ुुईश्वर का अवतार थे विद्यासागर



करीब 160 साल पहले की एक महत्वपूर्ण घटना ने 16 जुलाई के दिन को भारत के इतिहास में एक खास जगह दिला दी। दरअसल 1856 को 16 जुलाई का दिन विधवाओं के लिए समाज में फिर से स्थापित होने का अवसर लेकर आया। इसी दिन भारत में विधवा पुनर्विवाह को कानूनी मान्यता मिली। अंग्रेज सरकार से इसे लागू करवाने में समाजसेवी ईश्वरचंद विद्यासागर का बड़ा योगदान था। इसलिए यह विशेष सामग्री आज इस ईश्वर सदृश महापुरुष को पूरी श्रद्धा  के साथ समर्पित की जा रही है।  ईश्वरचंद विद्यासागर ने विधवा विवाह को हिंदू समाज में स्थान दिलवाने का काम शुरू किया। इस सामाजिक सुधार के प्रति उनकी प्रबल इच्छाशक्ति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि खुद विद्यासागर ने अपने बेटे का विवाह भी एक विधवा से ही किया। इस अधिनियम से पहले तक हिंदू समाज में उच्च जाति की विधवा महिलाओं को दोबारा शादी की इजाजत नहीं थी। विद्यासागर का जन्म 1820 ई. में एक निर्धन ब्राह्मण परिवार में हुआ था और उन्होंने संस्कृत के छात्र के रूप में एक बेहतरीन उपलब्धि हासिल की थी


उनकी महान शिक्षाओं के लिए कलकत्ता के संस्कृत कॉलेज,जिसके वे कुछ वर्षों के लिए प्रिंसिपल रहे थे,ने उन्हें ‘विद्यासागर’ की उपाधि प्रदान की। वह अपने सादगीपूर्ण रहन-सहन, निर्भीक स्वभाव,आत्म-बलिदान के भाव, शिक्षा के प्रति अपने समर्पण-भाव के कारण दलितों व वंचितों के बीच एक महान व प्रसिद्ध व्यक्तित्व के रूप में उभरे। उन्होंने संस्कृत कॉलेज में आधुनिक पश्चिमी विचारों का अध्ययन आरम्भ कराया और तथाकथित निम्न जाति के छात्रों को संस्कृत पढ़ने हेतु कॉलेज में प्रवेश दिया। पहले संस्कृत कॉलेज में केवल परंपरागत विषयों का ही अध्ययन होता था। संस्कृत के अध्ययन पर भी ब्राह्मणों का एकाधिकार था और तथाकथित निम्न जातियों को संस्कृत के अध्ययन की अनुमति नहीं थीं। विद्यासागर ने बंगाली भाषा के विकास में भी योगदान दिया था और इसी योगदान के कारण उन्हें आधुनिक बंगाली भाषा का जनक माना जाता है। वे कई समाचार-पत्रों व पत्रिकाओं के साथ भी गंभीरता से जुड़े हुए थे और उन्होंने सामाजिक सुधारों की वकालत करने वाले कई महत्वपूर्ण लेख भी लिखे।


स्त्री शक्ति के विकास में अहम योगदान उनका सबसे महत्वपूर्ण योगदान विधवाओं की स्थिति में सुधार और स्त्री शिक्षा का प्रसार था। विधवा-पुनर्विवाह को कानूनी वैधता प्रदान करने वाले अधिनियम को पारित कराने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। 1856 ई. में कलकत्ता में हुए प्रथम विधवा-पुनर्विवाह में वे व्यक्तिगत रूप से शामिल हुए थे। विधवा-पुनर्विवाह एवं स्त्री शिक्षा के लिए किये जाने वाले प्रयासों के कारण रूढ़िवादी हिन्दुओं द्वारा उन पर हमले भी किये गये, किंतु वे अपने पथ से विचलित नहीं हुए।  वर्ष 1855 ई. में जब उन्हें स्कूल-निरीक्षक/इंस्पेक्टर बनाया गया तो उन्होंने अपने अधिकार-क्षेत्र में आने वाले जिलों में बालिकाओं के लिए स्कूल सहित अनेक नए स्कूलों की स्थापना की। उच्च अधिकारियों को उनका ये कार्य पसंद नहीं आया और अंतत: उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। वे बेथुन के साथ भी जुड़े हुए थे, जिन्होनें 1849 ई. में कलकत्ता में स्त्रियों की शिक्षा हेतु प्रथम स्कूल की स्थापना की थी।


जनक आधुनिक बंगाली भाषा के  उन्होंने बंगाली भाषा के विकास में भी योगदान दिया था और इसी योगदान के कारण उन्हें आधुनिक बंगाली भाषा का जनक माना जाता हैे बांग्ला भाषा के गद्य को सरल एवं आधुनिक बनाने का उनका कार्य सदा याद किया जायेगा। उन्होने बांग्ला लिपि के वर्णमाला को भी सरल एवं तर्कसम्मत बनाया। बँगला पढ़ाने के लिए उन्होंने सैकड़ों विद्यालय स्थापित किए तथा रात्रि पाठशालाओं की भी व्यवस्था की। उन्होंने संस्कृत भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए प्रयास किया। उन्होंने संस्कृत कॉलेज में पाश्चात्य चिन्तन का अध्ययन भी आरम्भ किया। सन 2004 में एक सर्वेक्षण में उन्हें 'अब तक का सर्वश्रेष्ठ बंगाली' माना गया था। वे अपना जीवन एक साधारण व्यक्ति के रूप में जीते थे लेकिन लेकिन दान पुण्य के अपने काम को एक राजा की तरह करते थे। वे घर में बुने हुए साधारण सूती वस्त्र धारण करते थे जो उनकी माता जी बुनती थीं।


क्षुद्र व स्वार्थी व्यवहार से तंग आकर उन्होंने अपने परिवार के साथ संबंध विच्छेद कर दिया और अपने जीवन के अंतिम वर्ष बिहार (अब झारखण्ड) के जामताड़ा जिले के करमाटांड़ में सन्ताल आदिवासियों के कल्याण के लिए समर्पित कर दिया। उनके निवास का नाम 'नन्दन कानन' (नन्दन वन) था। उनके सम्मान में अब करमाटांड़ स्टेशन का नाम 'विद्यासागर रेलवे स्टेशन' कर दिया गया है। लोग करते हैं आश्चर्य... वे जुलाई 1811 में दिवंगत हुए। उनकी मृत्यु के बाद रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने कहा, ‘लोग आश्चर्य करते हैं कि ईश्वर ने चालीस लाख बंगालियों में कैसे एक मनुष्य को पैदा किया!’ उनकी मृत्यु के बाद, उनके निवास ‘नन्दन कानन’ को उनके बेटे ने कोलकाता के मलिक परिवार बेच दिया। इससे पहले कि ‘नन्दन कानन’ को ध्वस्त कर दिया जाता, बिहार के बंगाली संघ ने घर-घर से एक एक रूपया अनुदान एकत्रित कर 29 मार्च 1974 को उसे खरीद लिया। बालिका विद्यालय पुन: प्रारम्भ किया गया, जिसका नामकरण विद्यासागर के नाम पर किया गया है। नि:शुल्क होम्योपैथिक क्लिनिक स्थानीय जनता की सेवा कर रहा है। विद्यासागर के निवास स्थान के मूल रूप को आज भी व्यवस्थित रखा गया है। सबसे मूल्यवान सम्पत्ति लगभग डेढ़ सौ वर्ष पुरानी ‘पालकी’ है, जिसे स्वयं विद्यासागर उपयोग में लाते थे। 

loading...

वेब खबर

वेब खबर



प्रमुख खबरें

राज्य

राजनीति