सवालों के घेरे में रामराज्य ...!



कौशल किशोर चतुर्वेदीपूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की जयंती और कांग्रेस कार्यकर्ता द्वारा दिए गए एक विज्ञापन ने एक बार फिर राम राज्य को चर्चा में ला दिया है।एक बार फिर वही रामराज्य सवालों के घेरे में है जो त्रेता युग से सीता की अग्नि परीक्षा, राम के राजा बनने के बाद सीता के वनवास और फिर सीता के पृथ्वी के आग़ोश में समाकर जीवन को ख़त्म करने के नज़रिए से आम आदमी के मन को बार-बार कचोटता रहा है। कहीं आज फिर उसी रामराज्य की बात तो नहीं हो रही है? या फिर राम के इन फैसलों को ताक पर रखकर रामराज्य के नाम पर सत्ता की छीनाझपटी का खेल एक बार फिर खेला जा रहा है। नंगी आँखों से देखा जाए तो देश की राजनीति पिछले 30 साल से राम के इर्द गिर्द ही सिमटी हुई है। मज़ेदार बात यह है कि राम पर दावा करने वाले सभी जन यह स्वीकार करते हैं कि राम सभी के हैं


और राम की मानें तो वह शरणागत की रक्षा करने में सिद्ध हैं। ऐसे में फिर राम के देश में बार-बार राम के नाम पर घमासान की नौबत आख़िर क्यों आती है?इसका जवाब तलाशने की बजाए राजनीति पूरी तरह श्रीराम को अपने पाले में लाने के लिए एक दूसरे पर कीचड़ उछालने से बाज़ नहीं आती। निश्चित तौर पर राम भारत के आदर्श पुरूष हैं। और हर राम भक्त के दिल में समाए हुए हैं।फिर इस राम को भाजपा, कांग्रेस और राजनैतिक दल बार-बार राजनीतिक अखाड़े में लाकर आख़िर क्या साबित करना चाहते हैं? और यदि कोई कहता है कि राम हमारे हैं तो यह मुद्दा सिर चढ़कर क्यों बोलने लगता है? जबकि यह बात सभी को मालूम है कि रामराज्य बार-बार नहीं आता।त्रेतायुग में भी रामराज्य सिर्फ़ तभी था जब तक राम राजा थे...उनके उत्तराधिकारियों के समय में भी लगातार स्थितियों में पतन होता रहा और अंतत: युग ही बदल गया।


द्वापर-युग आया और कलियुग आ गया। कलियुग में भी राजतंत्र ख़त्म हो गया और लोकतंत्र की नींव रखी गई। राम एक राजा थे और जब देश में राजतंत्र ही ख़त्म हो गया तो फिर राम राज्य की बात क्यों हो रही है? राम राज्य की कल्पना राम के इर्द गिर्द समाई हुई है और लोकतंत्र की कल्पना संविधान के इर्द-गिर्द सिमटी है।फिर आज संविधान के राज्य की बात क्यों नहीं होती? अगर राम राज्य की बात की जाए तो आज़ाद देश में कभी जवाहर का राज्य था, कभी लाल बहादुर शास्त्री का राज्य था, कभी इंदिरा का राज्य था, कभी राजीव का राज्य था, कभी अटल बिहारी का राज्य था, कभी मनमोहन का राज्य था और आज नरेंद्र मोदी का राज्य है।


क्या आमजन इस बात को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं या फिर राजनेता भी यह बात स्वीकार कर सकते हैं? और यदि यह बात स्वीकार की जाती है तो संवैधानिक व्यवस्था के तहत क्या यह देश के राष्ट्रपति का अपमान नहीं है? या फिर क्या हमें यह नहीं कहना चाहिए कि देश में पहले राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद से लेकर आगे बढ़ते हुए अब रामनाथ कोविंद का राज्य चल रहा है।अगर संवैधानिक व्यवस्था की बात करें तो क्या यह प्रश्न तार्किकता की कसौटी पर खरा नहीं उतरता ? क्या यह बात सही नहीं है कि रामराज्य शब्द का वर्तमान परिस्थितियों में दुरुपयोग मात्र हो रहा है।


आज ज़रूरत है अपराध मुक्त समाज की ताकि मासूम बच्चियाँ बलात्कार का शिकार न हो सकें...महिलाएँ भी सिर ऊँचा कर जी सकें...कोई हत्या-आत्महत्या का शिकार न हो, आज ज़रूरत है हर हाथ को रोज़गार की, आज ज़रूरत है महिलाओं के सम्मान की, आज जरूरत है किसानों के कल्याण की, आज जरूरत है मज़दूरों-श्रमिकों के स्वाभिमान की रक्षा की, आज ज़रूरत है सबके दिल में सद्भाव की, आज ज़रूरत है अमीरी ग़रीबी के बीच बढ़ती खाई को पाटने की, आज ज़रूरत है कुपोषण भुखमरी मिटाने की, आज ज़रूरत है नफ़रत को ख़त्म करने की, आज ज़रूरत है भ्रष्टाचार रूपी दानव को दफ़न करने की, आज ज़रूरत है हर आँख के आँसू पोंछने की, आज ज़रूरत है राम के आचरण को आत्मसात करने की.....क्या राम के नाम पर वोट माँगने वाले या रामराज्य की बात करने वाले यह दावा कर सकते हैं कि उनकी सरकार आएगी तो समाज से सारी बुराइयाँ ख़त्म हो जाएँगी और वसुधैव कुटुम्बकम के भाव के साथ अच्छाइयों का डंका पूरी दुनिया में बजने लगेगा? इस बात का जवाब न तो किसी के पास है और न ही कोई देने को तैयार है। फिर आख़िर रामराज्य का मुद्दा आज कितना प्रासंगिक बचा है? कही रामराज्य की बात कर वर्तमान मुद्दों से ध्यान तो नहीं भटकाया जा रहा है। अब अगर ज़रूरत है तो जन-जन के जागरूक होने की...जो संविधान और लोकतंत्र का हवाला दे सकें और राजनेताओं, नौकरशाहों और मनमानी करने वाले आम-ख़ास सभी को हर समय सबक़ सिखाने में सक्षम हो। ताकि देश का हर नागरिक सम्मान के साथ जीवन का निर्वाह कर सके।


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