बहुत बलवती मायावती की माया



बीते चौबीस घंटे के दौरान उत्तरप्रदेश में बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी के बीच जो सियासी तलाक हुआ, वह न तो नया घटनाक्रम है और न ही अनपेक्षित। हुआ वही, जो आम चुनाव में भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिलने पर होना था। मायावती ने सोमवार को ही संकेत दिये कि सपा से अलग हो जाएंगी। मंगलवार को उन्होंने ऐसा कर भी दिखाया। इसके बाद अखिलेश यादव ने भी ‘हाथी मेरा साथी’ वाले नाते को खत्म करने की बात कह दी। आज समीक्षा इस बात की कि इस बार के अंशकालिक गठबंधन में सपा और बसपा में किस का फायदा हुआ और किसका नुकसान। यह देखने की भी कोशिश है कि उत्तरप्रदेश की 11 विधानसभा सीटों पर जल्दी होने जा रहे उपचुनाव में इन दो दलों की क्या रणनीति रहेगी। बहुत संभव है कि हाथी और सायकिल दोनो ही अब अजीत सिंह के राष्ट्रीय लोकदल का बोझ और नहीं ही ढोना चाहेंगे। कांग्रेस की कमजोरी तो यथावत है ही। इसलिए संभव नहीं दिखता कि बसपा या सपा इस दल को अपने साथ लेकर चलने में रुचि दिखाएं। यही गुंजाइश दिखती है कि एक बार फिर एआईएमआईएम के प्रमुख असद्द्दीन ओवैसी फिर यहां प्रत्याशी उतारकर मुस्लिम मतों के जरिए सपा या बसपा की जरूरत बनने का जतन कर लें। या होता तो यह भी दिखता है कि केंद्र में मंत्री पद से वंचित रही अपना दल (एस) नाराजगी के चलते इन दो में से किसी एक दल की हमकदम बनने की दिशा में कदम उठा ले।  मायावती के व्यक्तित्व की सबसे खास बात यह है कि वह अपने पॉजिटिव और नेगेटिव, दोनो ही स्वरूप को न तो छिपाती हैं और न ही ऐसा होने से उन्हें खास परहेज रहता है


वरना यह संभव ही नहीं है कि जिस देश में तमाम दल लोकतंत्र की मजबूती की कसम (इन कसमों की सच्चाई की हम कोई गारण्टी नहीं ले सकते) खाते हुए थकते न हों, तब मायावती साफ कहें कि उन्हें केंद्र में मजबूत नहीं, बल्कि मजबूर सरकार चाहिए। इस साफगोई की वजह यह कि मायावती स्वभाव से धाकड़ हैं। ‘अपर हैंड’ की जुनून के हद तक जिद उनकी शख्सियत का खास हिस्सा है। कांशीराम के कहने पर जब उन्होंने समाजवादी पार्टी से हाथ मिलाया, तब भी पहली मुख्यमंत्री  का पद उन्होंने ही लिया। अखिलेश यादव के साथ उनके हालिया समाप्त हुए गठबंधन को ही लीजिए। लोकसभा चुनाव के नतीजे देखें तो सपा-बसपा गठबंधन का सीधा फायदा मायावती की पार्टी को हुआ और नुकसान समाजवादी पार्टी को। बसपा शून्य से 10 सीटों पर पहुंच गई और सपा 5 सीटें ही जीत पाई। इस पूरे गठबंधन में मायावती सीनियर और अखिलेश जूनियर पार्टनर की भूमिका में रहे। अब सीट के बंटवारे पर एक नजर डालें। अजीत सिंह की पार्टी ने इस गठबंधन में अपने लिए तीन सीट मांगीं। मायावती अड़ी रहीं कि दो से अधिक सीट नहीं देंगी। अंतत: हुआ यह कि अखिलेश यादव को ही अपने कोटे की मथुरा सीट राष्ट्रीय लोकदल को देना पड़ गयी। इससे हुआ यह कि जहां बसपा ने राज्य की 38 सीटों पर चुनाव लड़ा, वहीं समाजवादी पार्टी को 37 सीट ही मिल सकीं। जबकि गठबंधन का ऐलान करने के लिए आयोजित पत्रकार वार्ता में अखिलेश ने कहा था कि दोनो दल राज्य की 38-38 सीटों पर चुनाव लड़ेंगे। इसके बाद सभी शहरी सीटें मायावती ने समाजवादी पार्टी के कोटे में दे दी। ये लगभग 10 ऐसी सीटें थीं, जहां पर बीजेपी को हराना नामुमकिन होता है।


नतीजा यह हुआ कि अखिलेश इन दस सीटों पर हारने की मुद्रा में ही प्रत्याशी उतार पाये। चुनाव प्रचार की बारी आई, तो अखिलेश-मायावती ने एक साथ लगभग 19 संयुक्त रैलियां की। अखिलेश ने संयुक्त रैली के अतिरिक्त बसपा के 30-32 प्रत्याशियों के लिए अलग से अकेले चुनावी रैलियां की, किंतु मायावती ने सपा के किसी भी प्रत्याशी के लिए अलग से कोई भी चुनावी रैली नहीं की। जानकार मानते हैं कि मायावती ने 10 सीटें जीतने के बाद सपा का जनाधार कम करने के लिए उससे अलग होने का फैसला लिया है। क्योंकि लोकसभा चुनाव में 10 सीटे लाने के बाद अब बीएसपी ने फैसला किया है कि वह पहली बार उपचुनाव लड़ेगी। ऐसा बताया जा रहा है कि मायावती की निगाहें 2022 में सीएम पद पर हैं। ऐसे में अगर इन उपचुनाव में अखिलेश से गठबंधन रहता तो अखिलेश को यूपी का सीएम चेहरा बनाना पड़ता,  क्योंकि अखिलेश ने अनौपचारिक तौर पर 2019 में मायावती को पीएम चेहरा माना था। राव ने कहा था- लोकतंत्र का चमत्कार दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहराव ने यदि मायावती को ‘लोकतंत्र का चमत्कार’ कहा था, तो इसे गलत नहीं माना जा सकता। वह देश की पहली अनुसूचित जनजाति वाली महिला मुख्यमंत्री बनीं। यह डेमोक्रेसी का ही करिश्मा था। संघर्ष उनके जीवन का हिस्सा रहा है और अधिकांश मौकों पर इसमें सफलता उनकी सहचरी बनी है। उत्तरप्रदेश में मुख्यमंत्री रहते हुए मुलायम सिंह यादव ने कार सेवकों पर गोली चलवाकर सख्ती दिखाई थी। सन 2010 में मायावती मुख्यमंत्री थीं। तब इस मामले का अदालती फैसला आने वाला था। माहौल तनाव और अनिश्चितता से भरा हुआ था। खुद मुलायम ने चेतावनी दी कि राज्य के हालात बिगड़ सकते हैं।


लेकिन मायावती ने ऐसा होने की सूरत में गड़बड़ी करने वालों और उसे रोकने में नाकाम अफसरों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की चेतावनी मात्र जारी की। नतीजा यह कि भारी तनाव के बावजूद उत्तरप्रदेश में यह समय शांतिपूर्वक गुजर गया। ऐसा होने की वजह भी थी। मायावती गड़बड़ी के मामलों में अपनी सख्ती का एक परिचय इससे पहले दे चुकी थीं। उन्होंने पूर्ववर्ती मुलायम सिंह यादव सरकार द्वारा भर्ती किये गये 18 हजार पुलिस कांस्टेबल को बर्खास्त कर दिया था। क्योंकि मामला नियुक्ति में गड़बड़ी का था। काम में कोताही बरतने पर उन्होंने 12 आईएएस सहित छह आईपीएस को निलंबित कर दिया था। निलंबित आईएएस में कमिश्नर तथा कलेक्टर स्तर के अफसर तक शामिल थे। ऐसे तीखे तेवर  वाली मुख्यमंत्री की महज एक चेतावनी काम कर गयी और अयोध्या विवाद पर फैसले के दौरान प्रदेश में कहीं कोई अप्रिय घटना  नहीं हुई।  भला कोई भूला सकता है दो नवंबर, 2002 की वह रात, जब उत्तरप्रदेश में आतंक का  पर्याय रघुराज प्रताप सिंह उर्फ भैया राजा को मायावती के कहने पर पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था। मामला केवल इतना कि भैया राजा ने भाजपा के एक विधायक पूरन सिंह को जान से मारने की धमकी दी थी। दरअसल, मायावती ने इस गिरफ्तारी के जरिये ठाकुरों द्वारा किये जा रहे उनके विरोध का जवाब दिया था। भैया राजा वहां इस वर्ग के ‘दमदार’ प्रतिनिधि माने जाते हैं, जिनकी इस छवि को गिरफ्तारी से खासा धक्का पहुंचा था।  सुविधा वाली राजनीति मायावती अपने राजनीतिक हित के लिए पाला बदलने में माहिर हैं।


आज जिस भाजपा को वह पानी पी-पीकर कोसती हैं, उसी भाजपा के समर्थन की बदौलत दो बार वह उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं। सन 1995 के सनसनीखेज गेस्ट हाउस कांड की अलग से व्याख्या की जरूरत नहीं है। बस इतना ही कहना पर्याप्त है कि यदि घटनास्थल से मीडिया हट  जाता तो गेस्ट हाउस के एक कमरे में बंद मायावती शायद ही जीवित वापस आ पातीं। इस कांड को सपा के समर्थकों ने अंजाम दिया था। तब एकबारगी लगा था कि मायावती के जीते-जी उनका दल फिर कभी सपा से हाथ नहीं मिलाएगा, लेकिन जब बात ‘दुश्मन का दुश्मन अपना दोस्त’ पर आयी तो भाजपा को कमजोर करने के लिए मायावती ने सपा से गठजोड़ करने में कोई संकोच नहीं दिखाया। दस सांसदों की दम पर मायावती अगले पांच साल तक अपनी चिर-संचित अभिलाषा यानी प्रधानमंत्री का पद पाने के लिए कोई कसर नहीं उठा रखेंगी। जरूरत पड़ी तो वह एक बार फिर ‘तिलक, तराजू और तलवार...’ वाली राजनीति अपना सकती हैं। मायावती की राजनीतिक माया बेहद बलवती है। जरूरत है तो बस एक बार हाथी को फिर भरपूर जनसमर्थन वाली खुराक मिलने की। ...और अंत में करीब तीन महीने पहले यूपी गये एक सज्जन ने रोचक किस्सा सुनाया। घर लौटते समय उनका रेलवे रिजर्वेशन कंफर्म नहीं था। राज्य की मौजूदा सत्तारूढ़ पार्टी के एक विधायक ने उन्होंने सिफारिशी चिट्ठी लिखवायी। किंतु रिजर्वेशन कंफर्म नहीं हुआ। सज्जन ने किसी की सलाह पर बसपा के एक  पूर्व विधायक से बात की। उन्होंने रिजर्वेशन का काम देखने वाले को फोन लगाया। उनके बीच हुई पूरी बातचीत का खुलासा करना उचित नहीं है। बहरहाल, नेताजी ने अफसर से कहा कि बहनजी की सरकार बनी तो उन्हें याद दिलाया जाएगा कि बसपा के कहने पर एक रिजर्वेशन कंफर्म नहीं किया गया। आधे घंटे के अंदर टिकट कंफर्म हो गया। सज्जन ने यूपी में रहने वाले अपने रिश्तेदारों के हवाले से कहा, ‘यूपी में बहनजी का समय हो या न हो, किंतु यूपी उनका था, है और रहेगा भी।’ बात में दम तो दिखता है। 

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रत्नाकर  त्रिपाठी

रत्नाकर त्रिपाठी

रत्नाकर त्रिपाठी की गिनती प्रदेश के उन वरिष्ठ पत्रकारों में होती है जिन्हें लेखनी का धनी माना जा सकता है। राष्ट्रीय सहारा, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर सहित कई अखबारों और ई टीवी तक अपनी विशिष्ट छाप छोड़ने वाले रत्नाकर प्रदेश के उन गिने चुने संपादकों में से एक है जिनकी अपनी विशिष्ट पहचान उनकी लेखनी से है।



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