Wednesday, May 22, 2024

इस सबका जवाब तो देना ही होगा भाजपा को 

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निहितार्थ: यह विधानसभा (Assembly) नहीं है। वहां तो विपक्ष जो सवाल उठाता है, सरकार उसका जवाब देती है। या कम से कम ऐसा करने की औपचारिकता तो उसे निभाना ही पड़ती है। मगर सदन से बाहर ऐसी कोई बाध्यता नहीं होती। विपक्ष द्वारा लगाए गए लगभग किसी भी आरोप पर शासन न सफाई देता है और न ही उत्तर। ज्यादातर ऐसे मामले प्रत्यारोप तक ही सिमट कर रह जाते हैं। फिर भी आज लगता है कि नैतिकता के रूप में ही, शिवराज सिंह चौहान (Shivraj Singh Chauhan) को विरोधी पार्टी कांग्रेस के एक आरोप का जवाब तो देना ही चाहिए। क्योंकि यहां उनकी उत्तर देने की जिम्मेदारी बहुत अधिक बढ़ गयी दिखती है। यही जिम्मेदारी शिवराज जितनी ही बराबरी से भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष वीडी शर्मा (VD Sharma) की भी बनती है। कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता पवन खेड़ा (Pawan Kheda) ने एक ट्विट किया है। तगड़े धारदार अंदाज में। ताजा-ताजा घोषित हुई भाजपा प्रदेश कार्यसमिति (BJP State Working Committee) के जारी होते समय हुई भूलचूक पर।

खेड़ा ने भाजपा के दो जख्मों पर नमक डाला। पहले जारी और हटा ली गई लिस्ट में शिवराज की जाति (Cast) का जिक्र होने और इसमें एक नाम वीडी शर्मा की सासु मां का नाम मौजूद होने पर। जाति की बात पर कांग्रेस नेता ने भाजपा के ‘जात-पात न मानने’ वाली बात पर निशाना लगाया। शर्मा की सासु मां को लेकर उन्होंने इस पार्टी को परिवारवाद (familism) से जोड़कर नेहरू-गांधी परिवार की तरफ से कुछ हिसाब बराबर कर लिए। भले ही मामला तंज का हो, लेकिन इसके उत्तर के लिए तमाम निगाहें शिवराज तथा शर्मा की तरफ उठ रही हैं। क्योंकि यही वो दो चेहरे हैं, जिनके इर्द-गिर्द प्रदेश भाजपा और सरकार की सारी गतिविधियां सक्रिय रूप से संचालित हैं। नरेंद्र सिंह तोमर (Narendra Singh Tomar) जैसे सक्षम प्रदेश भाजपा अध्यक्ष हों या फिर नंदकुमार सिंह चौहान (Nandkumar Singh Chauhan) या राकेश सिंह जैसे नाम, भाजपा के प्रदेश संगठन (state organization) पर शिवराज की जबरदस्त पकड़ को कोई भी ढीला नहीं कर सका है। इसलिए शिव-विष्णु की इस जोड़ी (भले ही मामला दांत काटी रोटी जैसा न रह गया हो) को यह बताना चाहिए कि खेड़ा के कटाक्ष के जवाब में उनके पास बताने को वाकई कुछ है या नहीं। क्या शिवराज सिंह चौहान अपनी जाति को लेकर उठाए सवाल के जवाब में यह कह पाएंगे कि उनकी मुख्यमंत्री होने की योग्यता का एकमात्र कारण उनका पिछड़ी जाति (backward caste) से होना है। हालांकि यह सही है कि 2003 से अब तक भाजपा ने पिछड़े वर्ग से ही मध्यप्रदेश को CM दिए हैं लेकिन इसका ये आधार तो उसने कभी घोषित तौर पर बताया नहीं है।





आखिर वो कौन था, जिसने रात के पौने एक बजे भाजपा कार्यसमिति की यह लिस्ट जारी की? किसने working committee की लिस्ट जारी करने का काम तन्द्रा भंग होने से उपजी नाराजगी की तर्ज पर किया? इस गुस्से में अक्सर होता यह है कि गलतियों को जानबूझकर होने दिया जाता है। तो ऐसा ही लगता है कि भाजपा में दुर्वासा ऋषि (Durvasa Rishi) के किसी मिनिएचर ने तैश में आकर इस सूची को ज्यों का त्यों जारी करके अपनी खुन्नस निकाल ली हो। क्योंकि पार्टी का जरा भी जागरूक और इसकी पॉलिसी (policy) से वाकिफ कोई नेता इतनी बड़ी भूल कर ही नहीं सकता था। वह एक झटके में यह देख लेता कि इन नामों की आड़ में जाति का वो बवंडर खड़ा होने जा रहा है, जो पार्टी के लिए खासी शर्मनाक स्थिति बना देगा। सवाल यह भी कि आखिर किसी सूची में किस स्तर पर वह प्रक्रिया होती है, जब घोषित रूप में नाम के साथ जाति का भी परिचय हो। जब जातियां बताने के नाम पर भी किसी वैश्य को ब्राह्मण गिना दिया जाए तो फिर यह साफ समझ आता है कि इस प्रक्रिया को भी कितनी लापरवाही के साथ अंजाम दिया गया होगा। आखिर ये क्या वजह रही होगी कि लंबे अंतराल के बाद घोषित की गयी कार्यसमिति को जानबूझकर एक विवाद में तब्दील हो जाने दिया गया?

कौन इस बात को लेकर कोई संतोषजनक तर्क दे सकेगा कि इसमें जिस नाम का खेड़ा ने जिक्र किया है, वे यदि सही में शर्मा की सास मां हैं तो फिर उनके चयन का आधार क्या रहा होगा? जाहिर है कांति रावत के बारे में पवन खेड़ा तो नहीं जानते होंगे कि वे जबलपुर में भाजपा की स्थानीय राजनीति में सक्रिय रही हैं या नहीं। बताते यहीं हैं कि वे वहां जमीनी राजनीति के साथ महिला मोर्चा में भी रहकर सक्रिय राजनीति (active politics) करती रही हैं। लेकिन प्रदेश कार्यसमिति में आने का उनका यह पहला मौका है तो वीडी शर्मा पर सवाल तो उठेगा ही। नरेन्द्र मोदी (Narendra Modi) की जिस भाजपा में उनकी भतीजी को पार्षद पद का पार्टी टिकट नहीं मिल सकता। कैलाश विजयवर्गीय (Kailash Vijayvargiya) को अपने बेटे को टिकट दिलाने के एवज में खुद को चुनावी राजनीति (electoral politics) से दूर करना पड़ता है। तो ऐसे उदाहरणों के बीच क्या कोई भी इसका भाजपा के समर्थकों की तरफ से तसल्लीबख्श जवाब दे पायेगा कि इन दो चुटकुलों के बाद भी भाजपा किस तरह पूरी गंभीरता से खुद को जाति परंपरा तथा परिवारवाद से बिलकुल अलग पार्टी बता सकती है? मामले गंभीर हैं और उन पर भाजपा की चुप्पी या बचकानी दलीलें पार्टी की साख के लिए भारी नुकसान का कारण बन सकती हैं। इसलिए भाजपा को इस सबका जवाब तो देना ही होगा।

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