Wednesday, May 22, 2024

इस वीकेंड के ये मनोरंजक चेहरे 

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निहितार्थ : पत्रकारिता की लगातार आपाधापी के चलते जीवन में वीकेंड यानी सप्ताहांत जैसी फीलिंग महसूस ही नहीं हो सकी। लेकिन आज दो खबरों ने एक अहसास गाढ़ा  कर दिया। वह यह कि वीकेंड है और छुट्टी के उन पलों के लिए कुछ मनोरंजक सामग्री (Entertaining content) हाथ लग गयी है। वो सामग्री  दो ख़बरों की शक्ल में मिली है। पहली, कमलनाथ को राजस्थान कांग्रेस (Rajasthan Congress) में असंतोष को खत्म करने का काम सौंपा गया है। दूसरी, दिग्विजय सिंह (Digvijay Singh)अपने बेटे जयवर्द्धन (son jayavardhan) को मध्यप्रदेश कांग्रेस (Madhya Pradesh Congress) का कार्यकारी अध्यक्ष (executive Chairman) बनाने की जुगत में लग गये हैं। ये मनोरंजकद्वय समाचार मुझे अवकाश के सुख वाली गुदगुदाती फीलिंग (Feeling) से एकाकार कराने की पूरी क्षमता रखते हैं। लोहा,  लोहे को काटता है। जहर ही जहर को उतारने का काम करता है। मुझे यकीन है कि कांग्रेस की लीडरशिप (Leadership) ने इन दो कहावतों की अपनी बुद्धि के हिसाब से ही व्याख्या कर ली  है। और इसी के चलते उसने विनाशक ही विनाश का तोड़ है, वाली बात को मूल मन्त्र समझ लिया है। नाथ (Nath) इस मामले में विशिष्ट शैली की क्षमताओं से भरे हुए हैं। पंद्रह साल बाद ले-देकर कांग्रेस मध्यप्रदेश में फिर सरकार बना सकी। ले-देकर भाई लोगों को अपनी-अपनी गठरी भरने का मौक़ा मिला था। मगर नाथ की कृपा कि गठरी भरने से पहले ही केवल पंद्रह महीने में सरकार की ठठरी बंध गयी। ऐसा अचानक नहीं हुआ। मामला, ‘डोली उठी राह में सहसा धोकेबाज कहारों से’ वाला भी नहीं था। कहार तो चुनाव के बाद से ही कराह रहे थे। दर्द हद से गुजर गया तो वे अपनी पर ‘उतर आये।’ संयम के ख़त्म होने की यह शुरूआत नाथ ने ही ज्योतिरादित्य सिंधिया (Jyotiraditya Scindia) के लिए ‘तो उतर जाएं’ कहकर की थी। सारा प्रदेश जानता था कि नाथ की सरकार जाने वाली  है। मगर नाथ अपने  दिग्विजय सिंह की सलाह पर अमल करते हुए अंततः समूची सरकार के पतन का कारण बन गए।

इतिहास  दोहराने का मतलब है। वह यह कि राजस्थान में भी मध्यप्रदेश जैसे हालात हैं। सचिन पायलट  (Sachin Pilot) किसी  फाइटर पायलट की तरह अशोक गहलोत (Ashok Gehlot) पर बम गिराने की ताक में हैं। विवाद उसी तरह का, जैसा कि मध्यप्रदेश में नाथ और सिंधिया के बीच था। तो जो नाथ ऐसे मामले में खुद की ही सरकार नहीं बचा सके, वो भला गहलोत के लिए किस तरह मददगार साबित हो सकेंगे? अब तो कांग्रेस के लिए वहां चुनौती और भी बड़ी है। भाजपा (BJP) में वह फीमेल विभीषण एक्सपोज़ हो चुकी हैं, जिन्होंने पिछली बार पायलट के बगावती तेवरों से गहलोत की हिफाज़त की थी। अब जबकि पायलट फिर से नाराजगी दिखा रहे हैं, तो BJP पहले वाली गलती नहीं दोहराएगी। वह अपने उन चेहरों पर  दोबारा भरोसा नहीं करेगी, जो सत्ता का सट्टा अपने पक्ष में न होता दिखने पर अनैतिकता की हदें पार करने से भी नहीं चूकते हैं।  ऐसे में राजस्थान में Congress की तगड़ी अंदरूनी और बाहरी चुनौतियों से नाथ सफलतापूर्वक निपट पाएंगे, फिलहाल तो यह सोचकर ही हंसी आ रही है। हो सकता है कि नाथ जयपुर पहुंचते ही नाराज कांग्रेसियों से ‘चलो-चलो, आगे बढ़ो’ कहें और वो सभी फिर से पंजे का अभिषेक करने में जुट जाएं। ये मेरी कल्पना नहीं है। मगर निश्चित  ही ये उस कांग्रेस नेतृत्व का यकीन होगा, जिसने नाथ को राजस्थान में ट्रबल शूटर के लिहाज से परफेक्ट माना है।





सुना है कि दिग्विजय सिंह फिर उम्मीद से हैं। कोशिश कर रहे हैं कि बेटे जयवर्द्धन को कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष (Congress state president) के पद की कतार में सबसे आगे खड़ा करा दिया जाए। ये पायदान वो है, जिसे कार्यकारी अध्यक्ष कहा जाता है। सिंह का प्रयास है कि जयवर्द्धन सिंह को कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर अभी से ‘पहले आएं, पहले पाएं’ वाले लाभ का सबसे प्रबल उम्मीदवार बना दें। बतौर अध्यक्ष नाथ का समय अब तेजी से ख़त्म  होता दिख रहा है।  कोशिश तो नाथ की भी रही कि बेटे नकुल (son nakul) को संगठन में कुछ वजनदार जगह दिलवा सकें, लेकिन ऐसा अब  तक हो नहीं पा रहा है। क्योंकि मामला वजनदार पोजीशन का है और नकुल का स्थाई भाव बन चुका ‘हल्का मूड’ इसमें बड़ी बाधा बन गया है।

इधर खबर तो  यह भी है कि नाथ ने ही तंग आकर कार्यकारी अध्यक्ष का पद ख़त्म करने की कोशिश शुरू कर दी है। जाहिर है कि जीतू पटवारी (jeetu patwari), रामनिवास रावत (Ram Niwas Rawat) और सुरेंद्र चौधरी (surendra chaudhary) जैसे तजुर्बों की टीस नाथ को अब भी साल रही होगी। इस पद पर यह भीड़ कांग्रेस को मजबूती देने की गरज से बढ़ायी गयी थी, मगर बाद में यह प्रयोग असफल रहा। कमलनाथ जानते हैं कि अब इन्हीं बाजुओं में से कोई एक उनकी गर्दन की तरफ तलवार लेकर बढ़ सकती है। इसलिये वे इन बाजुओं को ही काट देने की कोशिश  में लग गए हैं। और रही बात जयवर्द्धन सिंह की तो उनके रूप में मिलने वाले चुनौती को नाथ आँख देखी मक्खी की तरह निगलने के अलावा और कुछ नहीं कर सकते। आखिरकार उन्हें दिग्विजय के नमक का कर्ज भी तो अदा करना है।

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