फिर लड़ने पर आमादा दो मुल्क



ईरान को अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का एक धमकी भरा संदेश मिला है, जिसमें चेतावनी दी गई है कि अमेरिका उस पर हमला कर सकता है। ईरान के राष्ट्रपति हसन रौहानी की इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आयी है। लेकिन उनके तेवर ट्रम्प के मुल्क के खिलाफ तीखे दिख रहे हैं। इससे पहले बीते गुरुवार को ईरान ने फारस की खाड़ी से लगे होरमोजगन प्रांत के समुद्र क्षेत्र में एक अमेरिकी टोही ड्रोन को मार गिराया था, जिससे तिलमिलाए हुए अमेरिका ने यह धमकी भरा संदेश दिया है। ड्रोन का मामला तो बहाना है। सच तो यह कि इन देशों के बीच बीते करीब चालीस साल से तनाव के संबंध बने हुए हैं। मामला इतना बढ़ गया है कि दोनो मुल्क फिर लड़ने पर आमादा हो गये हैं


आखिर क्या है इस टकराहट की वजह और कौन-कौन चेहरे अतीत से लेकर वर्तमान तक इसके अहम किरदार रहे हैं, इसकी जानकारी दे रही है आज की हमारी यह विशेष सामग्री इन दो देशों के बीच यह तनातनी लगभग चार दशक पहले शुरू हुई थी। सन 1971 में यूगोस्लाविया के तत्कालीन राष्ट्रपति जोसिप ब्रोज टीटो, मोनाको के प्रिंस रेनीअर और राजकुमारी ग्रेस, अमेरिका के उपराष्ट्रपति सिप्रो अग्नेयू और सोवियत संघ के स्टेट्समैन निकोलई पोगर्नी ईरानी शहर पसेर्पोलिस में जुटे थे। इस पार्टी का आयोजन ईरानी शाह रजा पहलवी ने किया था। पार्टी के आठ साल बाद ईरान में नए नेता अयतोल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी का आगमन हुआ और उन्होंने इसे शैतानों का जश्न  कहा था।


सन 1979 में ईरान में इस्लामिक क्रांति से पहले खुमैनी तुर्की, इराक और पेरिस में निर्वासित जीवन जी रहे थे। खुमैनी, शाह पहलवी के नेतृत्व में ईरान के पश्चिमीकरण और अमेरिका पर बढ़ती निर्भरता के लिए उन्हें निशाने पर लेते थे। 1953 में अमेरिका और ब्रिटेन ने ईरान में लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसादेग को अपदस्थ कर पहलवी को सत्ता सौंप दी थी। मोहम्मद मोसादेग ने ही ईरान के तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण किया था और वो चाहते थे कि शाह की शक्ति कम हो। यहां से हुई यूएस की एंट्री किसी विदेशी नेता को शांतिपूर्ण वक्त में अपदस्थ करने का काम अमेरिका ने पहली बार ईरान में किया था। लेकिन यह आखिरी नहीं था। इसके बाद अमेरिका की विदेश नीति का यह एक तरह से हिस्सा बन गया।


1953 में ईरान में अमेरिका ने जिस तरह से तख्तापलट किया, उसी का नतीजा 1979 की ईरानी क्रांति थी। इन 40 सालों में ईरान और पश्चिम के बीच कड़वाहट खत्म नहीं हुई। इस्लामिक रिपब्लिक ईरान से चार दशकों की असहमति का नतीजा यह मिला कि न तो ईरान ने घुटने टेके और न इलाके में शांति स्थापित हुई। यहां तक कि अमेरिका में ट्रम्प के आने के बाद से दुश्मनी और बढ़ गई है। बीते साल अमेरिका ने 2015 में हुए ईरान परमाणु समझौते से खुद को अलग कर लिया था। इसके बाद ट्रम्प ने उस पर कई तरह के प्रतिबंध लगा दिए। मकसद था उस पर दबाव बनाना। लेकिन, ईरान के न झुकने के बाद बीते अप्रैल में अमेरिका ने उसके खिलाफ एक के बाद एक कई और बड़े फैसले लिए। इनके बाद से इन दोनों देशों के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ गया है।


खुमैनी की सख्ती से और बिगड़ा मामला सत्ता में आने के बाद उग्र क्रांतिकारी खुमैनी की उदारता में अचानक से परिवर्तन आया। उन्होंने खुद को वामपंथी आंदोलनों से अलग कर लिया और विरोधी आवाजों को दबाना तथा कुचलना शुरू कर दिया। क्रांति के परिणामों के तत्काल बाद ईरान और अमेरिका के राजनयिक संबंध खत्म हो गए। तेहरान में ईरानी छात्रों के एक समूह ने अमेरिकी दूतावास को अपने कब्जे में लेकर 52 अमेरिकी नागरिकों को एक साल से ज्यादा समय तक बंधक बनाकर रखा था। कहा तो यह भी जाता है कि इस घटना को खुमैनी का मौन समर्थन प्राप्त था। इन सबके बीच सद्दाम हुसैन ने 1980 में ईरान पर हमला बोल दिया। ईरान और इराक के बीच आठ सालों तक युद्ध चला। इसमें लगभग पांच लाख ईरानी और इराकी सैनिक मारे गए थे। इस युद्ध में अमेरिका सद्दाम हुसैन के साथ था। यहां तक कि सोवियत यूनियन ने भी सद्दाम हुसैन की मदद की थी। यानी इस बहुत लम्बी जंग ने ईरान को अमेरिका से नाराज होने का एक और मौका दे दिया था।

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