डॉ. प्रकाश हिन्दुस्तानी।
रायता तो रायता ही होता है। ककड़ी का हो या अनन्नास का ! फिल्मों का रायता कॉमेडी और रोमांटिक हो सकता है। तो भिया, ये जो ‘पिच्चर’ आई है परम सुंदरी ये रोमांटिक रायता है। खाओ या ढोलो, कोई फर्क नहीं।
लगता है हिन्दी फिल्म वालों के पास कहानियों की बहुत कमी है। वही घिसे पिटे मुहावरे ! नॉर्थ बना बनाम साउथ की रोमांटिक फिल्मी कहानी पहले ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ में बहुत अच्छे से दिखाई जा चुकी है। चेतन भगत के उपन्यास 2 स्टेट्स में भी यही बात थी, जिस पर इसी नाम की फिल्म भी बनी है।
अब परम सुंदरी फिल्म में भी यही फार्मूला दोहराया गया है। परम यानी सिद्धार्थ कपूर दिल्ली का रईस लड़का है दूसरी तरफ सुंदरी यानी जाह्नवी कपूर केरल की पारंपरिक स्कूल वाली एक आर्टिस्ट लड़की है। दोनों की मुलाकात केरल के खूबसूरत बैकवाटर में होती है और फिर ऐसा रोमांस शुरू होता है जो हिंदी फिल्मों में बहुत ही आम है।
हंसी-मजाक, गलतफहमी और इमोशन होते हुए भी फिल्म में कोई बड़ी बात नहीं ला सके। हल्की-फुल्की और दिल को गुदगुदाने वाली कहानी है जो कभी कभी दर्शकों को मुस्कुराने पर तो कभी आंखें नम करने की कोशिश करती है।
परम सुंदरी की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि उसमें नयापन बिल्कुल भी नहीं है। कई सारे सीन प्रिडिक्टेबल है और केरल की संस्कृति को बड़े ही स्टीरियोटाइप तरीके से दिखाया गया है। वही लहजा, वही साड़ी पहनने का तरीका, नारियल के पेड़, हरीतिमा फिल्म कम और केरल के पर्यटन विभाग की फिल्म का आभास देती है। इस फिल्म में मलयालम फिल्मों के कलाकार रेंजी पणिक्कर और सिद्धार्थ शंकर भी हैं जो फिल्म को थोड़ा ऑथेंटिक लुक देने की कोशिश करते हैं। जाह्नवी कपूर श्रीदेवी की बेटी है और वह भी तमिल तथा तेलुगू अच्छी तरह जानती हैं इसलिए वह भी ठीक लगती है लेकिन कई जगह उनका लहजा और सीन ओवर एक्टिंग के शिकार हो जाते हैं।
यह फिल्म पूरी तरह से भेजे को डीप फ्राई तो नहीं करती, लेकिन भेजे का सॉटे (हाफ कुक) बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ती । फिल्म का एक गाना परदेसिया सोनू निगम की आवाज में काफी लोकप्रिय हो गया है, इसमें 1990 के दशक की रोमांटिक फिल्मों की मिठास झलकती है। दूसरे गाने थोड़ा नॉस्टैल्जिक फील देते हैं, लेकिन ये गाने फिल्म की गति को कम कर देते हैं।
कुल मिलाकर परम सुंदरी एक टाली जा सकने वाली फिल्म है। टालनीय !