चुटकुला याद दिला रही है कांग्रेस की यह गारंटी

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जिन्हें अतीत और वर्तमान, दोनों के सच का भान नहीं है, उनके लिए तो यह बेहद लोकलुभावन मामला है। लोकसभा चुनाव के लिए कांग्रेस के विज्ञापन में जारी ‘युवा न्याय गारंटी’ का खाका कुछ ऐसा है कि एक बारगी सारे के सारे युवा मतदाता और उनके परिवारजन आज से ही इस पार्टी को वोट देने का मन बना लें तो हैरत नहीं होना चाहिए। लेकिन जैसा कि पहले ही कहा गया है कि ऐसा सिर्फ उनके साथ है जो बीते हुए कल और मौजूदा दौर, दोनों में ही कांग्रेस के सच से वाकिफ नहीं हैं। यह उस पार्टी का मामला है, जिसके देश में अलग-अलग अंतराल में करीब साठ साल के शासनकाल में बेरोजगारी की हालत किसी से छिपी नहीं थी। कांग्रेस ने एक बार में तीस साल लगातार और दो बार दस-दस सरकार चलाई है।

तो याद करें यदि जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आंदोलन ने देश के बड़े हिस्से में युवाओं को तत्कालीन व्यवस्था के खिलाफ लामबंद कर दिया था, तो उसकी प्रमुख वजह यही थी कि युवक-युवतियां उस समय के शासन में अपनी स्थिति को लेकर बुरी तरह आक्रोशित थे। यह वह दौर था, जब किसी परीक्षा में पूछे जाने वाले निबंध से लेकर तमाम विमर्शों के केंद्र में ‘भारत में बेरोजगारी की समस्या’ का बोलबाला रहता था। ऐसे में यह सवाल सहज रूप से उठता है कि जो पार्टी अपने आधी सदी से अधिक वाले शासनकाल में युवाओं के हक और हित की दिशा में कुछ नहीं कर सकी, वह अब यह सब गारंटी की बात किस तरह कर रही है? वह भी तब, जबकि वह कमोबेश एक दशक से देश की सत्ता से बाहर है और उसकी पुराने गौरव के साथ वहां वापसी की तमाम संभावनाएं दम तोड़ चुकी हैं।

पार्टी से बाहर तो दूर, आज तो कांग्रेस के भीतर का भी युवा अपने दल के प्रति आश्वस्त नहीं दिख रहा है। यदि कांग्रेस की रीति-नीति में युवाओं के लिए इतना ही चिंतन होता तो क्या वजह थी कि इस वयस के अनेक नेता कांग्रेस से आज दूर हो चुके हैं? फिर ‘युवा न्याय गारंटी’ के आश्वासनों पर नजर डालिए। पहले एक साल में पांच करोड़ युवाओं को उनका हक देने की गारंटी, 30 लाख खाली सरकारी पदों पर भर्ती, एक करोड़ से अधिक युवाओं को एक लाख से अधिक वेतन और पेपर लीक होने के खिलाफ सख्त कानून। अब जरा पीछे जाइए। याद कीजिए वर्ष 2018 का वह समय, जब राहुल गांधी ने विधानसभा चुनाव के समय मध्यप्रदेश में अपनी सरकार बनने पर दस दिन के भीतर किसानों का कर्ज माफ़ करने की बात की थी। कांग्रेस की सरकार तो बन गई, लेकिन यह वादा महज वादा होकर ही रह गया। न राजस्थान और न ही छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार भी गांधी के इस वचन की लाज रख सकी थीं। क्योंकि यह विशुद्ध रूप से अव्यावहारिक आश्वासन था और ठीक उसी तरह से यह दल एक बार फिर युवाओं के लिए कह रहा है। कांग्रेस को यह देखना चाहिए कि उसने उत्तरप्रदेश के बीते चुनाव में भी ‘लड़की हूं, लड़ सकती हूं’ के नारे के साथ राज्य की युवतियों के लिए घोषणाओं का अंबार लगा दिया था, लेकिन मध्यप्रदेश सहित राजस्थान और छत्तीसगढ़ का सच सबके सामने था, इसलिए काठ की वह हांडी फिर उत्तरप्रदेश में नहीं चढ़ सकी। इसी मामले में उस समय हंसी रोकना और मुश्किल हो जाता है, जब कांग्रेस पेपर लीक को लेकर दावे करती है। जबकि राजस्थान में अशोक गहलोत के समय प्रतियोगी परीक्षाओं के पर्चे बाजार में बिकने का सनसनीखेज कांड सामने आया था। तमाम सबूत इस बात की तरफ इशारा कर रहे थे कि सरकार में बैठे लोगों की मदद से इस घोटाले को अंजाम दिया गया। यदि कांग्रेस इस मामले में इतनी ही संजीदा थी तो क्यों नहीं उसने गहलोत सरकार पर इस दिशा में कोई कार्यवाही की?

एक चुटकुला याद आ गया। राजा के दरबार में गायक ने एक से बढ़कर एक गीत सुनाए। हर गीत के बाद राजा गायक के लिए महंगे इनाम की घोषणा करता चला गया। समय बीतता गया और गायक को एक भी इनाम नहीं मिला। परेशान होकर उसने राजा से फ़रियाद की। राजा बोला, ‘इसमें इनाम देने की बात कहां से आ गई? उस दिन तू मेरे कानों को खुश कर रहा था तो मैंने भी तेरे कान खुश कर दिए थे।’

कांग्रेस जनाधार के रूप में अपनी प्रचंड तंगहाली के बावजूद न जाने किस तरह मंत्रमुग्ध होकर यह गीत सुन रही है कि लोग उसे पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में फिर लाने के लिए उतावले हैं। यह सुनकर पार्टी के कान खुश हो रहे हैं और ऐसा लगता है कि ‘युवा न्याय गारंटी’ के जरिए वह भी प्रत्युत्तर में सामने वाले के कानों को खुश करने का ही प्रयास कर रही है। क्योंकि अतीत से लेकर वर्तमान तक में यह दल अपनी इस तरह की एक भी गारंटी पूरा करने की स्थिति और मनोस्थिति, दोनों में ही नहीं दिख रहा है।