जन्मतिथि पर यूं फिर याद आए अली सरदार जाफरी



बलरामपुर। रईस घराने मे जन्म लेने के बावजूद गरीबों, मजलूमों से हमदर्दी रखने वाले ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत स्वतंत्रता संग्राम सेनानी एवं मशहूर शायर अली सरदार जाफरी की पुश्तैनी कोठी रखरखाव के अभाव में धूल फांक रही है।  उत्तर प्रदेश के बलरामपुर जिले में जन्मे अली सरदार जाफरी ने साहित्य के सर्वोच्च पुरस्कार ज्ञानपीठ पाने वाले देश के तीसरी ऐसे अदीब (साहित्यकार) हैं, जिन्हें उर्दू साहित्य के लिए इस पुरस्कार से नवाजा जा है। यह विडंबना ही है कि अली सरदार जाफरी की मौजूदगी मे जहां कभी नशिस्तो और मुशायरो की महफिले सजती थी, वहां आज वीरानी पसरी हुई है


  ‘एशिया जाग उठा’ और ‘अमन का सितारा’ समेत अनेक कृतियों से हिन्दी-उर्दू साहित्य को समृद्ध बनाने वाले अली सरदार जाफरी का नाम उर्दू अदब के महानतम शायरों में शुमार किया जाता है। उन्होने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंग्रेजों की यातनाएं झेलीं तो करने पर जेल का सफर किया,आवाज लगाकर अखबार बेचा तो नजर बंद किये गये। एक अगस्त 1913 को जिले के बलुहा मोहल्ले में जन्मे सरदार जाफरी ने अपने साहित्यिक सफर की शुरुआत शायरी से नहीं, बल्कि कथा लेखन से की थी। शुरुआत में उन पर जिगर मुरादाबादी, जोश मलीहाबादी और फिराक गोरखपुरी जैसे शायरों का प्रभाव पड़ा। जाफरी ने 1933 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में दाखिला लिया और इसी दौरान वे कम्युनिस्ट विचारधारा के संपर्क में आए। उन्हें 1936 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से निष्कासित कर दिया गया।


बाद में उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा पूरी की। जाफरी ने अपने लेखन का सफर 17 वर्ष की ही उम्र में शुरू किया। उनका लघु कथाओं का पहला संग्रह ‘मंजिल’ नाम से वर्ष 1938 में प्रकाशित हुआ। उनकी शायरी का पहला संग्रह ‘परवाज’ नाम से वर्ष 1944 में प्रकाशित हुआ। आप ‘नया अदब’ नाम के साहित्यिक जर्नल के सह-संपादक भी रहे। एक अगस्त 2000 को दुनिया को अलविदा कहने वाले जाफरी प्रगतिशील लेखक आंदोलन से जुड़े रहे। वे कई अन्य सामाजिक, राजनैतिक और साहित्यिक आंदोलनों से भी जुड़े रहे। प्रगतिशील उर्दू लेखकों का सम्मेलन आयोजित करने को लेकर उन्हें 1949 में भिवंडी में गिरफ्तार कर लिया गया। तीन महीने बाद ही उन्हें एक बार फिर गिरफ्तार किया गया। जाफरी ने जलजला, धरती के लाल (1946) और परदेसी (1957) जैसी फिल्मों में गीत लेखन भी किया।


वर्ष 1948 से 1978 के बीच उनका नई दुनिया को सलाम (1948) खून की लकीर, अमन का सितारा, एशिया जाग उठा, पत्थर की दीवार, एक ख्वाब और पैरहन-ए-शरार और लहू पुकारता है जैसे संग्रह प्रकाशित हुए। इसके अलावा उन्होंने मेरा सफर जैसी प्रसिद्ध रचना का भी लेखन किया। उनका आखिरी संग्रह सरहद के नाम से प्रकाशित हुआ। इसी संग्रह की प्रसिद्ध पंक्ति है ’’गुफ्तगू बंद न हो बात से बात चले’’। वयोवृद्ध शायर ने कबीर, मीर और गालिब के संग्रहों का संपादन भी किया। दो डाक्यूमेंट्री फिल्में भी बनाईं। उर्दू के सात प्रसिद्ध शायरों के जीवन पर आधारित ‘कहकशां’ नामक धारावाहिक का भी निर्माण किया। उन्हे वर्ष 1998 में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया।


वे फिराक गोरखपुरी और कुर्तुल एन हैदर के साथ ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित होने वाले उर्दू के तीसरे साहित्यकार हैं। उन्हें वर्ष 1967 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया। वह उत्तर प्रदेश सरकार के उर्दू अकादमी पुरस्कार और मध्यप्रदेश सरकार के इकबाल सम्मान से भी सम्मानित हुए। उनकी कई रचनाओं का भारतीय एवं विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुआ। साहित्यिक संस्था अभिव्यक्ति के अध्यक्ष डॉ शेहाब जफर ने बताया कि अली सरदार जाफरी एक ऐसा शख्स जो रईस घराने मे पैदा हुआ। मगर गरीबों और मजलूमों से हमददर्दी रखने वाले जाफरी साहब ऐशो आराम की जिन्दगी त्याग कर तहरीके आजादी से जुड गए। जाफरी न सिर्फ एक बेलौस वतन परस्त इंसान थे बल्कि उर्दू अदब का एक ऐसा रौशन सितारा जो दुनिया-ए- अदब के आसमान पर अपनी आबो ताब के साथ आज भी चमक रहा है। महान शायर ,साहित्यकार व स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अली सरदार जाफरी मुम्बई मे एक अगस्त सन 2000 को दुनिया को अलविदा कह गये। सामाजिक कार्यकर्ता और वरिष्ठ अधिवक्ता सैय्यद अनीसुल हसन रिजवी बताते है कि साहित्यिक सेवाओ के चलते दुनिया ने जाफरी साहब को सिर आखों पर बिठाया लेकिन उन्हें जो सम्मान उनके पैतृक शहर मे मिलना चाहिए था वह उन्हें नहीं मिला।

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