महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा सभी जिलों से अति गंभीर कुपोषित बच्चों की संकलित की गई जानकारी हैरान करने वाली है।
वर्ष 2025 में अति गंभीर कुपोषित की श्रेणी में आए सात लाख 37 हजार बच्चों (छह वर्ष तक उम्र के) में से तीन लाख 63 हजार सामान्य नहीं हो पाए हैं। यानी, चिह्नित करने के बाद भी इन्हें कुपोषित की श्रेणी से बाहर नहीं लाया जा सका है।
मुख्यमंत्री बाल आरोग्य संवर्धन कार्यक्रम के अंतर्गत इन्हें चिह्नित किया गया है। आंकड़े बताते हैं कि स्थिति सुधरने की जगह बिगड़ी है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस)-पांच की 2019 से 2021 के बीच रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में 35.7 प्रतिशत बच्चे ठिगनापन (अविकसित) के शिकार थे।
केंद्रीय महिला एवं बाल विकास विभाग के पोषण ट्रैकर डैशबोर्ड के अनुसार जनवरी 2026 में यह आंकड़ा 38 प्रतिशत तक पहुंच गया है। कुपोषण की तीन श्रेणियों में यह सबसे गंभीर मानी जाती है।
प्रतिवर्ष लगभग 1400 करोड़ रुपये खर्च
विशेषज्ञों का कहना है कि ठिगने बच्चों को मानसिक विकास भी सामान्य बच्चों की तरह नहीं हो पाता। यह स्थिति तब है जब राज्य सरकार पोषण आहार पर प्रतिवर्ष लगभग 1400 करोड़ रुपये खर्च कर रही है।
मध्य प्रदेश सबसे खराब पांच राज्यों में शामिल
वहीं, एनएफएचएस- पांच में उम्र के अनुसार कम वजन (दुबलापन) वाले बच्चे 33 प्रतिशत थे जो पोषण ट्रैकर की जनवरी की रिपोर्ट में 22 प्रतिशत हैं। यानी इसमें सुधार आया है, पर अन्य राज्यों से तुलना करें तो मध्य प्रदेश सबसे खराब पांच राज्यों में शामिल है।
हां, दुबलापन यानी ऊंचाई के अनुसार कम वजन वाले बच्चों की स्थित सुधरी है। एनफएएचएस-पांच में यह 19 प्रतिशत था जो पोषण ट्रैकर के अनुसार अब सात प्रतिशत है। हालांकि, पोषण ट्रैकर के अनुसार राष्ट्रीय औसत से तुलना करें तो मध्य प्रदेश की स्थिति अच्छी नहीं है।
ठिगनापन का राष्ट्रीय औसत 31, कम वजन का 13 और ऊंचाई के अनुसार कम वजन वालों का चार प्रतिशत है। हालांकि, कुछ बच्चे ऐसी भी हो सकते हैं जो कुपोषण की दो या तीन श्रेणी में हों।
2017 से नहीं बढ़ी पोषण की राशि
आंगनबाड़ी केंद्रों में दिए जाने वाले पूरक पोषण आहार की दर बीते आठ वर्षों से नहीं बढ़ाई गई है। सामान्य कुपोषित श्रेणी के बच्चे को अब भी मात्र आठ रुपये प्रतिदिन और अति गंभीर कुपोषित बच्चे को 12 रुपये प्रतिदिन की दर से पोषण आहार उपलब्ध कराया जा रहा है। अंतिम बार वर्ष 2017 में इन दरों में वृद्धि की गई थी।
एनफएचएस-चार की तुलना में मामूली सुधार
एनएफएचएस-चार (2014-16) की तुलना में एनएफएचएस-पांच में ठिगनापन में 1.6 प्रतिशत, कम वजन में 2.3 प्रतिशत और दुबलापन में 2.6 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई थी। यानी सुधार तो हुआ पर न के बराबर।
कुपोषण की समस्या हल करने के लिए सरकार यह कर रही काम
आंगनबाड़ी कार्यकर्ता कुपोषित बच्चों की पहचान और उनके परिवारों को पोषण संबंधी सलाह देती हैं।
अटल बिहारी वाजपेयी बाल आरोग्य एवं पोषण मिशन के तहत प्रदेश सरकार के वित्तीय संसाधनों से कुपोषण निवारण के लिए हर जिले की अलग कार्ययोजना बनाकर उन्हें लागू किया जाता है।
मुख्यमंत्री बाल आरोग्य संवर्धन कार्यक्रम में एम्स के सहयोग से गंभीर कुपोषित बच्चों का उपचार किया जाता है। इसमें पांच दिन उपचार और छह माह का फॉलोअप किया जाता है।
सरकार ने वर्ष 2047 तक कुपोषण खत्म करने का निर्णय लिया है।
पूरक पोषण आहार कार्यक्रम के अंतर्गत टेक होम राशन और गर्म पका भोजन योजना से 68 लाख से अधिक बच्चों, गर्भवती एवं धात्री माताओं को लाभ मिल रहा है।



