चंद्रबाबू नायडू: खराबी तकदीर की या तदबीर की...?



देश में राजनीतिक दलों के बीच मतभेदों का मनभेद की स्थिति तक पहुंचने का क्रम पुराना हो गया है। इतना पुराना कि बीते कई साल से इनकी जगह आपसी रंजिश ने ले ली है। उत्तरप्रदेश का कुख्यात गेस्ट हाउस कांड, तमिलनाडु में तत्कालीन पूर्व मुख्यमंत्री एम करुणानिधि की आधी रात को की गयी गिरफ्तारी, बिहार में तत्कालीन मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी तथा तत्कालीन पूर्व मुख्यमंत्री नीतिश कुमार के बीच आम के बागीचे को लेकर चला विवाद, आदि इसकी जीती-जागती मिसाल हैं। इसी क्रम में आंध्र प्रदेश ऐसा राज्य बनकर सामने आया है, जहां सियासी अदावत का पूर्व मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू भारी खामियाजा उठा रहे हैं। सत्ता से बेदखल होने के बाद नायडू के सितारे गर्दिश में हैं। माओवादियों के निशाने पर होने के बावजूद उनकी सुरक्षा घटा दी गयी है। उनके करोड़ों रुपए से बने आशियाने को ध्वस्त कर दिया गया। अगली तैयारी ऐसी है कि नायडू जेल जा सकते हैं। क्योंकि उनके कार्यकाल की कुछ तथाकथित गड़बड़ियों की जांच की योजना बनायी जा रही है। ऐसे में यही सवाल उठता है कि नायडू की तकदीर खराब रही या यह उनकी खराब तदबीर का मामला है? वायएसआर अब आंध्र प्रदेश की सत्ता  पर काबिज है। कुछ समय पहले परिदृश्य पूरी तरह अलग था


तब तेलगू देशम पार्टी की वहां हुकूमत थी और मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू लगातार दूसरा कार्यकाल मजे से चला रहे थे। दो साल पहले माहौल में बुरी तरह कड़वाहट घुलना शुरू हुई। वायएसआर के नेता जगनमोहन रेड््डी ने एक जनसभा में कहा कि नायडू को यदि बीच सड़क पर गोली मार दी जाए, तो भी इसमें कोई बुराई नहीं है। निश्चित ही रेड्डी का इरादा नायडू की हत्या का नहीं था, लेकिन यह साफ हो गया था कि वह तत्कालीन मुख्यमंत्री की राजनीतिक हत्या के जुनून से भरे हुए हैं। इसकी कई झलक सामने आ चुकी हैं।  नायडू को बतौर मुख्यमंत्री मिली सभी सुविधाएं वर्तमान मुख्यमंत्री जगमोहन रेड्डी ने छीन ली हैं। उनके बेटे नारा लोकेश को मिली जेड श्रेणी की सुरक्षा को हटा लिया गया है। पूर्व मंत्री नारा लोकेश की सुरक्षा को 5+5 से घटाकर 2+2 कर दिया गया है। इसके अलावा परिवार के दूसरे सदस्य की सुरक्षा भी पूरी तरह हटा दी गई है। इससे पहले जून के दूसरे हफ्ते में आंध्र प्रदेश के गन्नवरम हवाई अड्डे पर पूर्व मुख्यमंत्री को शुक्रवार देर रात तलाशी से गुजरना पड़ा था। नायडू को विमान तक जाने के लिए वीआईपी सुविधा से भी वंचित कर दिया गया। उन्हें अन्य लोगों की तरह सामान्य बस में प्लेन तक सफर करना पड़ा था।


इस दौरान उनकी चैकिंग की एक फोटो सामने आई थी। हम बता दें कि सन 2003 में तिरुपति के अलीपीरी में माओवादियों द्वारा हमला किए जाने के बाद नायडू को जेड + श्रेणी की सुरक्षा (23 सशस्त्र सुरक्षा पुरुषों और एस्कॉर्ट वाहनों द्वारा 24 घंटे सुरक्षा ) दी गई थी। मामला यहीं तक नहीं थमा। हाल ही में रेड्डी के अदेश पर उस प्रजा वेदिका इमारत को ध्वस्त कर दिया गया, जिसमें नायडू रह रहे थे। करीब पांच करोड़ रुपए की लागत से बने इस मकान में नायडू के प्राण बसते थे। वह जानते थे कि रेड्डी की नजर इस बंगले पर लग चुकी है। इसलिए नेता प्रतिपक्ष बनते ही नायडू ने  सरकार को आवेदन देकर प्रजा वेदिका को नेता प्रतिपक्ष का सरकारी आवास घोषित करने का निवेदन किया। जिसे खारिज कर दिया गया। अब अमरावती स्थित प्रजा वेदिका की जमीन पर सरकार का कब्जा है।  जो बोया, वही पाया...! नायडू के लिए कहा जा सकता है कि राजनीति में उन्होंने वही पाया, जो बोया था। अपने दिवंगत श्वसुर तथा आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एनटी रामाराव के निधन के बाद नायडू के रास्ते में लक्ष्मी पार्वती बहुत बड़ी चुनौती थीं। पार्वती से रामाराव ने दूसरी शादी की थी।


रामाराव का निधन होते ही नायडू गुट ने उनकी सियासी विरासत पर दावा ठोक दिया। लक्ष्मी पार्वती ने कुछ दिन संघर्ष किया, किंतु ठेठ राजनीतिज्ञ नायडू के सामने उनकी एक नहीं चली। रामाराव के दामाद ने अपनी सास के खिलाफ ऐसे-ऐसे हथकंडे अपनाये की पार्वती राजनीति छोड़कर बहुत पीछे कहीं चली गयीं। राजनीति में अब उनका नामलेवा भी नहीं बचा है। यह दुश्मनी का भाव ठीक वैसा ही था, जैसा रेड्डी ने नायडू के लिए रखा था। जिसका नतीजा अब सबके सामने है।  महंगा पड़ा  नीतिश कुमार बनने का प्रयास नायडू की पार्टी सन 2014 में बनी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार का हिस्सा थी। उनका समय बहुत जोरदार चल रहा था। वह खुद मुख्यमंत्री थे और केंद्र से भी उन्हें भरपूर ताकत मिल रही थी। बाद में नायडू की पार्टी ने यकायक राजग से समर्थन वापस ले लिया। इसके पीछे आंध्र प्रदेश की तथाकथित उपेक्षा का हवाला दिया गया। जबकि यह साफ था कि नायडू दरअसल बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार के नक्शे-कदम पर चलने का प्रयास कर रहे थे। केंद्र से अपने मंत्रियों को वापस बुलाकर उन्होंने यह संकेत देने की कोशिश की कि राज्य के विकास के लिए उनकी पार्टी ने यह त्याग किया है।


गौरतलब है कि बिहार के लिए भी विशेष पैकेज की मांग करते हुए नीतिश ने राजग सरकार के खिलाफ विद्रोही तेवर दिखाये थे। नतीजतन वह लालू प्रसाद यादव की राष्ट्रीय जनता दल से मिलकर बिहार में सरकार बनाने में सफल रहे। इसके साथ ही नीतिश मोदी-विरोधी दलों के नेता बनने की दिशा में भी काफी आगे बढ़ गये थे। नायडू ने भी राजग से समर्थन वापस लेने के बाद मोदी-विरोधी धड़े के नेतृत्व की कोशिशें कीं। लेकिन उलटा ही हुआ। उन्हें खुद  उनके राज्य की जनता ने नकार दिया। आलम यह रहा कि लोकसभा चुनाव में राज्य की 25 में से 22 सीटों पर वायएसआर कांगे्रस जीती और नायडू की पार्टी को महज तीन सीटों से संतोष करना पड़ गया। नायडू इस तरह न घर के रहे और न घाट के। न तो राष्ट्रीय राजनीति में उनका दखल रहा और न ही प्रदेश सहित मोदी-विरोधी धड़ों के बीच वह किसी प्रभाव के लायक नजर आ रहे हैं। विपक्षी दलों की कमान पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मजबूती से थाम ली है। लोकसभा चुनाव में मिली करारी पराजय की हताशा के चलते कांग्रेस भी इस परिदृश्य में बहुत पीछे दिख रही है। राजनीति अनिश्चितताओं की बहुलता वाला क्षेत्र है। इसलिए यह तो नहीं कहा जा सकता कि नायडू का अच्छा समय हमेशा के लिए खत्म हो गया है, किंतु यह तो कहा ही जा सकता है कि इस पूर्व मुख्यमंत्री के अरमानों को लंबे समय तक याद रहने वाला झटका लगा है। जिससे उबर पाना खुद उनके लिए बहुत बड़ी चुनौती बन चुका है।

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रत्नाकर  त्रिपाठी

रत्नाकर त्रिपाठी

रत्नाकर त्रिपाठी की गिनती प्रदेश के उन वरिष्ठ पत्रकारों में होती है जिन्हें लेखनी का धनी माना जा सकता है। राष्ट्रीय सहारा, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर सहित कई अखबारों और ई टीवी तक अपनी विशिष्ट छाप छोड़ने वाले रत्नाकर प्रदेश के उन गिने चुने संपादकों में से एक है जिनकी अपनी विशिष्ट पहचान उनकी लेखनी से है।



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