अभिशाप हमारे सहचर हैं



यह यकीन निरंतर दृढ़ होता जा रहा है कि अभिशाप हमारे सहचर हैं। हमारे शरीर से त्वचा की तरह लिपटे हुए हैं। हमारे रोम छिद्रों से वे जब-तब मवाद की तरह बहने लगते हैं। शायद यह भी कि अभिशाप हैं, इसलिए ही हम कायम हैं। आपातकाल की इस बरसी पर यह खयाल मन में आया है। इस व्यवस्था की परिभाषा पर मत जाइए। इसके स्वरूप का बारीकी से मूल्यांकन करें। आप  पाएंगे कि ऐसा हर समय कभी-न-कभी होता ही रहा है। अंतर केवल यह रहा कि हर बार ऐसा होने को आपातकाल का नाम नहीं दिया गया।  क्या 1978 से पहले हमारी तत्कालीन पीढ़ी ने अमानवीय यातनाएं नहीं सहीं? मुगल और गोरे तो खैर हमें प्रताडि़त करने ही आये थे। लेकिन उनका क्या, जो हमारे अपने थे। हमारे बीच से थे।  जिनकी महत्वाकांक्षाओं के चलते देश का विभाजन हुआ। उसकी प्रतिक्रिया में लाखों लोग मारे गये


हिंदू संस्कृति का अनुयायी होने के नाते आत्मा के अस्तित्व में मेरा पूरा यकीन है। इस आधार  पर कई बार मुझे लगता है कि भारत और पाकिस्तान के बीच बहती सिंधू नदी का पानी भीतर से नमकीन होगा। क्योंकि उसमें उन अंसख्य बेगुनाहों की आत्माओं का नमकीन आंसू घुलता होगा,  जो उस अघोषित आपातकाल की बलि चढ़ा दिये गये। हम प्रतीकों के नाम पर फैशन के हमेशा से आदी रहे हैं। चुनांचे हमने नफरत का प्रतीक केवल और केवल नाथुराम गोडसे को बना दिया।  उनका खुलकर जिक्र तक नहीं कर सके, जिन्होंने आजाद देश की हुकूमत संभालने की महत्वाकांक्षा के चलते देश के दो टुकड़े हो जाने दिए। उनके लिए हमारा मौन या अप्रत्यक्ष रूप से ही कह  पाने का साहस क्या किसी इमरजेंसी के खौफ से कम है? अपना घर-बार छोड़कर हिमाचल प्रदेश में रहने को मजबूर किसी तिब्बती की आंख में झांकिए।


वह यही पूछती है कि क्या भारत से हमें  यूं अलग हो जाने देने के फैसले को आपातकाल नहीं कहेंगे? शेख अब्दुल्ला की तमाम नाजायज मांगों को संवैधानिक आवरण पहनाना क्या इमरजेंसी से कम था? आज भी कश्मीर की आवाम  उसका दर्द सह रही है। मैं पत्थरबाजों, अलगाववादियों या सियासी लोगों की बात नहीं करता। उसका जिक्र कर रहा हूं जो अब्दुल्ला द्वारा पनपायी गयी सूअर घास के चलते वह प्रदेश और वहां  का अपना सब-कुछ छोड़कर कहीं ओर जाने को विवश हो गये। और उनका भी, जो उस समय बोये गये विष वृक्षों के चलते आज भी घाटी में नारकीय हालात में जी रहे हैं।  इतिहास से लेकर आज तक देखें तो हर ताकतवर ने मौका आते ही वही किया, जो इंदिरा गांधी ने सन 1978 में कर दिखाया।


देश से बाहर जाने और फिर गुमनाम मौत मरने वाले सुभाष चंद्र बोस  की इस हालत के लिए क्या मोहनदास करमचंद गांधी की तानाशाही वजह नहीं थी? क्या यह आपातकाल के दौर की विवशता भरी किसी प्रतिबद्धता से कम है कि देश की आजादी का जिक्र क रते समय हम भगत ङ्क्षसह, चंद्रशेखर आजाद, चापेकर बंधु, उधम सिंह, रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्ला खां, खुदीराम बोस, विनायक दामेादर सावरकर और मंगल पांडे, आदि का जयघोष  आज भी पूरी ताकत से नहीं कर पाते? हमारा यह प्रसंग तब तक अधूरा माना जाता है, जब तक कि इसमें नेहरू-गांधी का जिक्र न कर दिया जाए। सच कहूं तो अंग्रेजों ने हमे आजादी दी और हमारे रहनुमाओं को हमें गुलाम बनाये रखने का नुस्खा सिखाया। आप चिल्लाये तो हम भी गुलामों की तरह 'हिंदी-चीनी भाई-भाई कहकर रेंकने  लगे।


फिर यह देखकर चुपचाप बैठ गये कि यही भाई कसाई बनकर हमारे हजारों सैनिकों की जान लेकर हमारी बेशकीमती जमीन हड़पकर आराम से बैठ गया। आपके नाम का जयकारा लगा तो  हम भी सुर में सुर मिलाने लगे, लेकिन यह आवाज नहीं निकाल सके कि लाल बहादुर शास्त्री की मौत का सच सामने लाया जाए। अब तो आलम यह कि गुलामों की यह भीड़ श्यामाप्रसाद  मुखर्जी या पंडित दीनदयाल उपाध्याय की मृत्यु के कारणों की बात तक नहीं कह पाती है।  ऐसे अघोषित आपातकाल के अनगिनत भयावह उदाहरण मौजूद हैं। लेकिन जैसा कि  पहले ही कहा गया, हम प्रतीकों के नाम पर फैशन के आदी हैं और यही फैशन आपातकाल यानी सन 1978  से आगे हमें निकलने नहीं दे रहा। किसी सिद्धार्थशंकर राय ने नहीं कहा कि वंदेमातरम या भारत माता की जय न कहने पर किसी की जान ले ली जाए। किसी संजय गांधी ने नहीं किया कि गाय  के नाम पर किसी के प्राण हर लिए जाएं। ऐसा किसी और ने कहा। किसी और ने किया। वह ऐसा कहते और करते रहेंगे। और हम हैं कि मूर्खों की तरह यह सोचकर खुश हो रहे हैं कि आपातकाल जैसे हालात न तो सन 1978 के  पहले और न ही बाद में सामने आये हैं। यही हमारी सोच और पूरी पीढ़ी का अभिशाप है। वह अभिशाप,  जो हमारे सहचर हैं। हमारे शरीर से त्वचा की तरह लिपटे हुए हैं।  

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प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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