डूबा तो टाइटैनिक भी था, जला रोम भी था….

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लगता ऐसा ही है, कांग्रेस में बहुत असरकारी भूचाल आ गया है। क्योंकि आज मध्यप्रदेश की सियासत में जो कुछ हुआ, उसकी तो यह पार्टी बीते लंबे समय से अभ्यस्त हो चुकी है। वह भी राष्ट्रव्यापी तरीके से। लेकिन कांग्रेस के सीनियर नेता सुरेश पचौरी सहित प्रदेश के कई बड़े-छोटे नेताओं ने पंजे को अंगूठा दिखाकर भाजपा का दामन थाम लिया। यह पहले ही दरारों का दर्द सह रही किसी दीवार में बड़ा छेद हो जाने से कम वाला मामला नहीं है।

पचौरी कांग्रेस की रीति-नीति में पगे हुए व्यक्ति रहे हैं और इस तरह से उनका कांग्रेस को त्याग देने का फैसला कांग्रेस में अनिश्चितता की घुटन से जूझ रहे और भी कई बड़े नेताओं को राह दिखाने वाला साबित हो सकता है। पचौरी कांग्रेस के उन नेताओं में शामिल हैं जो कांग्रेस में मध्यप्रदेश की जमीनी और दिल्ली की आसमानी राजनीति में हमेशा एक खास स्थान रखते रहे हैं। निश्चित ही पचौरी जनाधार के मामले में भले ही कमजोर रहे हैं। लेकिन कांग्रेस में उनके आधार को कभी कोई नकार नहीं पाया है। उनके भीतर कुछ तो ऐसा रहा है, जिसने उन्हें कांग्रेस आलाकमान के मनाधार से सदैव परिपूरित रखा। वरना यह संभव ही नहीं है कि अपने सियासी जीवनकाल में मध्यप्रदेश के दिग्गज कांग्रेसियों के बीच पचौरी के हिस्से में चार बार लगातार राज्यसभा सदस्यता, नरसिम्हा राव और मनमोहन सरकार में महत्वपूर्ण मंत्रालयों की कमान, मध्यप्रदेश में युवक कांग्रेस और कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष जैसे पद आए।

यकीनन कांग्रेस नेतृत्व ने अपने इस नेता में कोई तो ऐसी बात देखी होगी, जिसके चलते उन्हें भरपूर तरीके से नवाजा गया। यह सब भी कुछ यूं होता चला गया कि गुटाधीशों वाली राज्य कांग्रेस में पचौरी भी अपना एक बड़ा ग्रुप बनाने में सफल हो रहे। अस्सी के दशक से यह सिलसिला चला कि यदि मध्यप्रदेश में अर्जुन सिंह, शुक्ल बंधु, दिग्विजय सिंह, मोतीलाल वोरा या ज्योतिरादित्य सिंधिया के नाम से खेमे रहे तो हमेशा एक खेमे की गिनती सुरेश पचौरी के नाम से भी होती रही है। तो दरार से छेद वाला यह मामला इसलिए भी हो जाता है कि पचौरी अपने साथ समर्थकों की एक बड़ी फौज की भी ले जाने में सफल रहे हैं। वैसे ही, जैसे ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कर दिखाया था। सिंधिया का मामला उनके अपने इलाके में पकड़ वाला रहा है। पचौरी ने पूरे प्रदेश में अपने समर्थक तैयार भी किए और उन्हें पार्टी में भरपूर सम्मान भी दिलाया। पार्टी में कद और पद का मामला हो या फिर सांसद से लेकर पार्षद पद तक, पचौरी के कोटे से पार्टी में कार्यकर्ताओं को टिकट मिलते रहे थे।

पचौरी आज से जिस भाजपा में शामिल हुए हैं, वहां हिसाब ठीक उलटा है। यह वह दल है, जहां कद्दावर नेता रहते हुए खुद बड़े नेता भी अपने परिवार को राजनीतिक रूप से ‘सुसज्जित’ वाली शैली में स्थापित नहीं कर सके। पचौरी भी इस तथ्य से भली-भांति अवगत हैं। वैसे भी जिस परिस्थिति में पचौरी भाजपा में शामिल हुए हैं, उसमें किसी डील या कमिटमेंट की गुंजाईश नहीं है। बस भाजपा अपना कुनबा बढ़ा रही है और उसके दरवाजे हर कांग्रेसी के लिए खुले हैं। कांग्रेस को कमजोर करना उसकी एकमात्र रणनीति है। जाहिर है कि यदि महाराष्ट्र में अशोक चव्हाण और मिलिंद देवड़ा जैसे लोग हो या फिर मध्यप्रदेश में सिंधिया या पचौरी जैसे नेता, कांग्रेस राहुल गांधी के अघोषित नेतृत्व और वामपंथियों की वैचारिक पकड़ में अपने ही नेताओं की कद्र खोती जा रही है।

जाहिर है कि पचौरी या उनके साथ आए हुए नेता किसी तत्कालिक लालच में भाजपा में शामिल नहीं हुए होंगे। इनमें से कुछ तो अभी हाल ही का पिछला विधानसभा चुनाव हारे हैं। अपनी सात दशक से ज्यादा की जिंदगी में पांच दशक कांग्रेस में बिताने के बाद पचौरी ने यदि दल बदला है तो उन्हें पता है कि यह पार्टी उन्हें तत्काल सिर आंखों पर तो नहीं बैठा लेगी। फिर भी यह सब जानते-बूझते हुए भी पचौरी भाजपा में आ गए हैं तो यह माना जाना चाहिए कि वह कांग्रेस के वर्तमान नेतृत्व के प्रति घनघोर किस्म के अविश्वास और निराशा से भर चुके हंै। कांग्रेस का जहाज डूबने की स्थिति में है।

अब ये कल्पना तो स्वयं को मानसिक जहालत से जूझ रहा बताने का प्रतीक है कि कांग्रेस इस घटनाक्रम से कोई सबक लेगी। कम से कम फिलहाल का नेतृत्व तो पार्टी में रह-रह कर लग रही ऐसी आग के बावजूद बांसुरी बजाने में मग्न है। डूबा टाइटैनिक जहाज भी था और जला रोम भी था। इनके पीछे किसकी गलती थी, सभी जानते हैं। ठीक वैसे ही, जैसे कांग्रेस के मौजूदा हालात के पीछे की ‘शीर्ष वजह का सिरा’ किसी से भी छिपा नहीं है। बावजूद इसके ये सब ऐसे ही चलता रहेगा, क्योंकि ये आज की कांग्रेस का मामला है।