मध्यप्रदेश में कोरोना पर्यटन क्यों नहीं...?



आपदा पर्यटन प्रेमी सरकार से आरामतलब कमलनाथ के सवाल के मायने देश में लॉक डाउन को 53 दिन पूरे हो गए हैं। अब 18 मई से इसका चौथा चरण आने को है, लेकिन अभी तक सियासी कोरोना पर्यटन शुरु नहीं हुआ। क्यों नहीं हुआ? इस सवाल का जवाब घर में भी घोषित-अघोषित मास्क लगाए बैठे लोग जानते हैं। नहीं जानते हैं तो सिर्फ कमलनाथ। मध्यप्रदेश में 15 महीने मुख्यमंत्री रहे कमलनाथ ने आम जनता के ह्रदय में चुभ रहा सवाल पूछा है कि कोरोना संकट से मध्यप्रदेश को उबारने के लिए बने मंत्रिमंडल का कोई सदस्य अब तक किसी भी कोरोना प्रभावित जिले अथवा प्रभावितों के बीच (कोरोना पर्यटन पर) क्यों नहीं पहुंचा? लॉकडाउन में जनता को हो रही तकलीफ को देखने का साहस क्यों मुख्यमंत्री या उनका कोई मंत्री नहीं जुटा पाया? पहली नजर तो क्या किसी भी नजर में कमलनाथ का सवाल जायज लगता है, लेकिन क्या करें, दूसरे की जान से ज्यादा अपनी जान की फिक्र सभी को होती है। सो सेनिटाइज बंगलों में भी जो लोग मास्क और दस्ताने पहन कर बैठते हों


मंत्रालय में इन अस्त्र-शस्त्र के साथ भरपूर सोशल डिस्टेंसिंग रखते हों। रुबरु मीटिंग की जगह वीडियो कांफ्रेंसिंग करते हों, वे क्यों कर सड़क पर सैकड़ों किमी पैदल चल रहे मजदूर और मजबूर के बीच जाकर अपनी जान का जोखिम लेंगे? कैसे कोरोना हॉटस्पॉट इंदौर या भोपाल की सड़कों पर घूमेंगे? उनकी सुरक्षा का प्रोटोकॉल आड़े आए उससे पहले कोरोना का डर रास्ता रोक लेता है। जनता के प्रति जवादेह सरकार से कमलनाथ का सवाल इसलिए भी जायज लगता है क्योंकि मध्यप्रदेश में वो किसान का बेटा शिवराज सिंह चौहान मुख्यमंत्री है, जिसे जनता के सुख-दुःख के आगे अपना कोई सुख-दुःख दिखाई नहीं देता। 13 साल की पिछली भाजपा सरकार में शिवराज का वल्लभ भवन से ज्यादा वक्त प्रदेश के दौरों में बीता। कहीं ओला गिरे, अगले दिन किसानों को दिलासा देने ओले की मार से पटी फसल पर शिवराज हाजिर। कहीं पाला पड़ा तो दिलासा देने खेत की मेड़ पर मामा का उड़नखटोला उतर पड़ता था। वर्षा का कहर हो या सूखे की चपेट अथवा कोई दुर्घटना सांत्वना देने और ढाढस बंधाने मुख्यमंत्री पीड़ितों के बीच होते थे।


पेटलावद में बारुदी विस्फोट से 88 लोगों के जान गंवाने की घटना कौन भूल सकता है। दिवंगतों के परिजनों की नाराजगी की तमाम प्रशासकीय आशंका को परे धर शिवराज दुःखी लोगों के साथ सड़क पर बैठे दिखाई दिए थे। उनके इस अपनत्व भाव ने लोगों को बड़ी राहत दी थी। और तो और मंदसौर गोलीकांड में अपनी ही सरकार के अफसरों की लापरवाही पर क्षोभ जताने वे उपवास पर बैठ गए थे। कौन भुला सकता है कि किसान हितैषी मुख्यमंत्री का उपवास तुड़वाने मृतक किसानों के परिजन मंदसौर से साढ़े 300 किमी का सफर कर भोपाल तक दौड़े चले आए थे। इतने रहमदिल शिवराज आपदा में फंसे आम आदमी को लेकर कभी निर्दयी नहीं हो सकते। कोई तो मजबूरी उन्हें मंत्रालय से मॉनिटरिंग तक बांध कर रखे है। वर्ना यह संभव ही नहीं कि प्रदेश का गरीब कड़क धूप में सड़कों पर तड़पता रहे और वे वीबी-2 के वातानुकूलित कक्ष में बैठे रहें। शिवराज की मजबूरी समझ आती है, लेकिन उनका क्या जिन्हें जिले आवंटित हैं। वे मंत्री जो कोरोना से निपटने संभाग प्रभारी बनाए गए। मुख्य सचिव सहित वे आला अफसर जिन्हें जिलों की कमान दी गई।


वे क्यों अपने प्रभार के जिलों में नहीं गए? क्या उन्हें कोरोना पर्यटन नापसंद है या फिर मुख्यमंत्री के निर्देश का पालन वे जरुरी नहीं समझते? कमलनाथ ने यह बात तो सही पूछी है। शिवराज की हिमायत नहीं। मुख्यमंत्री खुद न जा पा रहे हों तो मंत्री और आला अफसरों को मजदूरों के सेवा कार्य की निगरानी के लिए भेजना चाहिए। इसके बावजूद शिवराज और उनकी टीम का इस संकटकाल में मौके पर न जाना फिर भी समझ आता है कि वे मंत्रालय से भी निर्देश, आदेश और मॉनिटरिंग कर रहे होंगे। आखिर 8 करोड़ जनता की सेवा की जिम्मेदारी उनके कांधों पर है। इसलिए तमाम सुरक्षा प्रबंधों के बावजूद कोरोना संक्रमण का खतरा उठाना उनके लिए संभव न होगा। लेकिन कमलनाथ और उनकी कांग्रेस की क्या मजबूरी है? विपक्षी दल के नेता और कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष होने के नाते वे जा सकते हैं। इंदौर के उन इलाकों में जाएं जहां लोग राशन के लिए लाइन लगा रहे हैं। महाराष्ट्र सीमा की बड़ी बिजयासन जाएं जहां प्रवासी मजदूर आ रहे हैं। बैतूल या छिंदवाड़ा की सड़कों पर उनकी पीड़ा सुनें, सहायता दें।


किसने रोका है? उन तमाम कमियों को देखें, जिनके बारे में बिना मौके पर जाए वे अपने बयान में लिख रहे हैं। देखें क्या वाकई शिवराज सरकार ने प्रदेश को भगवान भरोसे, अपने हाल पर लावारिस छोड़ दिया है? अपनी संवेदनशीलता दिखाएं और शिवराज सरकार की असंवेदनशीलता उजागर करें। हमने शिवराज के 13 साल और मुख्यमंत्री कमलनाथ के 15 महीने का शासन देखा है। इसलिए आज शिवराज सरकार को आइना दिखा रहे कमलनाथ से एक सवाल बनता ही है। क्या मुख्यमंत्री रहते कमलनाथ किसी ओला पीड़ित किसान के खेत पर गए थे? किसी घटना, दुर्घटना में पीड़ित के परिजनों से मिलने उनके घर पहुंचे थे? विपक्षी विधायक रहते हुए भी शिवराज हर ऐसे मौके पर मौजूद थे। अब वह अवसर और परीक्षा कमलनाथ केलिए है। दूसरों को राह दिखाने से पहले वे खुद उस मार्ग पर चल कर दिखाएं। पहुंचें लॉकडाउन की मार झेल रहे लोगों के बीच। दूसरे को अपने घर बैठकर टार्च दिखाने के बजाए वे खुद मैदान में आएं। हो सकता है कि उनके इस तरह जनता के बीच जाने के बाद सरकार चलाने वालों का कोरोना खौफ भाग जाए और वे भी उनका अनुसरण करते दिखें। कमलनाथ याद रखें कि उनकी इस सदाशयता पर कोरोना पर्यटन का लेबल लगा कर उपहास नहीं उड़ाया जाएगा। स्वागत ही होगा।


प्रभु पटैरिया

प्रभु पटैरिया

प्रभु पटैरिया की गिनती मध्यप्रदेश के उन गिने चुने वरिष्ठ पत्रकारों में होती है जो अपनी धारदार लेखनी और राजनीतिक और प्रशासनिक विशेष खबरों के लिए पहचाने जाते हैं। पत्रकारिता का प्रभु का सफर लंबा है। दैनिक स्वदेश, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, प्रदेश टूडे से लेकर इलेक्ट्रानिक मीडिया तक में अपनी विशिष्ट छाप छोड़ चुके हैं। टी वी चैनलों की डिबेट में वे मध्यप्रदेश के राजनीतिक और प्रशासनिक घटनाक्रमों पर सटीक कमेंट देने के लिए भी जाने जाते हैं।



प्रमुख खबरें

राज्य

राजनीति