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माटी से जुड़ा कर्मयोगी मौन हो गया

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सुनील गंगराडे।

किसान की बेहतरी, किसानी की चिंता और जैविक खेती को अपने जीवन की साधना मानने वाले भूमिपुत्र डॉ. गोपाल सिंह कौशल- जिन्हें स्नेहपूर्वक ‘कौशल साहब’ कहा जाता था-12 जनवरी 2026 को अनंत में विलीन हो गए। 82 वर्ष की आयु में उन्होंने ऐसा भरपूर जीवन जिया, जो पूरी तरह कृषि, किसान और समाज को समर्पित रहा।

मृदा विज्ञान में पीएचडी डॉ. कौशल जब खेत की माटी को स्पर्श करते थे, तो वह उनके लिए केवल मिट्टी नहीं होती थी; वह एक जीवंत संवाद का माध्यम बन जाती थी। यही कारण था कि उनकी सोच, सलाह और नीतियाँ काग़ज़ी नहीं, बल्कि खेत और किसान की ज़मीन से जुड़ी होती थीं।

मध्य प्रदेश कृषि विभाग के संचालक  के रूप में तथा कृषि विस्तार विशेषज्ञ की भूमिका में डॉ. कौशल ने प्रशासन और किसान के बीच की दूरी को पाटा। वे ऐसे अधिकारी थे, जिन्होंने पद को नहीं, बल्कि उद्देश्य को प्राथमिकता दी। उनका मानना था कि खेती केवल उत्पादन का साधन नहीं, बल्कि जीवन-पद्धति है और किसान को उसकी मेहनत का पूरा लाभ मिलना चाहिए।

डॉ. कौशल देश में जैविक खेती के शुरुआती और प्रभावशाली प्रवर्तकों में रहे। उन्होंने न केवल जैविक खेती की अलख जगाई, बल्कि मुख्यमंत्री से लेकर ग्राम स्तर तक के कृषि अधिकारियों को इस अभियान से जोड़ा। शीर्षस्थ अधिकारी हों, अधीनस्थ कर्मचारी हों या कृषि-आदान कंपनियों के प्रतिनिधि—सभी को एक मंच पर लाने का अद्भुत कौशल उन्हीं का था।

आज जिस पारंपरिक -प्राकृतिक खेती पर विमर्श दिल्ली से लेकर दमोह तक हो रहा है ,वह तीन दशक पहले डॉ कौशल जैविक खेती के लिए शुरू कर चुके थे । उनके नेतृत्व में ‘कृषक जगत’ द्वारा वर्ष 2002 में भोपाल के बिट्टन मार्केट में देश का पहला जैविक हाट आयोजित किया गया। शहर के मध्य इस प्रकार के किसान मेले का आयोजन उनकी दूरदृष्टि का परिचायक था। उनका उद्देश्य था कि शहरी समाज, विशेष रूप से अभिजात्य वर्ग, यह समझे कि जैविक खेती और उसके उत्पाद किस प्रकार जीवन को स्वस्थ और बेहतर बना सकते हैं। यहीं से प्रदेश में जैविक आंदोलन ने संगठित रूप लिया।

एक आंदोलन के रूप में शुरू हुए इस नवाचार को अनेक विरोधों और अवरोधों का सामना करना पड़ा, किंतु डॉ. कौशल की युगदृष्टा सोच और अटूट संकल्प के आगे ये बाधाएँ टिक न सकीं। आज जैविक खेती को देश और प्रदेश की सरकारों ने अपनी प्राथमिकताओं में शामिल किया है—यह उनकी दूरगामी दृष्टि का प्रतिफल है| मन्दिरों के निर्माल्य पुष्प का उपयोग खाद के रूप में करने का  नवाचार भी आपने 25 वर्ष पहले ही शुरू कर दिया था ।

डॉ. कौशल आधुनिक तकनीक और परंपरागत ज्ञान के संतुलन के पक्षधर थे। उनका विश्वास था कि वैज्ञानिक नवाचारों के साथ-साथ किसान को उसकी उपज का उचित मूल्य मिलना ही सच्ची कृषि प्रगति है। राष्ट्रीय स्तर पर प्राप्त अनेक कृषि उत्पादकता पुरस्कारों को उन्होंने व्यक्तिगत उपलब्धि न मानकर मध्य प्रदेश के किसानों को समर्पित किया।

जीवन के अंतिम दिनों तक वे कृषि विषयों पर सक्रिय रहे। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के माध्यम से वे लगातार अपने विचार साझा करते रहे और मीडिया जगत के लिए सदा उपलब्ध रहे। उनके साथ मेरी कृषि पत्रकार के रूप में शुरू हुई मुलाकातें कब पारिवारिक आत्मीयता में बदल गईं, इसका अहसास ही नहीं हुआ। लोगों को जोड़ने की कला में वे माहिर थे। यह संबंध तीन दशकों से भी अधिक समय तक बना रहा।

जब-जब जैविक खेती की चर्चा होगी, कौशल साहब के जोश, जुनून और जज़्बे का स्मरण स्वाभाविक रूप से होगा। वे भले ही देह रूप में हमारे बीच नहीं हैं, पर उनकी सोच और दृष्टि जैविक खेती के ज्योति-पुंज के रूप में कृषि जगत को सदैव आलोकित करती रहेगी। ऐसे महामानव को सादर नमन

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