जेएनयू के आंदोलन की यह टाइमिंग



राजेश खन्ना की मशहूर फिल्म है, ‘बावर्ची।’ इसकी शुरूआत में जिस घर का नाम ‘शांति निवास’ बताया जाता है, वह दरअसल घोर अशांति के निवास वाली जगह साबित होता है। यानी नाम के अनुरूप लक्षण हों, यह कतई आवश्यक नहीं है। इसलिए जवाहर लाल नेहरू के नाम पर स्थापित विश्वविद्यालय में यदि उनके कृतित्व तथा व्यक्तित्व की कोई झलक नहीं दिखती है तो इस पर अधिक चौंकना नहीं चाहिए। हां , यह जरूर देखा जाए कि वहां पकायी जा रही देश-विरोधी खिचड़ी का बावर्ची कौन है। खासतौर पर ताजा विवाद के मद्देनजर तो इस सवाल की पड़ताल बहुत आवश्यक हो गयी है। जेएनयू प्रबंधन ने होस्टल तथा मैस के चार्ज मेंं वृद्धि की। छात्र-छात्राएं इसके खिलाफ सड़क पर आ गये। वृद्धि का कुछ हिस्सा वापस लिया गया। लेकिन आंदोलन जारी रहा। कई अचानक इसका स्वरूप और उग्र करने की कोशिश की गयी


उस समय, जबकि संसद का शीतकालीन सत्र आरम्भ हो रहा था। क्या यह किसी खास टाइमिंग के हिसाब से किया गया? क्यों ऐसा हुआ कि संसद के नजदीक आते सत्र के पहले ही जेएनयू परिसर में लगी स्वामी विवेकानंद की प्रतिमा के आसपास आपत्तिजनक और भड़काऊ नारे लिखे गये? क्या यह किसी खास षड़यंत्र का हिस्सा नहीं है कि इसी संस्थान से संबद्ध एक महिला कुछ दिन पहले ‘योग से सैक्स बेहतर है’ वाले वाक्य की टी-शर्ट पहनकर अपना फोटो सोशल मीडिया पर वायरल करती है। ध्यान रखिए कि जेएनयू में प्रभावी असर रखने वाली मानसिकता ही वह है, जो योग जैसे विज्ञान को भी हिंदू धर्म से जोड़कर इसका विरोध करती आ रही है। तब भी, जबकि दुनिया के कई देश भारत के इस ज्ञान का लोहा मानकर उसे अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बना चुके हैं।


महज दस रुपए में महीने भर के लिए होस्टल के कमरे की बात राम राज्य की तरह ही है। दुर्भाग्य से यह उस संस्थान में हो रहा है, जहां रावण राज्य कहना भी वहां की गतिविधियों की निंदा के लिए छोटा शब्द होगा। इस फीस में बेहद मामूली वृद्धि पर जो बवाल मचा है, वह खालिस रूप से प्रायोजित कार्यक्रम है। क्योंकि इस बेवजह के विवाद को उस समय तूल दिया गया, जब कश्मीर से छन-छनकर आ रही खबरें साफ बता रही हैं कि वहां का जनजीवन तेजी से सामान्य होता जा रहा है। यही वह समय भी है, जब देश-विरोधी ताकतों की प्रकट कामना और अप्रकट कोशिशो के बावजूद अयोध्या मसले पर अदालत के फैसले से कहीं अशांति का माहौल उत्पन्न नहीं हुआ। जाहिर है कि ऐसे समय पर फिजूल का बवाल खड़ा कर आप दुनिया को यही संदेश देना चाह रहे हैं कि भारत में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है।


तीस-चालीस हजार रुपए का मोबाइल फोन रखने वाले यदि होस्टल और मैस की फीस में मामूली वृद्धि को लेकर उग्र आंदोलन करें तो साफ है कि यह अव्यवस्था को बनाये रखने की नापाक कोशिशों से अधिक और कुछ नहीं है। यहां यह बता दें कि इसी जेएनयू होस्टल में जिन छात्र-छात्राओं को जगह नहीं मिल पाती, वे छह से सात हजार रुपया महीने वाले कमरे में रहने को विवश होते हैं। दरअसल, हो यह रहा है कि इस संस्थान में देशवासियों की खून-पसीने वाली आय से मिले टैक्स पर ऐश करना तो सिखाया जाता है, लेकिन यह नहीं सिखाया जाता कि देश के प्रति उनके भी कुछ कर्तव्य हैं। वैसे केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद जेएनयू की कुछ खास गतिविधियों से काफी कुछ अच्छा भी हुआ है।


कन्हैया कुमार एंड कंपनी के प्रकरण ने बता दिया कि यह वह संस्थान है, जो देश के पैसे की दम पर उन आस्तीन सांपों को पाल रहा है, जो ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ जैसी पाकिस्तानी मानसिकता का संवाहक है। हालिया विवाद से सारा देश यह जान गया कि अब तक इस संस्थान के गद्दार फितरत वाले छात्र-छात्राएं किस तरह नाममात्र के पैसे पर सरकारी सेवाओं का लाभ उठा रहे हैं। कैसे इन सुविधाओं की खातिर अधेड़ावास्था में पहुंच चुके तथाकथित छात्र-छात्राएं भी यहां अब तक कुंडली मारकर बैठे हैं और वास्तविक विद्यार्थियों के हक को डंस रहे हैं। एक खास किस्म की मानसिकता आज तक जेएनयू के ऐसे लोगों का समर्थन करती चली आ रही थी। अब इसके जवाब में भी एक मानसिकता ने पूरी ताकत के साथ इस गलत का विरोध करना शुरू कर दिया है। टकराव अच्छा नहीं होता, लेकिन यह टकराव बहुत जरूरी है। क्योंकि यह उन चूहों के खात्मे के अभियान जैसा मामला है, जिनमें से एक-एक चूहे को मारने से देश का कम से कम सौ-सौ किलो अनाज नष्ट होने से बचाया जा सकता है।

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प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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