कभी न भुलाए जाएंगे सुनील दत्त, - 6 जून, जन्मतिथि



आइये, सुनील दत्त को याद करें। ‘मुझे जीने दो’ की स्मृति शायद आपको भी भयाक्रांत कर दे। ‘दर्द का रिश्ता’ का बेटी की सलामती के लिए तड़पता पिता फिर स्मृति में दस्तक देकर आंख नम कर सकता है। ‘पड़ोसन’ वाला भोला गमजदा शख्स को भी हंसने के लिए मजबूर करने की क्षमता रखता है। ‘दरिंदा’ और ‘गीता मेरा नाम’ की स्मृति आपको उनके किरदार के लिए नफरत से भर सकती है और ‘मुन्ना भाई एमबीबीएस’ की याद इस अंदाज में गमगीं करने की ताब रखती है कि यह इस महान शख्स की आखिरी फिल्म थी।  दत्त कई खूबियों से भरे हुए थे। हालांकि वह बहुत अच्छे अभिनेता साबित नहीं हुए, किंतु बेहद उम्दा इंसान के तौर पर उन्हें हमेशा याद किया जाएगा। हो सकता है कि उनके भीतर बहुत उम्दा अदाकार छिपा रहा हो, किंतु उसे बाहर निकालने की कभी कोशिश नहीं की गयी। निर्माता-निर्देशकों ने इस दिशा में अधिक प्रयास की जरूरत नहीं समझी। वजह शायद यह कि दत्त के नाम से ही एक खास तरह की फिल्में चल निकलने का क्रम निर्बाध रूप से संचालित हुआ। फिर भी कई फिल्में देखकर यह दु:ख होता है कि उनके अभिनय को उभारने का जतन ही नहीं किया गया। मेहबूब खान चाहते तो ‘मदर इंडिया’ में सुनील को किरदार के भीतर और उतरने का मौका दे देते, किंतु खान का सारा फोकस फिल्म को नरगिस के इर्द-गिर्द ही रखने में रहा


‘मुझे जीने दो’ में दत्त के अभिनय के कमजोर पक्ष को ‘प्राण जाये पर वचन न जाये’ में उभारा जा सकता था। सीक्वेंस के दृष्टिकोण से ‘प्राण जाये...’ ‘मुझे...’ की नकल कही जा सकती है। हालांकि  ‘प्राण जाये...’ में निर्देशक एस अली रजा का अधिकतर ध्यान रेखा से एक्सपोज कराने और खनकदार गीत-संगीत को प्रमोट करने में ही ज्यादा दिखा। यह सब याद रखना पीड़ा का सबब बनता है। किंतु इस सबको बिसराया भी नहीं जा सकता। मन में सवाल तो उठते ही रहते हैं। वह यह कि क्यों कर बाकी लोग दत्त जैसे नहीं हुए। सुनील ने बेटे संजय दत्त की डेब्यू फिल्म ‘रॉकी’ का निर्देशन किया। जाहिर है कि मामला बेटे को आगे लाने का था। इसके बावजूद सुनील ने बड़ा जोखिम लेते हुए संजय के अपोजिट शक्ति कपूर को रखा। शक्ति भले ही फिल्म के खलनायक थे, लेकिन यह वह दौर था, जब वह रॉकी की पूर्ववर्ती कई फिल्मों में नायकों पर भारी पड़ चुके थे। दत्त ने इस फिल्म में शक्ति को न सिर्फ कुशल अभिनेता, बल्कि उम्दा डांसर के तौर पर भी उभारा। ‘रेशमा और शेरा’ में उन्होंने खुद से ज्यादा वेटेज फिल्म में उनके पिता का किरदार निभाने वाले जयंत को दिया। इस चित्र में सुनील ने जयंत को उनके अभिनय की क्रूरता उजागर करने में पूरी छूट प्रदान की। किंतु सुनील के साथ इस तरह के जोखिम क्यों नहीं लिये गये, यह अफसोस हमेशा सालता है।


वाकई अफसोस होता है कि सुनील की छिपी प्रतिभा को पहचानने के बावजूद राजकुमार कोहली जैसे दिग्गज ने क्यों सुनील पर ही केंद्रित किसी फिल्म का निर्माण क्यों नहीं किया। क्यों नहीं ऐसा हुआ कि खास सुनील को ही ध्यान में रखकर विशिष्ट शैली का कोई किरदार गढ़ा गया? सुनील अपने प्रोडक्शन हाउस का लाभ खुद के पक्ष में उठा सकते थे। हालांकि अधिकांश मौकों पर उन्होंने ऐसा करने से परहेज रखा। ‘ये रास्ते हैं प्यार के’ उन्होंने ही बनायी। अपने अभिनय पक्ष की कमी के बावजूद दत्त ने इस फिल्म में मोतीलाल और रहमान जैसे पल-भर में किरदार को साकार करने की क्षमता से भरपूर दिग्गजों को दमदार भूमिकाएं प्रदान कीं। उनका ही निर्माण ‘दर्द का रिश्ता’ पत्नी नरगिस की याद में इतना पवित्र प्रयास था, जिसका अधिकाधिक श्रेय उन्होंने बाल कलाकाल खुशबू के हिस्से में जाने का पूरा इंतजाम किया।  सुनील की स्मृति उन्हें ऐसे बिरले इंसान के तौर पर हमारे सामने लाती है, जिसने फिल्मों में जो अच्छा कहा,  उसे सार्वजनिक जीवन में करने की पूरी ईमानदार कोशिश से पीछे नहीं रहे। ‘मुझे जीने दो’ में यदि उन्होंने आतंक के अंत को दिखाया तो वास्तविक जिंदगी में खुद पंजाब से दिल्ली तक की पदयात्रा करके आतंक के खिलाफ आवाज भी उठाई।


‘दर्द का रिश्ता’ में देश में गंभीर बीमारी के इलाज न होने  पर दर्द जताया गया। दत्त ने वास्तविक जीवन में नरगिस दत्त कैंसर फाउंडेशन की स्थापना कर बीमारी से पीड़ित मानवता के जख्मों पर मलहम लगाने का महायज्ञ भी किया।  हम किसी और के जज्बात को लेकर फंतासी की दुनिया में रहना पसंद करते हैं। नरगिस से विछोह के बाद उनकी याद में तपड़ते राज कपूर के सैंकड़ों किस्से सुनने/पढ़ने मिल जाएंगे। लेकिन नरगिस की मृत्यु के बाद भीतर तक टूटे सुनील के दर्द का इस शिद्दत से चर्चा नहीं होता। कपूर और नरगिस का प्रेम मिली-जुली सफलता की बदौलत परवान चढ़ा। जबकि नरगिस के लिए दत्त ने प्रेम का संबंध स्थापित करने के स्वरूप में तब इजहार किया, जब यह अभिनेत्री लाइम लाइट से दूर हो चुकी थी और संबंध के नाम पर उनके हिस्से में कपूर से जुड़े चटखारेदार किस्से ही शेष रह गये थे। किसी के प्रेम की स्मृति में रची-बसी नरगिस को स-सम्मान और आत्मीय  प्रेम के साथ अपने जीवन में शामिल करना दत्त की महानता तथा उनके प्रति सम्मान में और इजाफा ही करता है। मुंबई में फिल्म जगत के जानकारों से मेरी कोई वाकफियत नहीं। इसलिए यह पता लगाना मुश्किल है कि राज कपूर के लिए सुनील क्या थे।


किंतु मेरे मत में दत्त ने अपने जीवन में नरगिस के प्रति उन कर्तव्यों को पूरी श्रद्धा से संपन्न किया, जो कर्तव्य राज पूरे नहीं कर सके। राज ने नरगिस को प्रेम दिया, किंतु दत्त ने प्रेम के साथ-साथ उन्हें परिवार से भी नवाजा। राज के लिए कहा जाता है कि  नरगिस से अलग होने के बाद वह घंटों रोया करते थे। न जाने क्यों इसी शिद्दत से यह नहीं कहा जाता कि नरगिस के अवसान के पश्चात सुनील अकेले में रोये और सार्वजनिक जीवन में अपनी पत्नी की स्मृति अक्षुण्ण रखने के लिए उन्होंने दूसरों को मुस्कुराहट प्रदान करने में कोई कसर नहीं उठा रखी। अब यह फैसला आप ही करें कि राज और सुनील में से किसका प्रेम/जज्बात नरगिस की ख्वाहिशों के अधिक समीप दिखायी पड़ता है।  कोई राजकुमार हीरानी कभी कोशिश नहीं करेगा कि सुनील के सच को उभारने के लिए फिल्म बनायी जाए। इसलिए यह कल्पना सिरे से ही बचकानी है कि किसी समय सुनील की बायोपिक बनाने का जतन होगा। गुरूवार को मुंबई में अपने इस पूर्व शेरिफ की याद में शायद ही कोई बड़ा आयोजन हो। कांग्रेस अपने इस पूर्व सांसद के जन्मदिन पर उन्हें निश्चित ही जवाहरलाल नेहरू, राजीव गांधी और इंदिरा गांधी जैसी शिद्दत से याद नहीं करेगी। उगते सूरज को अर्ध्य देने की परम्परा का  संवाहक बॉलीवुड गुजरे दौर के इस अदाकार की याद के लिए समय नहीं ही निकाल सकेगा। लेकिन क्या दत्त जैसे निष्काम कर्मयोगी की स्मृति को क्या वाकई इस सबकी दरकार है? मेरा जवाब है ‘कतई  नहीं’ और आपका...? &&&&&&&&&&&

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रत्नाकर  त्रिपाठी

रत्नाकर त्रिपाठी

रत्नाकर त्रिपाठी की गिनती प्रदेश के उन वरिष्ठ पत्रकारों में होती है जिन्हें लेखनी का धनी माना जा सकता है। राष्ट्रीय सहारा, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर सहित कई अखबारों और ई टीवी तक अपनी विशिष्ट छाप छोड़ने वाले रत्नाकर प्रदेश के उन गिने चुने संपादकों में से एक है जिनकी अपनी विशिष्ट पहचान उनकी लेखनी से है।



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