Wednesday, May 22, 2024

ये तिनका सहेजने में शर्म कैसी ?

Share

कुछ कारणों से उपजे हालात के चलते तब चारों और दबाव का माहौल था। भोपाल दूरदर्शन में अगले दिन के कार्यक्रम की जानकारी दी जाना थी। प्रशिक्षित एंकर ये काम बखूबी कर लेते थे। लेकिन शहर के खराब माहौल के चलते रात को कोई एंकर नहीं बचा था। मजबूरी में इस काम से दूर-दूर तक वास्ता न रखने वाले स्टाफ के एक बंदे को कैमरे के सामने खड़ा कर दिया गया। अकबकाते हुए उसने कुछ देर बोला, फिर उसकी क्षमताएं जवाब दे गयीं। लाइव टेलीकास्ट में उसने अचानक कह दिया, ‘यार अब अपने बस की नहीं है। किसी और से करवा लो।’

गुरूवार दोपहर जब मध्यप्रदेश के कुछ कांग्रेसजनों को टीवी पर देखा तो यही लगा कि किसी भी समय वह भी, ‘अपने बस की नहीं है….’ कहकर कैमरे से दूरी बना लेंगे। वे बेचारे असहजता के भाव से भरे थे। बाबूलाल चौरसिया की पार्टी में वापसी को लेकर वे खुद को फंसा हुआ महसूस कर रहे थे, लेकिन दबाव था। कोई और नहीं, बल्कि खुद प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष कमलनाथ ने चौरसिया की कदमबोसी की थी। गदगद और मंत्रमुग्ध चेहरे के साथ वे चौरसिया को कांग्रेस में लेकर आए थे। जिस शख्स ने किसी समय नाथूराम गोडसे की पूजा की हो, जिसने ग्वालियर में गोडसे का मंदिर बनाने की कोशिशों में सक्रिय और उल्लेखनीय भूमिका निभायी हो, जो व्यक्ति कांग्रेस के घोर विरोधियों में से एक हिन्दू महासभा के टिकट पर चुनाव लड़कर पार्षद बना हो, उस व्यक्ति को कांग्रेसी परिवेश में जस्टिफाई करना किसी भी कांग्रेसी के लिए आसान नहीं होगा। और इसी मुश्किल को अरुण यादव ने आवाज दे दी। ‘बापू हम शर्मिंदा हैं’ पूर्व प्रदेशाध्यक्ष का महज यह एक ट्वीट नहीं, बल्कि वह पीड़ा है, जिससे यह पार्टी भर उठी है।

अब है तो शर्मिंदगी की बात ही, लेकिन कांग्रेस के लिए यह शर्मिंदिगियों के अनंत अध्यायों की एक और कड़ी वाला मामला हो गया है। कांग्रेस ने हमेशा से गोडसे को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़ा बताया। इस आधार पर गांधी के हत्यारे को संघ सहित भाजपा से जोड़ने की कोशिश की। अब गांधी का मामला है, तो ऐसे आरोपों पर देश का गंभीर हो जाना भी तय था। लेकिन फिर ऐसा क्या हुआ कि इसी भाजपा को आवाम ने संसद में महज दो सीटों से पूर्ण बहुमत तक ला दिया। निश्चित ही गुजरे दो लोकसभा चुनावों के नतीजे संघ के कामकाज से लेकर विचारों तक पर भी जनता की स्वीकृति के परिचायक हैं। यह कहना ज्यादती होगी कि यह जनमत गांधी वध के लिए उदासीनता का परिचायक है, लेकिन यह कहा जा सकता है कि जनता ने गांधी के लिए कांग्रेस के असली भावों को पहचान लिया है। जो कांग्रेस आजादी की लड़ाई में अंग्रेजों के खिलाफ पूरी ताकत से खड़ी रही, और जिसने गांधी के नेतृत्व में अंग्रेजों को देश छोड़ने के लिए मजबूर किया, वह आज देश के महज तीन राज्यों तक सिमट कर रह गयी है। ‘बापू हम शर्मिंदा हैं, तेरे कातिल जिंदा है’ यह नारा कांग्रेस के लिए पश्चाताप नहीं, उसके मुंह पर तमाचा है। क्योंकि जिस कांग्रेस को देश की जनता नकार रही हैं, उसका आजादी की लड़ाई में कोई योगदान नहीं था। होता तो क्या कांग्रेस के कहे मुताबिक गांधी के हत्यारे देश की सत्ता पर काबिज होते। इस कांग्रेस ने केवल गांधी को नोट और वोट के लिए इस्तेमाल किया है। और जिस संघ का आजादी की लड़ाई से कोई वास्ता नहीं होना बताया जाता रहा है, उसी संघ की विचारधारा आज देश के राजनीतिक फलक पर कमोबेश पूरी तरह छा चुकी है। वजह यह कि कांग्रेस ने गांधी को कभी माना ही नहीं, केवल नोट और वोट के तौर पर जाना। उसने राष्ट्रपिता का अपने राजनीतिक हितों के लिए इस्तेमाल भर किया। यह तथ्य अब पूरी तरह जनता समझ चुकी है और यही बात कांग्रेस की दुर्गति से लेकर निरंतर शर्मिंदगी की भी बड़ी वजह बनी हुई है।

आप किसी आतंकवादी को ‘साहब’ या ‘जी’ कहने में शर्मिन्दा नहीं होते हैं। देश के करीब दो दर्जन वीर सिपाहियों की शहादत वाली आतंकी हमले को आप ‘हादसा’ कहने में आपको शर्म नहीं आती। आपातकाल की काली छाया भी आपको शर्म के करीब नहीं ला पाती है तो फिर एक बाबूलाल चौरसिया के लिए शर्मिंदगी भला क्यों? वो पार्षद रहा है। हो सकता है कि ग्वालियर के एकाध वार्ड में उसके चलते कांग्रेस को जल्दी होने वाले नगरीय निकाय के चुनावों में कुछ वोटों का लाभ हो जाए। डूबते को तिनके का सहारा होता है और भागते भूत की लटकती लंगोटी भी कई बार गरीबी को छिपाने का काम कर जाती है। कांग्रेस की राज्य में बेहद बुरी दशा के बीच यदि चौरसिया जैसे तिनकों में ही सहारा ढूंढा जा रहा है तो फिर अब शर्मिंदगी कैसी?

Read more

Local News