अब जिद छोड़ों भी वैराग्यानंद जी महाराज...



कथनी और करनी के अतंर अकेले राजनेताओं में ही नहीं होते। कलयुग है इसलिए साधूसंत भी इससे अछूते नहीं हैं। अब कम्प्यूटर बाबा के चेले वैराग्यानंद ने दिग्विजय सिंह की हार पर जल समाधि लेने का दावा तो कर दिया था, पर इस मामले में कहना यही पड़ेगा...तुम से न हो पाएगा बाबा। कभी स्कूल में ही प्रायमरी की किसी किताब में पढ़ा था, 'मेरे प्यारे सुकुमार गधे। जाग उठा मैं भरी दोपहरी, सुनकर तेरी पुकार गधे। मेरे प्यारे सुकुमार गधे।' अब यह तो याद नहीं रहा कि यह किस स्थापित कवि ने लिखा था। लेकिन यह कोई भूलने वाली बात नहीं है कि अपन न तो स्थापित हैं और न ही कवि। इसलिए गधा भी मेरी नींद खराब करने के लिए पुकारने का कष्ट करने से रहा। लेकिन नींद तो उड़ी हुई है। आशंकाओं से जकड़ा हुआ हूं। डरता हूं कि ये वैराग्यानंद बाबा कहीं सही में जल समाधि न ले लें। वे नर्मदा की गोद में समाना चाहते हैं, तो वहां उनके उस्ताद अब कमलनाथ सरकार में मंत्री पद का दर्जा पा चुके कम्प्यूटर बाबा नदी की छाती पर सवारी कर रहे हैं और चेला गहराई में ठिकाना बनाने का दांव खेल रहा है। बड़े तालाब में तो अभी जल समाधि लायक पानी है नहीं। सैफिया ग्राउंड में जहां मिर्ची यज्ञ हुआ था, वहां किसी तालाब और बावड़ी की जानकारी अपने को नहीं है


साधूओं की 'ग्लोसरी' में तो पानी में डूब कर आत्महत्या करने को जल समाधि कहते हैं लेकिन पुलिस और प्रशासन तो इसके लिए राजी होने से रहा। अब जब वैराग्यानंद ने दिग्विजय सिंह जी की हार पर जलसमाधि लेने का वादा किया था, तब पता नहीं पुलिस और प्रशासन से इसकी इजाजत मांगी थी या नहीं। पर लगता है उस्ताद और चेले की जन्मपत्री में शायद 'इंकार योग' कुंडली मारकर बैठ गया है। दिग्विजय को जिताना चाहते थे। किंतु मतदाता ने मना कर दिया। उस्ताद उड़नखटोले में सवार होकर नर्मदा मैया का नजारा देखना चाहते थे, लेकिन कमलनाथ ने इजाजत नहीं दी। नांव से गए तो वो भी बीच नदी में अड़ गई। और तो और, रेत चोरों को पकड़ने के उनके प्रयास को नर्मदा की रेत ने ही फुस्स कर दिया। साधु-संतों का ऐसा अनादर देखकर अपना तो दिल बैठा जा रहा है। अब कलियुग के नाम पर और क्या देखना बचा है ! हे कल्कि अवतार! देख रहे हो ना यह सब! तो इंतजार किस बात का! उठाओ सफेद घोड़ा और उस पर बैठकर चले आओ। क्योंकि कलियुग के नाम पर अब इससे अधिक अनाचार तो शायद और कोई हो ही नहीं सकता। हां, शादियों का सीजन है। आप भी कलयुग के खत्म होने की अंतहीन प्रत्याशा में बेरोजगार बैठे हुए हैं।


इसलिए यदि खर्चे-पानी की जुगाड़ में सफेद घोड़ा किसी बारात के लिए किराये पर दे दिया हो, तब भी हर्ज नहीं। पैदल ही आ जाओ। लेकिन अब और देर न करो महाराज। आ ही जाओ...   वैसे वैराग्यानंद की जल समाधि अब जन आंदोलन का विषय है। कारण भी है, लोग फोन पर वैराग्यानंद को परेशान कर रहे हैं। किसी को रालेगांव सिद्धी जाकर अन्ना हजारे साहब से मिलना चाहिए। बुजुर्गवार को बताना चाहिए कि लोकपाल-वोकपाल बहुत हो गया। अब तो समाधि आंदोलन समय की पुकार बन चुका है। जो इसे लेना चाह रहे हैं, उनके लिए इसकी अनुमति का बिल पारित कराया जाए और जो जिंदा दफनाने के लायक होने के बाद भी समाज में पद तथा प्रतिष्ठा से नवाजे जा रहे हैं, उन्हें जबरिया समाधि देने संबंधी बिल को भी मंजूरी दी जाए। अपने भारत कुमार..नहीं-नहीं, मनोज कुमार की आखिरी सुपर हिट फिल्म 'क्रांति' में गुलाम भारत के लिए कहा गया था, 'इस पर जो आंख उठायेगा, जिंदा दफनाया जाएगा।' आजाद भारत के सच्चे शुभचिंतकों के भीतर भी उस क्रांति का ज्वार उमड़ रहा है, जो 'इस-इस' पर जो आंख  उठाएगा, जिंदा दफनाया जाएगा वाला इंकलाबी गीत गाने को बेताब हैं।


'इस-इस' का मतलब, देश की एक-एक बच्ची, एक-एक ईमानदार नागरिक, एक-एक सच्चा राष्ट्रभक्त, एक-एक मेहनतकश मजदूर और ममता बनर्जी के राज्य का एक-एक सरकारी डॉक्टर, है। इस फेहरिस्त में और भी कई 'इस-इस' शामिल हैं, किंतु सभी का वर्णन करने में बहुत समय लगेगा। सो सुधी पाठक अपने हिसाब से आगे तय कर लें, किसे और जोड़ना है। मूर्ख हैं वे साधु-संत जो, 'धारयते इति धर्म:' वाली दकियानूसी पद्धति पर आज भी चल रहे हैं। समझदार हैं कंप्प्यूटर बाबा और उनके चेले ये वैराग्यानंद जी महाराज जैसे महान पुरुष, जो 'धारयते इति मंत्रि पद:' और 'धारयते इति पब्लिसिटी' की थ्योरी वाली मलाई सूत रहे हैं। बेवकूफों की कमी नहीं है। आबरू लुटी तो आत्महत्या कर ली। कर्ज बढ़ा तो जान दे दी। शिक्षा वाली परीक्षा या प्रेम परीक्षा में फेल हुए तो लटक गये फांसी पर। वे जानते ही नहीं, आत्महत्या का असली मजा उसे करने में नहीं है। इसका सच्चा सुख इसकी धमकी देकर सुर्खियों में बने रहने में है। मिर्ची बाबा को तो कमलनाथ पर दबाव बनाना चाहिए। एक गुरुकुल की स्थापना के लिए। जिसका भवन सरकारी हेलीकॉप्टरनुमा हो। जिसके क्लास रूम ठीक वैसे हों, जैसे वल्लभ भवन में मंत्री दर्जा प्राप्त सौभाग्यशाली निठल्लों के कक्ष होते हैं।


इस गुरुकुल में बाबा केवल एक बात की तालीम देंगे। खुद मत मरो, लेकिन मरने केऐसे-ऐसे जतन करो कि सामने वाला आपको बचाने के प्रयास में खुद अधमरा होकर रह जाए। फिर वह सामने  वाला कोई मुख्यमंत्री हो या हो कोई पूरा का पूरा सिस्टम। प्रदेश में नर्मदा को बचाने के लिए अब कुछ बचा ही नहीं है। न रेत और न ही पानी। इसलिए उस्ताद बाबा तो खाली बैठेंगे। खाली आदमी मक्खी मारता है। बाबा ने ऐसा किया तो हिंसक हो जाएंगे। उन्हें भी रोकने के लिए कुछ करना होगा। सुझाव ये है कि बाबा लोग एकाध सरकारी 'गणेश' को घसीटकर अपने स्टाफ में ले आएं। फिर खुद किसी वेदव्यास की तरह अपनी राजनीतिक महाभारत उससे लिखवायें। इसका शीर्षक होगा, 'आत्महत्या के साथ मेरे प्रयोग।' तो है मिर्ची बाबा आपसे विनती है कि यह किताब लिखकर अपना मूड बदलो। छोड़ो भी समाधि की यह जिद। न जमीन के नीचे और  न ही पानी में, कहीं मत जाओ। क्योंकि धरती वैसे ही पापियों के बोझ से फट रही है। अब उसके भीतर से भी पाप पनपने लगा तो वह कहीं की नहीं रहेगी। नदी, तालाब सब यूं ही तमाम प्रदूषण और अतिक्रमण के शिकार हो चुके है। तिस पर आपकी काया का भी उनमें प्रवेश हो गया तो यह 'कोढ़ में खाज' वाली बात हो जाएगी। इसलिए समाधि की जिद छोड़ो बाबा। कमलनाथ नहीं माने तो दिग्विजय सिंह जी से गुहार लगा लो, वे इन दिनों खालिस धर्मप्रेमी हैं। कम्प्यूटर बाबा पर तो उनकी कृपा हो गई। एक मंत्री पद का दर्जा वो आप को भी दिला सकते हैं। कहते तो यहीं है कि सरकार उनकी ही सलाह से चल रही है। 

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प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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