एक्चुअल और वर्चुअल का खेल जारी ... जीत-हार पर नज़रें सारी ...



कौशल किशोर चतुर्वेदी मध्यप्रदेश में एक्चुअल और वर्चुअल का खेल लगातार जारी है। राजनेताओं ने इस खेल में रेफ़री बनकर निर्णायक भूमिका निभाने की एक असफल कोशिश कर ली है पर अब शायद ही दोबारा ऐसा दुस्साहस करने की हिम्मत जुटाएँ। हालाँकि नेता के साहसी-दुस्साहसी होने के बीच एक झीना सा परदा ही मौजूद रहता है जिसे कब तार-तार कर दिया जाए यह तो ऊपर वाला भी नहीं जान सकता। अब जब कोरोना की शुरुआत हुई तब भाजपा-कांग्रेस दोनों खेमे राजनीतिक अवसरवादिता के तहत कोरोना की व्याख्या करते नज़र आए थे


बाद में जहाँ एक दल कोरोना का भय महसूस कर रहा था और सत्ता में होने के नाते विधानसभा सत्र की बैठकों को टाल रहा था तो दूसरा खेमा डरो ना, डरो ना का नारा देकर सरकार में बैठे चेहरों को आइना दिखा रहा था। इसके बाद लॉकडाउन -अनलॉक पर भी बहस का लंबा दौर चला। एक खेमा लॉकडाउन को हवा में उछाल रहा था तो दूसरा खेमा लॉकडाउन को कोरोना के लिए संजीवनी समाधान मान रहा था। पर दूसरा खेमा भी लॉकडाउन के साइड इंफ़ेक्ट्स को नज़रअंदाज़ न कर सका और अनलॉक-1 और अनलॉक-2 सरीखे उपाय कर कोरोना को दरकिनार करने का दुस्साहस करने में देरी नहीं की।


पर कोरोना ने जल्दी ही सरकार को आइना दिखा दिया और ‘भय बिन होई न प्रीत’ की तर्ज़ पर बढ़ते मरीज़ों और मौतों को देखकर सरकारें एक बार फिर डरीं। फिर देश लॉकडाउन की चक्की में पिस रहा है ताकि कोरोना से बचाव के बेहतर तरीक़ों के आने तक घर में बंद होकर जान बचाई जा सके। जब तक है दम, तब तक हैं हम ... की तर्ज़ पर अब जान बचाने की जुगत जारी है। हालाँकि कोरोना के इस भयावह दौर में मध्यप्रदेश की धरती और धरतीवासियों ने नेताओं का चाल, चरित्र और चेहरा बख़ूबी देखा। कोरोना में सत्ता पलटने के बाद उपचुनावों के मद्देनज़र दोनों ही प्रमुख दलों ने एक्चुअल और वर्चुअल का खेल मनमर्जी से खेला।


कभी वर्चुअल सभाएँ की, प्रेस कांफ्रेंस कीं तो कभी सदस्यता दिलाने के नाम पर सोशल डिस्टेंसिंग और मास्क जैसे मापदंडों की धज्जियाँ उड़ाई गईं। राजनीतिक आयोजनों का खेल चला तो उपचुनाव जीतने के लिए दावेदार कोरोना को मुँह चिढ़ाते हुए अपने क्षेत्रों में बाहुबली बनकर हाथ हिलाते, गिले शिकवे मिटाते और भविष्य के सपने दिखाते लगातार नज़र आते रहे। क्योंकि उन्हें चिंता है कि वर्चुअल के नाम पर उनका हाल कोरोना से भी ज़्यादा भयावह न हो जाए और जनता तो जैसा चाहो वैसा दिखने को हमेशा तैयार रहती है। कहो तो घरों में बंद और कहो तो बाज़ारों में बिना डरे भीड़ का हिस्सा बनने को तैयार। पर एक्चुअल का ड्रामा प्रदेश, देश और दुनिया पर भारी पड़ रहा है।


ज़िम्मेदारों का ग़ैर ज़िम्मेदाराना व्यवहार उन पर ही भारी पड़ चुका है। मध्यप्रदेश के मुखिया शिवराज सिंह चौहान जब से खुद कोरोना पॉज़िटिव हुए हैं तब से वर्चुअल की महिमा हज़ार गुना ज़्यादा बढ़ गई है। मध्यप्रदेश पहला राज्य बन गया है जहाँ कैबिनेट की बैठक वर्चुअल के सहारे अंजाम तक पहुँची है। आगे हर दिन इस तरह के नए-नए रिकार्ड बनने वाले हैं। पहली मर्तबा नेताओं का जनता से एक्चुअल प्रेम हारता नज़र आ रहा है और वर्चुअल के माथे पर जीत का सेहरा बँधता दिख रहा है। पर अभी इसे निर्णायक नहीं माना जा सकता क्योंकि भारतीय राजनीति, जनता और नेता फिलहाल एक्चुअल के मोह से इतनी आसानी से मुक्त नहीं हो सकते। प्रयास जारी हैं, एंटीबॉडीज के साथ कोरोना को मात देने वाले मरीज़ों की संख्या बढ़ रही है, वैक्सीन पर दिन-रात वैज्ञानिक-डॉक्टर शोध में रत हैं...जल्दी ही उस दिन का इंतज़ार है जब वर्चुअल को कोने में धकेलकर अखाड़े में पूरे कुनबे के साथ एक्चुअल में नेता, मतदाता, जनता और कोरोना हंता कभी भी एक साथ नज़र आ सकते हैं। नज़रें गढ़ाए रहिए...या तो पूरा दृश्य बदलकर रहेगा या फिर बदलने की गुंजाइश पूरी तरह से खत्म हो जाएगी।


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