मायने डीके होने के...



 कर्नाटक में कांग्रेस से जुड़ा कोई अहम सियासी घटनाक्रम हो और डीके शिवकुमार का नाम सामने न आये, ऐसा बीते कुछ सालों में संभव ही नहीं रहा है। आर्थिक  स्थिति के लिहाज से आप उन्हें अरबपति से कुछ आगे ही मान सकते हैं। राजनीतिक वजन भी ऐसा कि कांग्रेस में सीधे सोनिया गांधी तक उनकी प्रभावी पहुंच बतायी जाती है। पैसे तथा सियासत की गरमी का असर उनके बातचीत के अंदाज में साफ दिखता है। दो दिन पहले अपने राज्य से बाहर मुंबई में पुलिस अफसरों से बहस करते शिवकुमार ने कहा था, ‘चाहे लाखों नारे लगाए जाएं, ये डीके शिवकुमार किसी भी चीज से डरने वाला नहीं है। मैं अकेला आया हूं और अकेला ही जाऊंगा।’ वह इस बात से खफा थे कि कर्नाटक के बागी विधायकों से उन्हें  मिलने नहीं दिया गया। उलटे पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया। अपने राज्य में जनता दल सेक्युलर तथा कांग्रेस की सरकार को  बनाए  रखने के लिए मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी और पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया से अधिक मेहनत कर रहे 57 वर्षीय शिवकुमार के लिए कहा जाता है कि उनकी नजर राज्य के मुख्यमंत्री पद पर है। इसके लिए वह हर किस्म से ‘योग्य’ हैं, किंतु किस्मत ने अब तक उनका साथ नहीं दिया है


  बेंगलुरु सहित कर्नाटक के किसी हिस्से में यदि आप केवल ‘डीके’ का संबोधन प्रयुक्त करेंगे तो कोई भी समझ जाएगा कि आप दरअसल डीके शिवकुमार की बात कर रहे हैं। कांग्रेस का यह नेता भी खुद को पूरे नाम की बजाय महज ‘डीके’ से बुलाया जाना पसंद करता है। आप कह सकते हैं कि यह उनकी अदा में शामिल हो गया है। राज्य में सियासी उथल-पुथल के बीच कुमारस्वामी तथा सिद्धारमैया कमजोर दिख रहे हैं। भाजपा को इसका लाभ मिलने की पूरी  उम्मीद है, किंतु डीके से उसका खौफ साफ महसूस किया जा सकता है। पूर्व मुख्यमंत्री एवं भाजपा नेता बीएस येदियुरप्पा ने हाल ही में कहा है, ‘डीके इस तरह के मामलों को संभालने में माहिर हैं। लोग आज भी उनकी हरकतों को नहीं भूले हैं।’ येदियुरप्पपा का इशारा उन दो घटनाक्रम की तरफ भी था, जिनमें डीके ने कांग्रेस के विधायकों को तोड़-फोड़ से बचाने के लिए गुजरात और महाराष्ट्र में उनके ठहरने एवं सारी ‘सुख-सुविधाओं’ का खर्च उठाया था। बता दें कि येदियुरप्पा ने उक्त बात मीडिया के सामने रिकॉर्ड पर कही थी। गुजरात का मामला वह है, जिसमें अहमद पटेल को हराने के लिए भाजपा ने कांग्रेस विधायक दल में फूट डालने का प्रयास किया था। डीके ने इस लड़ाई में कूदकर सीधे-सीधे भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चहेते अमित शाह से दुश्मनी मोल ली थी।


केंद्र से अदावत का अंजाम जानते हुए भी वह इससे पीछे नहीं हटे। कर्नाटक में कहा जाता है कि सन 2017 में डीके के ठिकानों पर पड़े आयकर के छापे इसी दुश्मनी का नतीजा थे, जिनका  फल डीके आज भी भोग रहे हैं। कांग्रेस विधायक कोंडजी मोहन ने एक न्यूज पोर्ट से डीके के लिए कहा, ‘चीजों को देखने का उनका रवैया किसी भी दूसरे नेता से बिल्कुल अलग है। उनकी क्षमता बेहिसाब है। वो धारणाओं को तोड़ने में माहिर हैं और पार्टी के प्रति उनकी निष्ठा पर किसी तरह का सवाल ही नहीं उठाया जा सकता।’ वहीं कांग्रेस प्रचार समिति के महासचिव मिलिंद धर्मसेन कहते हैं, ‘मैं ने उन्हें अपने स्कूल के समय से देखा है। हम एक ही गांव सथनूर से हैं। लोग नतीजों को लेकर फिक्रमंद रहते हैं, लेकिन वो कभी किसी भी चीज से नहीं घबराते हैं। अगर उन्होंने कुछ हाथ में लिया है तो उसे पूरा करके ही रहते हैं।’ उन्हें बेहद नजदीक से जानने वाले एक शख्स ने नाम उजागर नहीं करने की शर्त पर बताया, ‘वो एक बेहद ठहरे हुए इंसान हैं। महत्वाकांक्षी भी हैं और उनकी इच्छा मुख्यमंत्री बनने की भी है। वो मुख्यमंत्री की कुर्सी पाने के लिए हर संभव प्रयास करेंगे। क्योंकि उनका मानना है कि उनकी किस्मत में कर्नाटक का मुख्यमंत्री बनना लिखा है।’ पार्टी की खातिर दुश्मन भी स्वीकार  डीके ने अपनी सियासत की शुरूआत ही जनता दल सेक्यूलर से संघर्ष करते हुए की।


साल 1985 में वह बारहवीं कक्षा में थे। तब उन्होंने बतौर कांग्रेस उम्मीदवार सथानूर (बैंगलोर (अब बेंगलुरू) ग्रामीण जिले से) के युवाओं को एकजुट करने का काम किया। हालांकि वो एचडी देवगौड़ा (वर्तमान मुख्यमंत्री के पिता) के खिलाफ चुनाव नहीं जीत सके। पांच साल बाद कांग्रेस ने उन्हें टिकट नहीं दिया। शिवकुमार ने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव पर लड़ा और इतिहास भी रचा। वोक्कालिगा समुदाय के मजबूत दावेदार देवेगौड़ा हार गए। फिर दस साल बाद, शिवकुमार ने विधानसभा में देवेगौड़ा के बेटे एचडी कुमारस्वामी को हराया। और उसके बाद उस समय की सबसे बड़ी राजनीतिक हलचल मचाते हुए उन्होंने 2004 के लोकसभा चुनाव में कनकपुरा लोकसभा सीट से अनुभवहीन तेजस्विनी को खड़ा कराकर देवगौड़ा को मात दी। लेकिन इसके बाद भी जब पार्टी ने जेडीएस और देवगौड़ा परिवार से हाथ मिलाकर कर्नाटक में गठबंधन सरकार बनाने का फैसला किया तो डीके ने एक अनुशासित कार्यकर्ता की तरह पार्टी के फैसले को स्वीकार कर लिया। उनके साथ काम कर चुके कांग्रेस के एक नेता का कहना है कि डीके ने सालों से चली आ रही देवगौड़ा परिवार और वोक्कालिगा समुदाय के प्रति बनी विरोधी छवि को एक पल में खत्म कर दिया। इसका मतलब ये हुआ कि उन्हें ये लगता है कि जब उन्हें जरूरत पड़ेगी तो वो भी उनका साथ देंगे।


श्रद्धांजलि के बीच भी अपनी फिक्र... कर्नाटक में पिछले एक सप्ताह के भीतर 14  विधायकों के इस्तीफे और जनता दल (सेक्युलर)- कांग्रेस गठबंधन सरकार के समक्ष  उत्पन्न संकट के बावजूद मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी ने अपनी तरफ से पहल करते हुए विधानसभा में विश्वास मत पेश करने के लिए समय तय करने की मांग की  है। कुमारस्वामी ने 11 दिवसीय विधानसभा सत्र के पहले दिन शुक्रवार को  सदन में कहा कि बागी विधायकों की ओर से उनकी सरकार को चेतावनी के  बावजूद प्रश्न काल जारी है और वह अध्यक्ष से अपना बहुमत साबित करने के लिए  तिथि तय करने की मांग करेंगे। उन्होंने अध्यक्ष से कहा, ‘मैं इस सत्र में  बहुमत सिद्ध करने के लिए आपकी अनुमति और समय मांग रहा हूं।’ दूसरी  तरफ विपक्षी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने कहा है कि जद (एस)-कांग्रेस  गठबंधन सरकार अल्पमत में है और मुख्यमंत्री को अपने पद से तत्काल इस्तीफा  दे देना चाहिए। मुख्यमंत्री के विश्वास मत संबंधी बयान के बाद भाजपा के वरिष्ठ नेता बीएस येदियुरप्पा अपने कक्ष में चले गये और अग्रिम कार्रवाई के संबंध में  विधि विशेषज्ञों से चर्चा की। इस घटनाक्रम पर भाजपा नेता एवं पूर्व उपमुख्यमंत्री के. एस. ईश्वरप्पा ने कहा कि शुक्रवार का सत्र दिवंगत सदस्यों को श्रद्धांजलि देने के लिये था लेकिन मुख्यमंत्री ने अपने विश्वासमत के बारे में बोला। ईश्वरप्पा ने कहा, ‘मुख्यमंत्री को दिवंगत सदस्यों को श्रद्धांजलि देनी चाहिए। उन्हें सोचना होगा कि श्रद्धांजलि देने की प्रक्रिया के बीच विश्वासमत हासिल करने की बात करना कैसे न्यायोचित है।’

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