भाजपा की ऊहापोह....



गोपाल भार्गव और शिवराज सिंह चौहान की चिंताओं से मैं भी इत्तफाक रखता हूं। पर मुझे अफसोस भी हो रहा है। मुख्यमंत्री कमलनाथ को वाकई अपने गृहजिले में आदिवासी अत्याचार के इस मामले पर गंभीर जांच पड़ताल करवाना चाहिए, इसमें कोई दो राय नहीं है। पर अफसोस मुझे भाजपा नेताओं की चिंता का ज्यादा है। गोपाल भार्गव पिछली तीन सरकारों में लगातार पन्द्रह साल मंत्री रहे। शिवराज सिंह चौहान तेरह साल मुख्यमंत्री रहे। विपक्ष में आए हुए अभी साल भर का वक्त बीता है। अब ऐसा तो है नहीं कि शिव राज में राम राज्य था या मामा के राज में बेटियों पर अत्याचार बंद हो गया था। शिवराज हमेशा संवेदनशील रहे लेकिन पुलिस का रवैया तो कई मामलों में इससे कुछ कम ज्यादा कहां रहा होगा? नेता प्रतिपक्ष के तौर पर तो गोपाल भार्गव की प्रतिक्रिया सौ फीसदी ठीक है। यह उनका संसदीय दायित्व भी है। पर शिवराज सिंह चौहान की अतिसक्रियता मुझे भ्रम में डालती है


भ्रम यह है कि क्या वाकई भाजपा ने तय कर लिया है कि अगले पांच साल उसे किस भूमिका में रहना है? अगर उसे विपक्ष की भूमिका निभानी है तो विपक्ष के तेवर और धार तो ट्विटर छोड़ कर सड़क पर संघर्ष से ही सामने आएंगे। और अगर भाजपा नेताओं के जेहन में है कि कमलनाथ सरकार को कभी भी चलता करना है तो फिर उसे तय करना होगा कि उसका अगला नेतृत्व क्या होगा? क्या शिवराज सिंह चौहान वाकई कमलनाथ सरकार के खिलाफ हैं? या फिर तब तक उनकी रस्मी खिलाफत ऐसी ही चलती रहेगी, जब तक यह तय नहीं हो जाता कि इस बार भी मौका उनके ही हाथ आएगा। कांग्रेस या भाजपा के एक-दो विधायक कम-ज्यादा हो जाने से सरकार की स्थिरता और अस्थिरता को लेकर ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। फर्क अगर पड़ेगा तो इससे कि भाजपा के नेता और खासकर शिवराज अपने लिए कौन सी भूमिका तय करने के इच्छुक हैं? मुख्यमंत्री कमलनाथ के गृह जिले का यह मामला वाकई गंभीर किस्म का है। पांर्ढुना तहसील के पाटई गांव की एक नाबालिग आदिवासी लड़की की हत्या के इस मामले में गांव वाले सीबीआई जांच की मांग कर रहे हैं।


गांव वालों का आरोप है कि किशोरी को अपहरणकर्ता उसके घर से ही नग्न अवस्था में जंगल में अपहरण कर ले गए और उसकी बलात्कार के बाद हत्या कर दी। मामला मुख्यमंत्री के गृह जिले और उनके सांसद बेटे के संसदीय क्षेत्र का है तो पुलिस से ऐसे मामलों में संवेदनशील होने की अपेक्षा तो की ही जा सकती है। पर गांव वालों का आरोप है कि पुलिस ने हत्या की शिकार हुई लड़की के शव का पोस्टमार्टम कराना तक मुनासिब नहीं समझा। उसकी सड़ चुकी लाश को बिना पोस्टमार्टम के ही दफना दिया गया। पुलिस ने इस मामले में दो युवकों को गिरफ्तार कर लिया है। और इस घटना को नाबालिग लड़की के दो प्रेमियों को धोखा देने के बाद उनके गुस्से का कहर ठहरा दिया है। पुलिस इस बात से भी इंकार कर रही है कि लड़की के साथ बलात्कार जैसी कोई घटना हुई है। पुलिस पर पोस्टमार्टम के लिए भी रिश्वत मांगने का आरोप लगाया गया है।


इस बात का जवाब पुलिस ने नहीं दिया है कि लड़की का सड़ चुका शव जब जंगल से बरामद हुआ तो उसका पोस्ट मार्टम करना जरूरी क्यों नहीं समझा गया? गांव वालों ने छिंदवाड़ा एसपी को इस मामले में ज्ञापन देकर सीआईडी या सीबीआई जांच की मांग की है। इस ज्ञापन में एक उल्लेखनीय बात और है, गांव के लोगों का कहना है कि गांव में सभी स्ट्रीट लाइट बंद पड़ी हैं और गांव में अंधेरा है। उफ...छिंदवाड़ा में अंधेरा..ओह। बाकी प्रदेश में तो सब देख ही रहे हैं। पर कहते हैं कि छिंदवाड़ा में तो दिग्विजय सिंह के राज में भी उजाला था। खेर। इस मामले को लेकर नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव ट्विटर पर सामने आए। उन्होंने गांव वालों के तीन पेज के ज्ञापन को भी ट्विटर पर पोस्ट किया है। गोपाल भार्गव ने इस मामले में तीखी प्रतिक्रिया दी है। भार्गव ने लिखा है, 'मुख्यमंत्री जी के गृह जिले में एक गरीब को पोस्टमार्टम के लिए भी रिश्वत देनी पड़ती है। इस बात से प्रदेश के मॉडल का अंदाजा लगाया जा सकता है, कि थानों पर किस तरह धन उगाही होती है।


शासन का काम न्याय देना है लेकिन कांग्रेस इसे धन उगाही का साधन बना चुकी है। कमलनाथ के राज में मध्यप्रदेश आदिवासियों और दलितों पर अत्याचार का प्रदेश बन चुका है। लगातार पीड़ित शोषित वर्ग पर अत्याचार बढ़ रहे है। सागर और अब छिंदवाड़ा जिले की यह घटना सभ्य समाज में हमें सोचने को मजबूर करती है की प्रदेश किस ओर जा रहा है? मुख्यमंत्री जी के गृह जिले की आदिवासी बेटी के साथ दुष्कर्म के बाद हत्या की दिल दहला देने वाली घटना बेहद चिंताजनक है। प्रदेश में दलित और आदिवासियों पर अत्याचार कब थमेगा? कमलनाथ जी, क्या आपका छिंदवाड़ा मॉडल यही है? एक गरीब को पोस्टमार्टम के लिए भी रिश्वत देनी पड़ती है?' अब जाहिर है कि गोपाल भार्गव ने ट्विट किया है तो भला शिवराज सिंह चौहान कैसे पीछे रह सकते हैं। तो उन्होंने भी तीन ट्विट कर अपना विरोध जताया। उनकी नजर में मुख्यमंत्री का गृह जिला होने के कारण यह मामला निर्भया कांड से भी बड़ा है। उन्होंने लिखा है, 'यह निकृष्टता की पराकाष्ठा है, क्रूरता की परिसीमा है। अभी भोपाल के मनुआभान की टेकरी की दिवंगत पीड़िता को न्याय नहीं मिला है और एक के बाद एक ऐसी घटनाएं प्रदेश में हो रही हैं, सरकार चेन की नींद सो रही है। सरकार कब तक अपनी अकर्मण्यता का परिचय देगी?' पर क्या यही सवाल शिवराज की अकर्मण्यता को लेकर भी नहीं पूछा जाना चाहिए? इतना तो जरूर पूछा जाना चाहिए कि उनके गैर राजनीतिक 'बेटी बचाओ आंदोलन' का क्या बना? या वो उनकी अतिसक्रियता का ही एक उदाहरण था जिस पर पार्टी ने अंकुश लगा दिया?

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प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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