जिनके अभिनय ने दी निर्देशकों को जोखिम भरे प्रयोग की ताकत



वह दूरदर्शन का दौर था। सोप ओपेरा की दौड़ में श्रीधर क्षीरसागर का नाम सामने आया। धारावाहिक ‘खानदान’ के रूप में। शायद वही समय था, जब गिरीश कर्नाड को पहली बार पहचान सका। संवाद अदायगी में कहीं कन्नड़ तो कहीं संस्कृत की मिली-जुली धनक। लेकिन अभिनय में किसी भी दायें या बायें का सवाल ही नहीं। वह विधा बेहद सधी हुई। प्रभावी। उस समय दूरदर्शन पर स्थापित अभिनेताओं की भीड़ में कर्नाड का अभिनय भविष्य की संभावनाओं में लिपटा हुआ लगा। तभी याद आया कि इस शख्स को पहले कहीं देखा है। ‘स्वामी’ फिल्म में। यह फिल्म देखते समय उम्र काफी कम थी। न अभिनय की समझ थी और न ही पटकथा की। बस यह अच्छा लगता था कि पंखे की तेज हवा वाले किसी हॉल में सुराख से आ रही प्रोजेक्टर की रोशनी में परदे पर कुछ देख रहे हैं। संयोग रहा कि ‘खानदान’ के दिनों में ही दूरदर्शन ने ‘स्वामी’ का भी टेलीकास्ट किया। सीरियल वाले कर्नाड को जब फिल्म में शबाना के पति की भूमिका निभाते देखा तो क्षीरसागर के चयन की प्रशंसा किए बगैर नहीं रह सका।  वह सार्थक सिनेमा का समय था


एकबारगी विश्वास मजबूत हुआ कि कर्नाड के अभिनय को और बेहतरीन तरीके से दर्शाने वाली कोई कोई भूमिका जरूर लिखी जाएगी। अफसोस कि ऐसा नहीं हुआ। मुझे इस बात की हमेशा हैरत रहेगी कि क्यों कर नसीरुद्दीन शाह और ओम पुरी की तरह कर्नाड को किसी प्रमुख भूमिका को निबाहने का अवसर नहीं दिया गया। बहुत उम्दा कलाकारों को मेहमान कलाकार के तौर पर देखना मन को बेहद सालता है। इसलिए जब जीतेंद्र और रीना रॉय की ‘आशा’  में कर्नाड को चलताऊ भूमिका में देखा तो मैं गहरी निराशा में डूब गया। ऐसा अफसोस आज भी पीछा करता है और हर इस मौके पर मैं ‘गोधुली’ या ‘उत्सव’ की कंदराओं में छिपकर अपना बचाव करता हूं। इन दो हिंदी फिल्मों में कर्नाड ने निर्देशन की जो उत्कृष्टता स्थापित की है, वह यह संतोष प्रदान करती है कि अभिनेता नहीं न सही, कर्नाड को कम से कम श्रेष्ठ निर्देशक के तौर पर हिंदी सिने जगत में अपनी क्षमता दिखाने का मौका तो प्रदान किया गया। कन्नड़ में उनके द्वारा निर्देशित ‘वमशा वृक्ष’ को देखना तो गोधुली और उत्सव से भी कहीं बढ़कर स्वार्गिक सुख प्रदान करता है।


  पता नहीं क्यों मुझे लगता है कि स्वामी फिल्म की पटकथा फाइनल होते समय बासु चटर्जी ने एक बेहद चतुराई भरा प्रयोग किया। फिल्म की श्ुारूआत बेहद रोमांटिक अंदाज में हुई। शबाना आजमी और विक्रम का प्रेम परवान चढ़ते दिखाया गया। गीत ‘पल भर में ये क्या हो गया...’ आपको बाली उम्र के प्रेम में भिगोने लगता है, और उसी समय पता चलता है कि यह प्रेम यहीं खत्म होने जा रहा है। शबाना का विवाह उनकी मर्जी के खिलाफ किस से हो रहा है, यह आपको तब ही पता चलता है, जब कैमरे पर गिरीश का चेहरा दिखता है। सख्त। भावशून्य। यही बासु दा की चतुराई थी। क्योंकि कर्नाड को पहली बार  देखते समय आपको नायिका के आने वाले बुरे समय का आभास होता है और ज्यों ही फिल्म कुछ आगे बढ़ती है, आप हकीकत से रूबरू होते हैं। सच यह कि वह प्रेम से वंचित मनुष्य है। जिसे इससे पहले किसी स्त्री के रूप में सौतेली मां का नकली प्यार ही हासिल हुआ है। बासु दा परत-दर-परत कर्नाड के चरित्र का यह हिस्सा खोलते हैं। सबसे बड़ी बात सबसे अंत में खुलती है।


वह यह कि कर्नाड के किरदार को अपनी पत्नी के पहले प्रेम की बात पूरी तरह पता रहती है। प्रेमी के साथ भागने के लिए स्टेशन आयी नायिका जब पति के  साथ घर लौटती है तो कर्नाड के अभिनय की दम पर बासु दा की साकारा हुई चतुराई आपकी आंख नम कर देती है। निर्देशन और अभिनय की श्रेष्ठता का ऐसा अकल्पनीय संगुफन कम ही देखने मिलता है।  फिर ‘मंथन’ तो श्याम बेनेगल ने कमाल ही कर दिया। फिल्म में स्मिता  पाटिल की भावों से भरी आंखें लगभग न के बराबर बोलने वाले चेहरे की जुबान का काम करती हैं। इधर, कर्नाड की व्यवस्था में सुधार की छटपटाहट से परिपूरित जुबान तथा उसके मुकाबले बहुत कम बोलती आंखें हैं। इन दो के बीच प्लेटोनिक लव की एक बेहद चुनौतीपूर्ण कैमिस्ट्री को बेनेगल इन कलाकारों के अकल्पनीय अभियन की दम पर ही  तो सेल्युलाइड पर उतार सके थे।  नागेश कुकुनूर की सन 2009 में जारी फिल्म ‘8 गुणा 10 तस्वीर’ में उन्होंने बड़ा जोखिम उठाया। फिल्म का एक दृश्य दसियों बार रिपीट किया गया।


कमाल है कि इस दोहराव के बावजूद आप उकताते नहीं हैं। क्योंकि इस दृश्य को कर्नाड सहित बैंजामिन गिलानी ने भी थाम रखा था। वह ऐसी अदकारी दिखाते हैं कि हर मर्तबा यह दृश्य देखते समय आपको इनके अभिनय का नया रूप ही पता चलता है। कभी आपका ध्यान संवाद अदायगी खींचती है, तो कभी आप दृश्य की मांग के पूरी तरह मुताबिक अभिनय को देखकर मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। ऐसे मौके भी आते हैं, जब यह दोहराव कर्नाड तथा गिलानी की आंख, उनके हाथ का संचालन और शरीर को इधर से उधर मोड़ने की विविधता के चलते भी आपको कतई नहीं खलता है। जाहिर है कि मंझा हुआ अभिनेता हो तो निर्देशक बासु दा, बेनेगल तथा कुकुनूर जैसे जोखिम आसानी से लेकर सफलता हासिल कर सकता है। बेनेगल ने इसी अभिनय क्षमता की दम पर ‘निशांत’ में बेहद दब्बू स्कूल मास्टर (कर्नाड) के कंट्रास्ट में अमरीश पुरी, मोहन आगाशे तथा अनंत नाग जैसे दबंगों को उभारकर विजय तेंदुलकर की इस कृति की आत्मा के साथ पूरी तरह न्याय किया। कर्नाड आज हमारे बीच नहीं हैं, किंतु अभिनय के दम पर निर्देशक को रिस्क फैक्टर के चरम तक जाकर प्रयोग करने का मौका देने की उनकी देन हमेशा-हमेशा उनके प्रशंसकों के हृदय में जीवित रहेगी। भावनभीनी श्रद्धांजलि। 

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रत्नाकर  त्रिपाठी

रत्नाकर त्रिपाठी

रत्नाकर त्रिपाठी की गिनती प्रदेश के उन वरिष्ठ पत्रकारों में होती है जिन्हें लेखनी का धनी माना जा सकता है। राष्ट्रीय सहारा, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर सहित कई अखबारों और ई टीवी तक अपनी विशिष्ट छाप छोड़ने वाले रत्नाकर प्रदेश के उन गिने चुने संपादकों में से एक है जिनकी अपनी विशिष्ट पहचान उनकी लेखनी से है।



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