुड़े अन्य आयात भी इससे प्रभावित होंगे. भारत ने पश्चिम एशिया से 1.9 अरब डॉलर का रिफाइंड ईंधन (कुल आयात का 19.7%) और 1.3 अरब डॉलर का पेट्रोलियम कोक (कुल आयात का 37.3%) आयात किया. पेट्रोलियम कोक का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल सीमेंट प्लांट, एल्युमीनियम स्मेल्टर और बिजली उत्पादन में ईंधन के रूप में किया जाता है. इसकी कमी से इन क्षेत्रों में उत्पादन लागत बढ़ जाएगी, जिससे निर्माण और इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं की गति धीमी हो सकती है.

पश्चिम एशिया पर भारत की गहरी निर्भरता

कुल आयात: 2025 में भारत ने पश्चिम एशिया से 98.7 अरब डॉलर का सामान आयात किया.

महत्वपूर्ण क्षेत्र: पश्चिम एशिया ऊर्जा (ईंधन), उर्वरक (खाद) और औद्योगिक कच्चे माल का प्रमुख आपूर्तिकर्ता है.

पेट्रोलियम: भारत का 70 अरब डॉलर का पेट्रोलियम आयात इसी क्षेत्र (हॉर्मुज जलडमरूमध्य) से आता है.

स्टॉक की स्थिति: भारत के पास कच्चे तेल का स्टॉक केवल 30 दिनों से कम की खपत के लिए है.

LNG (गैस): भारत की कुल एलएनजी (LNG) का 68.4% हिस्सा पश्चिम एशिया से आता है.

सप्लाई में बाधा: संकट के कारण 4 मार्च, 2026 से गेल (GAIL) को मिलने वाली एलएनजी सप्लाई शून्य हो गई है.

रसोई गैस: भारत की 47% एलपीजी का आयात इसी क्षेत्र से होता है.

उर्वरक: भारत ने इस क्षेत्र से 3.7 अरब डॉलर के उर्वरक आयात किए.

हीरा उद्योग: भारत के 40.6% कच्चे हीरे पश्चिम एशिया से आते हैं.

प्लास्टिक कच्चा माल: भारत के कुल पॉलीइथाइलीन आयात का एक-तिहाई हिस्सा खाड़ी देशों से आता है.

निर्माण सामग्री: भारत के 60% से अधिक चूना पत्थर, गंधक और जिप्सम का आयात पश्चिम एशिया से होता है.

खेती और उर्वरक पर क्या होगा असर

रिपोर्ट के अनुसार, इस संकट का असर उर्वरकों की आपूर्ति के जरिए भारत के कृषि क्षेत्र तक भी पहुंच सकता है. आंकड़ों से पता चलता है कि साल 2025 में भारत ने पश्चिम एशिया से लगभग 3.7 अरब डॉलर मूल्य के उर्वरकों का आयात किया. इसमें 2.2 अरब डॉलर के मिश्रित उर्वरक और 1.5 अरब डॉलर के नाइट्रोजन उर्वरक शामिल थे, जो भारत के कुल आयात का क्रमशः 31.1% और 30.3% हिस्सा हैं.

रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि फसल के सीजन के दौरान आपूर्ति में रुकावट आने से खाद की किल्लत हो सकती है, जिससे सरकार पर सब्सिडी का बोझ बढ़ेगा और खाद्य पदार्थों (राशन) की कीमतें भी ऊपर जा सकती हैं.

निर्यात और कच्चा माल

रिपोर्ट के अनुसार, भारत का हीरा निर्यात उद्योग भी खाड़ी देशों की आपूर्ति पर निर्भर है. पिछले वर्ष (2025) में, भारत ने पश्चिम एशिया से 6.8 अरब डॉलर मूल्य के कच्चे हीरे आयात किए, जो कुल आयात का 40.6 प्रतिशत है. इन हीरों को भारत के हीरा कटिंग और पॉलिशिंग केंद्रों, विशेष रूप से गुजरात के सूरत में तराशा जाता है, जहां से पॉलिश किए हुए हीरे वैश्विक बाजारों में भेजे जाते हैं. कच्चे हीरों की शिपमेंट में किसी भी रुकावट से उत्पादन धीमा हो सकता है और आभूषण क्षेत्र में रोजगार प्रभावित हो सकता है.

खाड़ी देशों से आने वाले कई औद्योगिक कच्चे माल भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं. भारत ने पश्चिम एशिया से 1.2 अरब डॉलर मूल्य के पॉलीइथाइलीन पॉलिमर का आयात किया, जो इस प्लास्टिक फीडस्टॉक के कुल आयात का 35.6 प्रतिशत है. पॉलीइथाइलीन का उपयोग पैकेजिंग सामग्री, प्लास्टिक पाइप, कंटेनर, उपभोक्ता वस्तुओं और सिंचाई में इस्तेमाल होने वाली कृषि फिल्मों में बड़े पैमाने पर किया जाता है. इसकी कमी से पैकेजिंग उद्योग और उपभोक्ता वस्तुओं के निर्माण में बाधा आ सकती है.

निर्माण और धातु क्षेत्र

निर्माण क्षेत्र भी इस क्षेत्र से होने वाले खनिज आयात पर निर्भर है. भारत ने पश्चिम एशिया से 483 मिलियन डॉलर का चूना पत्थर आयात किया, जो उसके कुल आयात का 68.5 प्रतिशत है. चूना पत्थर सीमेंट उत्पादन के लिए एक मुख्य सामग्री है, जिसकी कमी से सीमेंट की कीमतें बढ़ सकती हैं और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में देरी हो सकती है.

अन्य खनिज भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं. भारत ने इस क्षेत्र से 420 मिलियन डॉलर का गंधक आयात किया, जो कुल आयात का 65.8% है. इसका उपयोग सल्फ्यूरिक एसिड बनाने में होता है, जो उर्वरक और रासायनिक उद्योगों के लिए अनिवार्य है. इसके अलावा, 129 मिलियन डॉलर का जिप्सम (Gypsum) भी आयात किया गया, जो सीमेंट और निर्माण सामग्री में बड़े पैमाने पर उपयोग होता है.

धातुओं की सप्लाई चेन भी इसी क्षेत्र से जुड़ी है. भारत ने स्टील बनाने के लिए ज़रूरी 190 मिलियन डॉलर का डायरेक्ट रिड्यूस्ड आयरन (DRI) और बिजली ट्रांसमिशन व नवीकरणीय ऊर्जा के लिए उपयोग होने वाला 869 मिलियन डॉलर का तांबे का तार यहां से आयात किया.

अजय श्रीवास्तव ने कहा कि ये आंकड़े बताते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था पश्चिम एशिया की सप्लाई चेन से कितनी गहराई से जुड़ी है. यदि हॉर्मुज जलडमरूमध्य के माध्यम से शिपिंग में एक सप्ताह से अधिक की बाधा आती है, तो इसका असर ऊर्जा बाजार से फैलकर खाद, मैन्युफैक्चरिंग, निर्माण सामग्री और हीरा जैसे निर्यात उद्योगों तक पहुंच सकता है.

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