राजधानी भोपाल के शाहपुरा क्षेत्र में हरियाली के खात्मे करने के मामले में जिम्मेदार अफसरों की खामोशी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है।
शीर्ष अदालत ने सड़क के चौड़ीकरण के नाम पर पेड़ काटने के प्रकरण में भोपाल कलेक्टर, लोक निर्माण विभाग के मुख्य अभियंता और टाउन एंड कंट्री प्लानिंग के संचालक के जवाब देने का अवसर ही खत्म कर दिया।
शाहपुरा निवासी सान्निध्य जैन कानून के विद्यार्थी हैं। उन्होंने पेड़ों की कटाई के खिलाफ जनहित याचिका लगाई है। सान्निध्य ने बताया कि लोनिवि द्वारा शैतानसिंह मार्केट चौराहा से मनीषा मार्केट, बंसल अस्पताल, स्वर्णजयंती पार्क, बावड़ियाकला तिराहा से कोलार रोड तक सड़क को चौड़ा करने जा रहा है।
इसकी जद में आ रहे 250 से अधिक हरे-भरे पेड़ों को काटने की तैयारी की जा चुकी है। पेड़ों पर लाल स्याही से नंबर भी अंकित कर दिए गए हैं। सान्निध्य का आरोप है कि पेड़ों की संख्या कम बताने के लिए कई पेड़ों पर एक से ही नंबर डाले गए हैं। इस तरह लोनिवि के राजधानी संभाग क्रमांक-एक द्वारा काटे जाने वाले पेड़ों की संख्या सिर्फ 132 बताई है।
विभाग के कार्यपालन यंत्री ने इन पेड़ों को काटने के लिए नगर निगम के सहायक आयुक्त (उद्यान) को अनुमति के लिए दो अप्रैल 2024 को आवेदन भी दे दिया है। इसके तहत प्रति वृक्ष की कीमत छह हजार रुपये आंकते हुए 7,92,000 रुपये के शुल्क का डिमांड ड्राफ्ट भी संलग्न किया है।
सान्निध्य ने बताया कि क्षेत्र की हरियाली को बचाने के लिए उसे सर्वोच्च न्यायालय जाना पड़ा है। याचिका में बताया गया है कि लोक निर्माण विभाग राजधानी संभाग-एक ने अवैध रूप से पेड़ काट दिए हैं। विभाग ने इस मामले में एनजीटी में भी झूठा जवाब पेश किया।
वहां दावा किया है कि सड़क बनते ही दोनों तरफ एवं सेंट्रल वर्ज पर पौधे लगाए जाएंगे, लेकिन उन स्थानों पर पेवर ब्लाक लगा दिए गए हैं। पेड़ लगाने के लिए स्थान ही नहीं छोड़ा गया।
याचिका के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने अधिकारियों को पक्ष रखने के लिए नोटिस जारी किया था। पांच जनवरी को सुनवाई में कलेक्टर, लोनिवि और टीएंडसीपी के वकील तक नहीं पहुंचे। नगर निगम और पीसीबी के वकीलों ने पेश होकर जवाब के लिए समय मांगा।
सर्वोच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार ने इनको जवाबी शपथपत्र देने के लिए 12 जनवरी का समय दिया है। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता अंशुल गुप्ता का कहना है कि जिन अधिकारियों का प्रतिनिधित्व नहीं हुआ, उनके जवाब देने का अधिकार खत्म हो गया है।



