मध्यप्रदेश: बढ़ती जा रही है मानदेय घोटाले की राशि, दो से बढ़कर 12 करोड़ पहुंचा आंकड़ा



भोपाल। महिला बाल विकास विभाग में हुए मानदेय घोटाले की राशि बढ़ती ही जा रही है। करीब डेढ़ साल में यह राशि दो करोड़ से बढ़कर 12 करोड़ रुपए का आंकड़ा पार कर गई है। अब इसमें यात्रा भत्ता और चिकित्सा बिलों की राशि के फर्जी बैंक खातों में भुगतान की गड़बड़ी भी जुड़ गई है। विभाग के अफसरों की टीम मामले की विस्तार से जांच कर रही है। इस घोटाले का खुलासा राजधानी से हुआ और अब पूरे प्रदेश में गड़बड़ी की आशंका जताई जा रही है


विभाग लंबे समय से आंगनबाड़ी कार्यकतार्ओं, सहायिकाओं को दोहरा मानदेय और भवनों का दोहरा किराया दे रहा था। मानदेय घोटाले में नित नई परतें खुल रही हैं। आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं , सहायिकाओं और भवनों के किराए के बाद इस घोटाले में यात्रा भत्ता बिल और चिकित्सा बिल भी जुड़ गए हैं। कोषालयों की सूचना पर विभाग ने इनकी भी जांच शुरू कर दी है। इसमें गड़बड़ी पकड़ में आ रही है।


सूत्र बताते हैं कि कार्यकतार्ओं, सहायिकाओं के नाम से यात्रा और चिकित्सा बिल लगाकर राशि फर्जी बैंक खातों में ट्रांसफर करवाई जा रही है। ऐसे ही कुछ मामलों में अधिकारियों और कर्मचारियों के नाम से भी बिलों का भुगतान हुआ है। राजधानी में कोषालय ने इस गड़बड़ी को पकड़ा। फिर रायसेन, मुरैना, विदिशा, जबलपुर, कटनी, बालाघाट सहित अन्य जिलों में भी बिलों के भुगतान में गड़बड़ी सामने आई है। मामले की जांच विभाग के वित्त सलाहकार राजकुमार त्रिपाठी के नेतृत्व में गठित समिति कर रही है।


उल्लेखनीय है कि डेढ़ साल पहले राजधानी की आठ परियोजनाओं में आंगनबाड़ी कार्यकतार्ओं, सहायिकाओं के मानदेय और भवनों के किराए का दोहरा भुगतान करने का मामला सामने आया था। इसमें कार्यकतार्ओं और सहायिकाओं को माह में दो बार मानदेय और किराए के भवनों में चल रही आंगनबाड़ियों को दोहरा किराया दिया जा रहा था। मध्य प्रदेश के महालेखाकार ने इस मामले को पकड़ा और विभाग को सूचना दी थी। विभाग ने जिला, संभाग और राज्य स्तर से चार बार जांच कराई, फिर भी मामला पकड़ में नहीं आया।


आखिर पांचवीं बार में मामला पकड़ में आया और तभी से लगातार जांच चल रही है। इस मामले में राजधानी के आठ परियोजना अधिकारियों और पांच लिपिकों के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज कराई गई है, लेकिन अब तक उनकी गिरफ्तारी नहीं हुई है। ऐसे कर रहे थे गड़बड़ी आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं, सहायिकाओं और कर्मचारियों के नाम से यात्रा भत्ता और चिकित्सा बिल लगाए जाते हैं। विभाग से बिल स्वीकृत होने के बाद कोषालय को भुगतान के लिए भेजते हैं, उसी दौरान बैंक खातों की सूची बदल दी जाती है। सूत्र बताते हैं कि कोषालय को दी जाने वाली सूची में फर्जी बैंक खाते होते हैं, जिनमें भुगतान हो जाता है। अब इन्हीं खातों की जांच की जा रही है, ताकि पता चल सके कि राशि किसके माध्यम से कहां जा रही थी। 

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