महिलाओं के धार्मिक स्थलों में प्रवेश और धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा जैसे अहम सवालों पर सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों वाली संविधान पीठ ने मंगलवार से सुनवाई शुरू कर दी। इस मामले का केंद्र सबरीमाला मंदिर है, लेकिन इसके साथ मुस्लिम महिलाओं के मस्जिद और दरगाहों में प्रवेश तथा गैर-पारसी पुरुषों से विवाह करने वाली पारसी महिलाओं के अगियारी में प्रवेश जैसे मुद्दे भी जुड़े हैं।
सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान बेंच ने मंगलवार को सबरीमाला मंदिर में महिलाओं को एंट्री देने का आदेश जारी रहे या नहीं इस पर पहले दिन 5 घंटे सुनवाई की। केंद्र ने शुरुआत में ही सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मंदिर में मासिक धर्म आयु की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक का समर्थन किया। सरकार ने कहा 2018 में सभी वर्ग की महिलाओं को एंट्री देने का सुप्रीम कोर्ट का फैसला गलत था।
यह मामला पूरी तरह धार्मिक आस्था और संप्रदाय के अपने अधिकार से जुड़ा है। अदालतें महिलाओं के धार्मिक स्थलों में प्रवेश के मामले में दखल नहीं दे सकतीं। अगर कोई प्रथा गैर-वैज्ञानिक लगती है, तो उसका हल संसद या विधानसभा के पास है, न कि अदालत के पास।
केंद्र की ओर से पेश सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि इस फैसले में महिलाओं के प्रवेश पर रोक को “छुआछूत” (अनुच्छेद 17 का उल्लंघन) माना गया था।
जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा- इस मामले में अनुच्छेद 17 यानी छुआछूत के खिलाफ अधिकार पर दलील किस तरह पेश की जाए, यह मेरी समझ से बाहर है। एक महिला होने के नाते मैं यह कहना चाहूंगी कि ऐसा नहीं हो सकता कि हर महीने 3 दिन तक तो महिला को अछूत माना जाए और चौथे दिन अचानक कोई अछूतपन न रह जाए।
9-जजों की संविधान पीठ कर रही सुनवाई
बेंच में चीफ जस्टिस सूर्यकांत के साथ न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना, जस्टिस एम एम सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, जस्टिस प्रसन्ना बी वराले, जस्टिस आर महादेवन और जस्टिस जॉयमल्या बागची शामिल हैं। अदालत ने पहले ही संकेत दिया था कि इस मामले की अंतिम सुनवाई 7 अप्रैल से शुरू होकर 22 अप्रैल तक चल सकती है।
कैसे शीर्ष कोर्ट में पहुंचा मामला
सुनवाई से पहले केंद्र सरकार ने लिखित दलील दाखिल कर कहा कि सबरीमाला मंदिर में मासिक धर्म आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश पर रोक धार्मिक आस्था और संप्रदायिक स्वायत्तता का मामला है। केंद्र ने अदालत से इस प्रतिबंध को बरकरार रखने की मांग की और कहा कि ऐसे मामलों में न्यायिक समीक्षा की सीमा सीमित होनी चाहिए।
2018 में क्या था SC का फैसला
सबरीमाला विवाद में सितंबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट की पांच-न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ ने 4:1 के बहुमत से 10 से 50 वर्ष आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक हटा दी थी। अदालत ने तब कहा था कि सदियों पुरानी यह प्रथा गैरकानूनी और असंवैधानिक है। इसके बाद नवंबर 2019 में तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच-न्यायाधीशों की पीठ ने 3:2 के बहुमत से इस विवाद से जुड़े व्यापक संवैधानिक सवाल बड़ी पीठ को भेज दिए थे।
अब 9 जजों की पीठ करेगी विचार
अब 9 जज की पीठ जिन सवालों पर विचार कर रही है, उनमें संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता का दायरा, अनुच्छेद 25 और 26 के बीच संबंध, धार्मिक संप्रदायों के अधिकारों की सीमा, ‘मोरैलिटी’ का अर्थ, धार्मिक प्रथाओं पर न्यायिक समीक्षा का दायरा और क्या किसी दूसरे धर्म या संप्रदाय का व्यक्ति जनहित याचिका के जरिए किसी धार्मिक प्रथा को चुनौती दे सकता है जैसे मुद्दे शामिल हैं।
सुप्रीम कोर्ट के संवैधानिक बेंच के सामने 7 सवाल क्या हैं?
(i). भारत के संविधान के अनुच्छेद 25 के अंतर्गत धर्म की स्वतंत्रता के अधिकार का दायरा और सीमा क्या है?
(ii). अनुच्छेद 25 के तहत व्यक्तियों के अधिकारों और अनुच्छेद 26 के तहत धार्मिक संप्रदायों के अधिकारों के बीच पारस्परिक संबंध क्या है?
(iii). क्या अनुच्छेद 26 के अंतर्गत धार्मिक संप्रदायों के अधिकार, सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के अतिरिक्त संविधान के भाग III के अन्य प्रावधानों के अधीन भी हैं?
(iv). अनुच्छेद 25 और 26 में प्रयुक्त ‘नैतिकता’ शब्द का दायरा और सीमा क्या है, और क्या इसमें संवैधानिक नैतिकता भी शामिल है?
(v). अनुच्छेद 25 में उल्लिखित धार्मिक प्रथाओं के संबंध में न्यायिक समीक्षा का दायरा और सीमा क्या है?
(vi). अनुच्छेद 25(2)(b) में प्रयुक्त “हिंदुओं के वर्ग” (Sections of Hindus) अभिव्यक्ति का क्या अर्थ है?
(vii). क्या कोई व्यक्ति जो किसी धार्मिक संप्रदाय या समूह से संबंधित नहीं है, उस संप्रदाय या समूह की किसी प्रथा को जनहित याचिका (PIL) के माध्यम से चुनौती दे सकता है?
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई की बड़ी बातें
सुप्रीम कोर्ट की 9-जज संविधान पीठ ने सुनवाई शुरू की
सबरीमाला के साथ मस्जिद, दरगाह और अगियारी प्रवेश के मुद्दे भी जुड़े
केंद्र ने महिलाओं के प्रवेश पर रोक बरकरार रखने की मांग की
2018 में SC ने 10-50 आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक हटाई थी
2019 में मामला बड़े संवैधानिक सवालों के साथ 9-जज पीठ को भेजा गया
धार्मिक स्वतंत्रता बनाम समानता के अधिकार पर होगा बड़ा फैसला



