आदत’ के मारों की आंख में खटक रहे कमलनाथ!!!



आलोचना करना बहुत आसान है। सुझाव देना तो उससे भी अधिक सरल प्रक्रिया है। इन दो हुनर के धनी लोगों के लिए ही किसी ने लिखा है, ‘ए मौजे-हवादिस उनको भी दो-चार थपेड़े हल्के से, कुछ लोग अभी तक साहिल से तूफां का नजारा करते हैं।’ यह प्रस्तावना कमलनाथ सरकार के छमाही कार्यकाल के लिए लिखी गयी है। क्योंकि 181 दिनों की इस अवधि में इस सरकार के हिस्से में दुश्वारियां और आलोचनाएं ही ज्यादा आ सकी हैं। किसानों का कर्ज पूरी तरह माफ नहीं हुआ। सरकार कर्ज पर कर्ज ले रही है। बच्चियों के खिलाफ अपराध बढ़ रहे हैं। इनमें से किसी भी आरोप से इनकार नहीं किया जा सकता। किंतु इनके पीछे कारण भी तो हैं। जेनुइन। मुंह फाड़कर खाली दिख रहे खजाने के बूते पर भला कैसे किसानों का अरबों का कर्ज महज दस दिन में माफ हो सकता है? यह खजाना नाथ  ने खाली नहीं किया


इसका बंदोबस्त तो राज्य की पूर्ववर्ती सरकार ही कर गयी थी। फिर कर्ज लेने में तो शिवराज भी कभी पीछे नहीं रहे। वह भी कई ऐसी योजनाओं के नाम पर भी, जिनका वास्तव में जनता की बुनियादी जरूरतों से कोई लेना-देना ही नहीं था। अधिकांश कार्यक्रम तत्कालीन सरकार की छवि  चमकाने के लिए किये गये। बच्चियों के खिलाफ अपराध के लिए इस सरकार को घेरना गलत नहीं है। आखिर कानून-व्यवस्था राज्य का ही विषय है, किंतु इस घेरबंदी की जद में यह तथ्य भी तो शामिल रहे कि बीती सरकार के कार्यकाल में ही यह राज्य रेप के मामलों में देश में  पहले नंबर पर पहुंच गया था। वह कार्यकाल, जिसमें बच्चियों के रेपिस्ट को फांसी देने का कानून तो बना, लेकिन एक भी घोषित दोषी को इसकी सजा नहीं मिल सकी।  हां, तबादले-दर-तबादले वाली नीति समझ से परे है। कुछ हद तक अखरती भी है।


लेकिन सरकारी तंत्र में  पंद्रह साल वाली विचारधारा की मजबूत की गयी सीमेंट को  पूरी तरह हटाने के लिए लम्बी प्रक्रिया की दरकार तो होती ही है। नाथ शायद वही करने का प्रयास कर रहे हैं। किंतु इसे बदले की राजनीति नहीं कहा जा सकता। क्योंकि पूर्ववर्ती सरकार से बदला लेने के तो अनेक अवसर सामने होने के बाद भी नाथ ऐसा करने का जतन करते नजर नहीं आते। व्यापमं कांड, नर्मदा किनारे हुआ तथाकथित पौधरोपण, ई टेंडरिंग घोटाला और सहकारिता घोटाला, वर्तमान सरकार इन्हें लेकर कोई उतावली नहीं दिखा रही। तब भी नहीं, जबकि रह-रहकर यह संकेत मिलते रहे कि प्रदेश में कांग्रेस तथा बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी के विधायकों को तोड़ने का प्रयास किया जा रहा था।  नाथ का दीर्घकालीन राजनीतिक अनुभव है। वह केंद्र में मंत्री रह चुके हैं।


छिंदवाड़ा को उन्होंने विकास का मॉडल बनाया है। इसलिए यह उम्मीद मजबूती से कायम है कि प्रदेश के विकास के लिए भी वह अपने तजुर्बे तथा योजनाओं को लागू करेंगे। यह तथ्य  नहीं बिसराया जाना चाहिए कि छह महीने के इस छोटे-से कार्यकाल में नाथ सरकार को लम्बी अवधि की आचार संहिता का सामना भी करना पड़ा है। जिसके चलते निश्चित ही विकास तथा जन-कल्याण के कई कार्यक्रमों की अवधि कुछ लम्बी ख्ािंच गयी है। किंतु अभी मियाद खत्म तो नहीं हुई है। तो फिर इतनी चिल्लपों का क्या अर्थ रह जाता है! यदि यह तर्क दिया जाता है कि नाथ सरकार की नीतियों के चलते ही कांग्रेस को यहां आम चुनाव में महज एक सीट हासिल हुई है तो यह बता दें कि लोकसभा चुनाव पूरी तरह मोदी पर केंद्रित था।


लिहाजा जिस तरह प्रदेश में भाजपा की धमाकेदार सफलता का श्रेय शिवराज सिंह चौहान को नहीं दिया जा सकता, उसी तरह कांग्रेस की दुर्गति का ठीकरा भी नाथ के ऊपर  नहीं ही फोड़ा जा सकता है।  कहीं ऐसा तो नहीं कि नाथ की आलोचना एक खास ‘आदत’ का शिकार होकर की जा रही हो। आदत, कम से कम बीते तेरह साल तक लगातार लच्छेदार बातें सुनने की। काम हो या न हो, लेकिन उसका सतत रूप से यशगान करने की। पेट्रोलियम पदार्थों के दाम की आग लगातार भयावह रूप लेती जाए, मगर शीतल फुहारदार जुमलेबाजी को सच मान लेने की। परेशान किसान गोलियों से भून दिया जाए, किंतु भावांतर की भांग के नशे में धुत रहने की। हत्या के मामले में अदालत द्वारा आरोप तय कर लिए जाने के बावजूद कोई मंत्री बना रहे, पर सरकार को कानून-व्यवस्था की सच्ची पहरेदार मान लेने की। शायद नाथ में ऐसी तिकड़मों वाली कलयुगी खूबी नहीं है, इसीलिए वह ‘आदतों’ के मारों की आंख में खटक रहे हैं। हो सकता है कि यह उपसंहार एकतरफा लगे, किंतु जिस भी तरफ हो, सच तो सच ही होता है। नाथ को काम कर लेने दीजिए। बहुत मुमकिन है कि विरोध करने वालों की ‘आदतें’ कुछ सुधर जाएं। 

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रत्नाकर  त्रिपाठी

रत्नाकर त्रिपाठी

रत्नाकर त्रिपाठी की गिनती प्रदेश के उन वरिष्ठ पत्रकारों में होती है जिन्हें लेखनी का धनी माना जा सकता है। राष्ट्रीय सहारा, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर सहित कई अखबारों और ई टीवी तक अपनी विशिष्ट छाप छोड़ने वाले रत्नाकर प्रदेश के उन गिने चुने संपादकों में से एक है जिनकी अपनी विशिष्ट पहचान उनकी लेखनी से है।



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