बंगाल में नए पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) की नियुक्ति को लेकर राज्य सरकार और संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) के बीच कानूनी गतिरोध पैदा हो गया है। वर्तमान डीजीपी राजीव कुमार का कार्यकाल 31 जनवरी को समाप्त हो रहा है, लेकिन उनके उत्तराधिकारी के चयन की प्रक्रिया अधर में लटक गई है।
यूपीएससी ने राज्य सरकार द्वारा भेजी गई वरिष्ठ आइपीएस अधिकारियों की सूची को तकनीकी और कानूनी आधार पर वापस लौटाते हुए स्पष्ट किया है कि इस मामले में अब सुप्रीम कोर्ट की अनुमति अनिवार्य है।
विवाद की मुख्य जड़ नियमों का उल्लंघन और समय सीमा का पालन न करना है। यूपीएससी के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के 2018 के दिशा-निर्देशों के तहत किसी भी राज्य में ‘कार्यवाहक’ डीजीपी की नियुक्ति पर रोक है और नए चयन की प्रक्रिया वर्तमान डीजीपी के रिटायर होने से तीन महीने पहले शुरू हो जानी चाहिए थी। राज्य सरकार को यह पैनल सितंबर 2025 तक भेज देना चाहिए था, जिसमें देरी हुई।
इसके अलावा, दिसंबर 2023 में मनोज मालवीय की सेवानिवृत्ति के बाद राजीव कुमार को सीधे ‘कार्यवाहक डीजीपी’ बनाने के फैसले को भी आयोग ने नियमों के विरुद्ध माना है। यूपीएससी के निदेशक नंद किशोर कुमार ने बंगाल की मुख्य सचिव नंदिनी चक्रवर्ती को पत्र लिखकर सूचित किया है कि पिछली प्रक्रियाओं में रही खामियों के कारण वर्तमान सूची पर विचार नहीं किया जा सकता। आयोग ने इस विषय पर भारत के अटार्नी जनरल से भी परामर्श किया था, जिन्होंने यूपीएससी के रुख का समर्थन करते हुए राज्य सरकार को कोर्ट जाने की सलाह दी है।
इस घटनाक्रम से प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मच गया है क्योंकि 31 जनवरी के बाद पुलिस विभाग में नेतृत्व का शून्य पैदा होने का खतरा है। अब ममता सरकार के पास सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है। यदि समय रहते कानूनी अड़चनें दूर नहीं हुईं, तो राज्य पुलिस के शीर्ष पद पर नियुक्ति की प्रक्रिया लंबी खिंच सकती है, जो कानून-व्यवस्था के प्रबंधन के लिए एक बड़ी चुनौती साबित होगी।
मुख्य आपत्ति यह है कि जब दिसंबर 2023 में तत्कालीन डीजीपी मनोज मालवीय रिटायर हुए, तो राज्य ने स्थायी पैनल बनाने के बजाय राजीव कुमार को कार्यवाहक डीजीपी बना दिया। यूपीएससी का तर्क है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार “कार्यवाहक” नियुक्त करना ही गलत था।
अब जब राजीव कुमार का कार्यकाल खत्म हो रहा है, तो राज्य फिर से उसी प्रक्रिया को दोहराना चाहता है जिसे शुरुआत में ही गलत तरीके से लागू किया गया था। आयोग का मानना है कि चूंकि प्रक्रिया की शुरुआत (दिसंबर 2023) ही नियमों के खिलाफ थी, इसलिए अब इसे सुधारने के लिए राज्य को सुप्रीम कोर्ट से ‘कंडोनेशन आफ डिले’ (देरी के लिए माफी) या विशेष अनुमति लेनी होगी।
चूंकि यूपीएससी ने अटॉर्नी जनरल की सलाह पर फाइल लौटाई है, इसलिए राज्य सरकार अब कानूनी रूप से तब तक नया डीजीपी नियुक्त नहीं कर सकती जब तक कि सुप्रीम कोर्ट 2018 के अपने ही आदेश में इस मामले के लिए कोई विशेष रियायत न दे दे।



