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ये रिश्ता क्या कहलाता है..!

मुख्यमंत्री कमलनाथ ने कल कह दिया कि वह कभी भी गुस्सा नहीं होते। बात की सोदाहरण व्याख्या की गरज से उन्होंने यह भी कह दिया कि जब उन्हें भाजपाई शिवराज सिंह चौहान पर ही क्रोध नहीं आता है तो भला कांग्रेसी ज्योतिरादित्य सिंधिया के लिए यह भाव वे किस तरह अपना सकते हैं। बात रोचक है। लेकिन सत्यान्वेषण की मोहताज भी है। क्योंकि शिवराज पर उन्हें गुस्सा न आना उतना ही सही तथ्य है, जितना बड़ा झूठ यह कि मुख्यमंत्री को सिंधिया पर क्रोध नहीं आया। दिल्ली में मीडिया से सिंधिया के लिए ..तो उतर जाएं वाली बात नाराजगी का सीधा प्रतीक थी।  आगे पढ़ें

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आदिवासियों को अंग्रेजी शराब में डूबकी लगा कर आर्थिक संकट से उबरने की कोशिश में कमलनाथ सरकार

मध्यप्रदेश में शराब की नई दुकानें खोलने का फैसला लेने के साथ कमलनाथ सरकार अब पड़ोसी राज्य गुजरात में शराब तस्करी के लिए झाबुआ को नया हब बनाने की तैयारी में लगती है। गुजरात में शराब तस्करी का रास्ता झाबुआ और अलीराजपुर से होकर ही गुजरता है। झाबुआ में वेयरहाउस खोलने का मतलब होगा शराब की तस्करी को सरकारी संरक्षण में फलने फूलने का मौका देना। सब कुछ झाबुआ के जिला आबकारी अफसर और कलेक्टर पर निर्भर हो जाएगा। अभी भी गुजरात के लिए शराब की जो तस्करी इस जिले से होती है, उसमें सरकारी अमले के साथ जनप्रतिनिधियों और राजनीतिक दलों का भी हिस्सा हर पेटी के हिसाब से तय है। read more  आगे पढ़ें

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उलटा पड़ गया सिंधिया का दांव

नाथ तथा सिंधिया के बीच जो कुछ चल रहा है, वह राजनीतिक शिष्टाचार के क्षरण की प्रक्रिया को और पंख प्रदान करने वाला ही माना जाएगा। सिंधिया को जो बात पार्टी के फोरम पर कहना चाहिए थी, वह उन्होंने सार्वजनिक मंच पर कह दी। नाथ को जिस संयम का परिचय देना चाहिए था, उसे एक किनारे रखकर उन्होंने पहले पांच साल बनाम पांच महीने और फिर तो उतर जाएं जैसी बात कह दी। नतीजा यह कि राज्य सरकार सहित सत्तारूढ़ दल के संगठन का आज समूचे मीडिया में जमकर चीरहरण किया जा रहा है। हालांकि इस वाकये से एक बात साफ है। सिंधिया की स्थिति पार्टी में अब पहले जैसी मजबूत नहीं रह गयी है। क्योंकि यह ध्यान रखना होगा कि कल वाला बयान नाथ ने दिल्ली में पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाकात के बाद दिया था। यानी, यह अनुमान लगाया जा सकता है कि नाथ ने आलाकमान से सिंधिया के बयानों पर बात की और फिर वहां से मिले संकेतों के आधार पर ही उनके लिए दो-टूक वाला भाव अपना लिया। दिग्विजय सिंह डैमेज कंट्रोल में जुट गये हैं। नाथ के कथन के बाद कल पार्टी में सभी साथ हैं वाली बात कहकर वे सियासी रफूगरी के हुनर का परिचय देते नजर आ रहे हैं।  आगे पढ़ें

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अपनी अस्वीकार्यकता को स्वीकारती कांग्रेस

वर्मा ने राजनीतिक आस्था का प्रदेशस्तरीय केंद्र तो काफी समय से खोल रखा है। कमलनाथ की सूरत में। अब इस दिशा में एक और कदम बढ़ाते हुए उन्होंने राष्ट्रीय स्तर के केंद्र के आस्थालय का शुभारम्भ भी कर दिया है। श्रीमती वाड्रा के हालिया गुजरे जन्मदिन पर जो स्तुतिनुमा विज्ञापन वर्मा ने प्रकाशित कराया था, वह वस्तुत: इस बात का भी प्रचार था कि मध्यप्रदेश में विशुद्ध कांग्रेसी प्रक्रिया में फिलहाल उनका कोई सानी नहीं है। बहरहाल, लोक निर्माण मंत्री ने जिस तरह अपने राजनीतिक लोक को और मजबूती देने का जतन किया है, वह अनुकरणीय है। लेकिन यहां यह भी गौरतलब है कि श्रीमती वाड्रा की अगवानी में बिछे उनके उद्गार इस मर्तबा कुछ हद तक अपने राज्य स्तरीय आका यानी मुख्यमंत्री कमलनाथ के मंतव्य का प्रतिनिधित्व भी कर रहे हैं। राज्यसभा की एक सीट के लिए ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस के प्रबल दावेदार हैं। जिनकी इस मंशा को नाथ पूरा होने देना नहीं ही चाहेंगे। इसलिए ऐसा प्रतीत होना गलत नहीं है कि प्रियंका संबंधी यह खबर प्रायोजित है और इसके जरिये कांग्रेस महासचिव को यहां से राज्यसभा तक जाने का सुझाव दिलाया गया है।  आगे पढ़ें

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झाबुआ में नया शराब वेयर हाउस: मोदी से बदला तो नहीं भांज रहे कमलनाथ

मध्यप्रदेश में शराब की नई दुकान खोलने का निर्णय लेने के बाद कमलनाथ सरकार अब पड़ोसी राज्य गुजरात में शराब तस्करी का नया रास्ता खोलने पर आमदा है। गुजरात में शराब तस्करी का रास्ता झाबुआ और अलीराजपुर के रास्ते से ही है। झाबुआ में वेयरहाउस खोलने का मतलब शराब की तस्करी को सरकारी संरक्षण में फलने फूलने की आशंका ज्यादा बलवती होगी। इससे तस्करी की प्रक्रिया भी आसान हो जाएगी। सूत्रों के अनुसार धार के बड़े कांग्रेस नेता और शराब कारोबारी बालमुकंद सिंह गौतम को झाबुआ में डिस्टलरी लगाने की अनुमति देने का प्रस्ताव भी सरकार सरकार के पास पेंडिंग है। read more  आगे पढ़ें

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कांग्रेस में अब सुनामी की जरूरत

एक राष्ट्रीय मीडिया समूह कांग्रेस की सिफर वाली पराजय से शायद बहुत दु:खी हो गया। उसने लिखा कि इस दल ने खुशी से खुदकुशी कर ली है। ताकि भाजपा को जीतने से रोका जा सके। लेकिन यह तथ्य सही नहीं है। कांग्रेस को मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ की ही तरह दिल्ली में भी किस्मत से छींका फूटने की उम्मीद थी। यही वजह रही कि उसने अरविंद केजरीवाल की कोशिशों के बावजूद इस चुनाव में आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन से साफ इनकार कर दिया था। लाख रुपए का सवाल यह कि क्या यह दल इस पराजय के बाद पूरी निष्पक्षता से इसके कारणों की समीक्षा कर सकेगा? क्या उसके शुभचिंतक उस सुरंग में घुसकर हार की वजहों पर प्रकाश डाल पाएंगे, जिस सुरंग के भीतर गांधी-नेहरू परिवार नामक अंधेरा लम्बे समय से कुंडली मारकर बैठा हुआ है? ‘परिवार पूजन’ के कर्मकांड में आकंठ डूबी कांग्रेस यह समझ ही नहीं पा रही कि उसके अध्यक्ष पद पर राहुल गांधी की ताजपोशी के बाद से पार्टी को अधिकांश मौकों पर शर्मनाक हार सहने की आदत-सी पड़ गयी है। सोनिया गांधी का स्वास्थ्य अब उनका साथ नहीं दे पा रहा। लिहाजा प्रियंका वाड्रा को आगे लाया गया।  आगे पढ़ें

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कमलनाथ का डर

1984 के सिख विरोधी दंगे कांग्रेस पर एक ऐसा दाग है जिससे उसका उबरना हमेशा मुश्किल होगा। इसके कारण हैं। जब यह दंगे फैले तब सेना की तैनाती में देर की गई। दिल्ली में तो पुलिस ने दखल देने से इंकार किया। संजय सूरी की किताब, 1984 दि एंटी-सिख वायलेंस एंड आफ्टर, में जिन कांग्रेस नेताओं पर आरोप लगाए गए हैं, उनमें कमलनाथ भी प्रमुख रूप से शामिल हैं। इस किताब में कमलनाथ की उन दिनों की संदिग्ध भूमिका पर विस्तार से बात की गई है। इस किताब में दावा किया गया है कि दंगाई साफ तौर पर किसी के इशारों पर काम कर रहे थे और संगठित थे। जाहिर है, कमलनाथ भले ही संजय गांधी के खास दोस्त रहे हों और इंदिरा गांधी के तीसरे पुत्र भी कहलाते रहे हों लेकिन कांग्रेस में राकेट की तरह ऊपर उठे वे राजीव गांधी के शासनकाल में ही। कांग्रेस की सरकारों के दौरान जिस तरह जगदीश टायटलर, एचकेएल भगत, सज्जन कुमार को बचाने की कोशिश की गई, उसे पूरे देश ने ही देखा है। कांग्रेस इन नेताओं को चुनाव में उतारती रही और वे महत्वपूर्ण पदों पर भी काबिज रहे।  आगे पढ़ें

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भाजपा सांसद द्वारा महात्मा गांधी पर दिए बयान कमलनाथ ने बताया बेहद आपत्तिजनक निंदनीय

मुख्यमंत्री कमलनाथ ने भाजपा सांसद अनंत हेगड़े के महात्मा गांधी पर दिए गए बयान को बेहद आपत्तिजनक और निंदनीय बताया है। उन्होंने मंगलवार को किए ट्वीट में कहा- राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के स्वतंत्रता आंदोलन के समय किए गए सत्याग्रह को भाजपा सांसद द्वारा ड्रामा बताना बेहद आपत्तिजनक है।  आगे पढ़ें

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शिवराज का दर्द......

शिवराज सिंह चौहान आईफा अवार्ड को लेकर कहें कि कांग्रेस सरकार पर सत्ता का नशा सिर चढ़ कर बोल रहा है तो अफसोस के साथ हंसी आना स्वाभाविक है। गोपाल भार्गव की प्रतिक्रिया को नेता प्रतिपक्ष के तौर पर स्वाभाविक और रस्मी आलोचना मानना चाहिए। लेकिन अब अगर कोई पुराना पापी, पाप करने के नए बने अधिकारी को उसके पाप गिनाए तो भैया, थोड़ा समझ में आना मुश्किल है। कमलनाथ तो फिर भी वल्लभ भवन, दिल्ली और छिंदवाड़ा तक खुद को समेट कर रखे हैं। इसलिए थोड़ा कुछ तो कम खर्च हो रहा होगा। वरना, जितना आए दिन शिवराज के प्रदेश भर में कार्यक्रम होते थे, और उनमें भीड़ जुटाने के लिए सरकार का जितना पैसा पूड़ी और पानी की बोतल पर खर्च होता था, वो भी तो आखिर जिम्मेदार अफसर जनता की जेब से ही निकालते होंगे।  आगे पढ़ें

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घर में नहीं हैं दाने और अम्मा चली.....

इंदौर में होने जा रहे आईफा-2020 का आउटडोर स्वरूप तो सब के सामने आ ही रहा है। अब इसके इनडोर वाले मायावी पक्ष की चर्चा भी बहुत जरूरी हो गयी है। मुख्यमंत्री कमलनाथ ने इसके जरिये धनपशुओं की विभिन्न प्रजातियों को खुश करने का बंदोबस्त कर दिया है। इनमें आयोजक सहित उनकी पैरवी करने वाली कांग्रेसी एवं सरकारी अफसरान सहज रूप से शामिल हैं। ऐसा करने का महत्वपूर्ण पक्ष है कि नाथ ने राहुल गांधी की नाराजगी को लगभग धता बताते हुए आईफा के तौर पर करोड़ों रुपए फूंकने का पुख्ता बंदोबस्त कर दिया है। वह रुपए, जिनके न होने की दलील देते हुए ही प्रदेश के किसानों का कर्ज माफ करने की गांधी की घोषणा को अमली जामा नहीं पहनाया जा सका है। नाथ सरकार के एक साल पूरे होने के बावजूद ज्यादातर किसान टुकुर-टुकर उस दिन की राह देख रहे हैं, जब सरकार बनने के दस दिन के भीतर कर्ज माफी की घोषणा से वशीभूत होकर उन्होंने कांग्रेस को वोट दिया था। read more  आगे पढ़ें

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