कराह रहा इंसान, कोरोना, शराब और पेट्रोल-डीज़ल से परेशान



कौशल किशोर चतुर्वेदी, भोपाल मध्य प्रदेश में एक तरफ़ कोरोना की मार आम आदमी पर तेज प्रहार कर रही है। तो दूसरी तरफ़ शराब की दुकानें खोलने के बाद सरकार व्यवस्थाएं बनाने में जुटी है। वहीं अब पेट्रोल डीज़ल पर टैक्स बढ़ने से आम आदमी की माली हालात मौत की तरफ़ धकेल ने पर उतारू है।ऐसी तस्वीर पूरे देश में भी देखी जा सकती है लेकिन वहाँ की परिस्थितियां कुछ और हो सकती हैं। मध्य प्रदेश में शराब की दुकानें खोलने के बाद का यह पहला सप्ताह कोरोना और पेट्रोल डीज़ल के दामों में बढ़ोतरी का गवाह बन चुका है।लॉकडाउन की त्रासदी से प्रदेश की जनता उबर नहीं पा रही है, उस पर शराब और पेट्रोल डीज़ल के दामों में बढ़ोतरी के तड़के ने परेशान इंसान को कराहने पर मजबूर कर दिया है। पिछले तीन महीने का समय दुनिया देश और प्रदेश सभी जगह महासंकट का रहा है। कोरोना का संक्रमण लगातार बढ़ रहा है। दो महीने के लॉकडाउन ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है। सरकारों की आर्थिक हालत भी दयनीय है। इस पर कोरोना है कि सरकार और इंसानों पर करूणा करने को राज़ी नहीं है


मध्य प्रदेश में कोरोना के मरीज़ों की संख्या साढ़े दस हज़ार से ज़्यादा हो चुकी है तो मौत का आंकड़ा भी 450 छूने को हैं। प्रदेश के 51 ज़िले कोरोना सेसंक्रमित हैं तो बत्तीस ज़िलों में कोरोना के चलते मौतें दर्ज हो चुकी हैं। कोरोना लगातार क़यामत बरपा रहा है और आम और ख़ास आदमी और सरकार सभी इसके कोपभाजन का शिकार हैं। शराब और काढ़े का मेल: सरकार को इसी बीच आर्थिक बदहाली को टालने के लिए शराब की दुकानें खोलने का फ़ैसला भी लेना पड़ा है।यह फ़ैसला भारी मन से लिया गया या ख़ुशी ख़ुशी, यह तो सरकार ही बता सकती है। हालाँकि सरकार यह बात साफ़ कर चुकी है कि राजस्व का एक बहुत बड़ा स्रोत आबकारी है जिस पर विकास की रीढ़ टिकी हुई है। शराबी भी सरकार के फ़ैसले से ख़ुश हैं और तंगहाली में भी सुबह से शाम तक शराब की दुकान खुली होने तक सरकार के फ़ैसले को अपना पूरा-पूरा खुले दिल और खुले मन से समर्थन दे रहे हैं। देशी शराब की दुकान के सामने लगी बड़ी बड़ी लाइनों में ग़रीब और निम्न वर्ग का वह तबका शामिल है जो जन्म से लेकर मौत के कफन तक सरकार की उदारता का क़ायल है।


शायद सरकार भी इनकी चिंता में ही आबकारी से मिलने वाले राजस्व की अनदेखी नहीं कर पा रही है। तो अंग्रेज़ी शराब की दुकानों के सामने भी निम्न वर्ग के साथ मध्यम वर्ग लाइन में खड़े होकर सरकार को समर्थन दे रहा है। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि लॉकडाउन में सबसे ज़्यादा फ़ज़ीहत मध्यम वर्ग की ही हुई है। नौकरियां भी छिनी हैं तो वैकल्पिक रोज़गार भी मुहाल हो गया है। चौक चौराहों पर यह सुना जा सकता है कि मध्यम आय वर्ग का इंसान न तो रो पा रहा है न हंस पा रहा है और न ही अपने मन का दर्द किसी से कह पा रहा है। पर शराब है जो सब का दुख दर्द बिना भेदभाव के बाँटने को हाज़िर है। मध्य प्रदेश में शराब की दुकानें खोलने के पहले सप्ताह में जहाँ हर दिन कोरोना कि नए मरीज़ों की संख्या बढ़ती गई तो मौतों का आंकड़ा भी बढ़ रहा है। राजधानी भोपाल में इस सप्ताह में एक दिन में सबसे ज़्यादा 85 नए मामले भी दर्ज किए गए हैं। तो बाक़ी दिनों में भी पचास-साठ मामले सामने आते रहे हैं।इंदौर में भी औसत 50 नए मामले दर्ज हुए हैं।


हालाँकि सरकार मेहरबान है और शराब की दुकान खोलने के फ़ैसले का काढ़ा पीने को मजबूर है तो प्रदेश के सभी नागरिकों को भी कोरोना से बचाने के लिए आयुष विभाग की तरफ़ से काढ़ा कि करोड़ों पैकेट घर घर पहुँचा चुकी है।शराब और काढ़े का यह मेल प्रदेश में अपना खेल दिखा रहा है।शराब की दुकानों पर महिलाओं की ड्यूटी हटा दी गई हैं तो शिक्षकों को भी समाज में हेय दृष्टि से देखे जाने वाली शराब कि सरकारी बिक्री से दूर रखने का आदेश हो चुका है।अब आबकारी विभाग के अफ़सर और कर्मचारी होम गार्ड के सैनिक सरकार के हिस्से की शराब की दुकानों पर मौजूद है। फ़ज़ीहत से बचने के लिए आउटसोर्सिंग की इजाज़त भी सरकार दे चुकी है। पेट्रोल-डीज़ल का देखो खेल: कोरोना और शराब के साथ चर्चा में है पेट्रोल और डीज़ल के दामों में एक एक रुपया अतिरिक्त कर की बढ़ोतरी।


यह बात साफ़ है कि पेट्रोल पंप पर पेट्रोल-डीज़ल भरवाने वाले वाहनचालकों, अस्पतालों में इलाज के लिए पहुँचने वाले मरीज़ों और स्कूलों में प्रवेश लेने वाले छात्र-छात्राओं की क़तारें उतनी ही लंबी देखने को हमेशा मिलेंगी जितनी कोरोना लॉकडाउन के बाद खुली शराब की दुकानों के सामने शराबियों की लाइन देखने को मिल रही हैं। पर पेट्रोल-डीज़ल भरवाने वाले ग़रीब, निम्न और मध्यमवर्गीय परिवारों की जेब पर एक-एक रुपए का अतिरिक्त बोझ बहुत भारी पड़ रहा है। समस्या यही ख़त्म नहीं होती क्योंकि डीज़ल के दाम में छोटी सी बढ़ोतरी पूरे बाज़ार में ज़्यादा महँगाई होने का ज़रिया बन जाती है। ऐसे में आर्थिक रूप से मौत की कगार पर पहुँच चुके परिवारों की पीड़ा का अहसास संवेदनशील इंसान तो कर ही सकते हैं। ख़ैर परिवार से प्राथमिकता समाज को मिलती है तो समाज से ज़्यादा प्रदेश और प्रदेश से ज़्यादा प्राथमिकता पर देश होता है। ऐसे में राष्ट्र को राज्य को मज़बूत करने के लिए मजबूर लोगों को क़ुर्बानी देने के लिए आगे आना ही पड़ेगा। पर पेट्रोल और डीज़ल का यह खेल देखने लायक़ है कि मध्यप्रदेश में जो पार्टी विपक्ष में होती है, वही नया टैक्स लगने पर प्रदेश में सर्वाधिक वैट टैक्स के साथ पेट्रोल-डीज़ल की बढ़ती क़ीमतों को लेकर सरकार को कटघरे में खड़ा करती है। प्रदेश में 20 मार्च से पहले और उसके बाद के विपक्ष में बैठे राजनीतिक दलों के नेताओं के बयान इसका प्रमाण हैं। अपना-अपना फ़र्ज़ समय-समय पर सभी ईमानदारी से निभा रहे हैं, फिर भी जनता बैकफ़ुट पर ही बनी हुई है।


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