महाराज-शिवराज गठबंधन की अग्निपरीक्षा का सवाल स्क्रीन पर



कौशल किशोर चतुर्वेदी, भोपाल मध्यप्रदेश के कंप्यूटर की स्क्रीन पर इन दिनों यह सवाल प्रमुखता से है कि महाराज-शिवराज गठबंधन की नैतिकता को मतदाता किस नजरिए से देखने का मन बना रहा है। उन 22 विधानसभा सीटों के मतदाताओं को इसका जवाब देना है जो उपचुनाव में अपना अमूल्य मत देकर कांग्रेस से भाजपा में आए चेहरों को तवज्जो देंगे या फिर सिरे से खारिज कर मध्यप्रदेश में घटे घटनाक्रम का विरोध दर्ज कराएंगे। इसमें यह माना जा रहा है कि भाजपा ने पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ पार्टी में शामिल हुए उन 22 विधायकों को टिकट देकर उपचुनाव में किस्मत आजमाने पर सहमति जता दी है। तो स्क्रीन पर आने वाले सवाल के चार संभावित उत्तर भी कल्पित किए जा सकते हैं


पहला जवाब है कि अपने अधिकार का उपयोग कर कांग्रेस को छोडक़र विधायकों ने कोई गलत काम नहीं किया है। अपने स्वाभिमान क रक्षा के लिए उन्होंने सर्वथा उचित कदम उठाया। इसके साथ ही मतदाता इन उपचुनाव में सालों कांग्रेसी चेहरे रहे उन उम्मीदवारों को अपना अमूल्य समर्थन देकर महाराज-शिवराज गठबंधन को सौ फीसदी स्वीकारोक्ति दे देगी। दूसरा जवाब है कि कांग्रेस के कुछ मतदाता भी सिंधिया के प्रभाव क्षेत्र वाली सीट पर उनके इस कदम का साथ देंगे। तो कुछ उनके विरोध में खड़े दिखाई देंगे। साथ ही भाजपा के कार्यकर्ता भी समर्थन-विरोध के खेमे में बंट जाएंगे और इन 22 सीटों पर परिणाम मिश्रित दिखाई देगा।


ऐसे में निर्दलीय विधायकों को साथ मिलाकर और उपचुनाव में विजयी सीटें विजय तिलक लगाकर आधे मन से शिवराज-महाराज गठबंधन पर मुहर लगा देंगे। तीसरा जवाब है कि जिस तरह कांग्रेस के चेहरे भाजपा के टिकट पर मैदान में होंगे, उसी तरह ऐसी स्थितियां बनेंगी कि भाजपा के साथ सालों का साथ निभा रहे चेहरे अपनी नाराजगी जताते हुए कांग्रेस के टिकट पर संविधान और लोकतंत्र के साथ खिलवाड़ का हवाला देंगे। ऐसे में आधे से कम सीटें भाजपा के खाते में आएंगी और भाजपा सरकार एक बार फिर उसी तरह के भंवर में उलझ जाएगी जिस तरह 15 साल बाद प्रदेश में बनी कांग्रेस सरकार 15 महीने तक उलझी रही थी।


और अब कांग्रेस इस तरह की बयानबाजी करती दिखाई देगी कि भाजपा सरकार अपने बोझ से खुद ही गिरेगी तब फिर कांग्रेस सरकार बनाएगी। कांग्रेस सरकार को गिराने के लिए कुछ नहीं करेगी। अंतिम जवाब है कि कांग्रेस से जुड़े मतदाता ऐसे प्रत्याशी का समर्थन नहीं करेंगे जिसे जनता ने पांच साल के लिए चुना था और जो अपने स्वार्थों की खातिर पार्टी को दरकिनार करते हुए करीब डेढ़ साल में ही फिर मतदाता के सामने यह उम्मीद लेकर पहुंच चुका है कि जनता उसके इस कदम को तवज्जो देगी। मतदाता उनके मत के साथ किए गए खिलवाड़ का विरोध जताते हुए प्रत्याशी और महाराज-शिवराज गठबंधन को सिरे से नकार देगी।


मतदाता के सामने चुनौती: अब निर्णायक इन 22 विधानसभा सीटों का मतदाता ही होगा और यदि भाजपा उन सभी चेहरों को मैदान में उतारेगी तो उसके सामने यह बड़ी चुनौती भी रहेगी कि जिस 15 साल की भाजपा सरकार से आक्रोशित होकर अपनी विधानसभा में उन्होंने कांग्रेस के जिस प्रत्याशी को जिताया था। अब उसी प्रत्याशी को भाजपा सरकार को मजबूत करने के लिए जिताने का फैसला लेना कहीं न कहीं उन्हें आंतरिक विरोधाभास का सामना करने पर तो मजबूर करेगा ही। एक तरफ मामा-महाराज का एक और एक मिलकर दो नहीं बल्कि ग्यारह होने का हौसला असर दिखाएगा तो दूसरी तरफ संविधान-लोकतंत्र की दुहाई देते हुए 15 महीने के कामों का हवाला देती कांग्रेस और कमलनाथ अनैतिकता और अलोकतांत्रिक कदम के खिलाफ हुंकार भरेंगे। फिलहाल पंद्रह साल बाद मध्यप्रदेश में जो वक्त बदलाव लेकर कांग्रेस को सिंहासन पर आरूढ़ करने का साक्षी बना था, वही वक्त एक बार फिर उपचुनाव के परिणामों का साक्षी बनने के लिए तैयार है। महाराज-शिवराज गठबंधन की अग्निपरीक्षा का सवाल स्क्रीन पर है और जवाब वक्त के साथ आना तय है। परिणाम कुछ भी हो लेकिन मध्यप्रदेश के राजनीतिक इतिहास में यह शिवराज-महाराज गठबंधन को परिभाषित जरूर करता रहेगा।


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