डॉ. मुखर्जी की मौत थी या हत्या...!



डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी की रहस्मयी मौत के तुरंत पश्चात उस समय के तात्कालीन उपराष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने उनके लिए कहा था, ‘अपने सार्वजनिक जीवन में वह अपनी अंतरात्मा की आवाज को एवं अपनी अंदरूनी प्रतिबद्धताओं को व्यक्त करने में कभी डरते नहीं थे। खामोशी में कठोरतम झूठ बोले जाते हैं, जब बड़ी गलतियां की जाती हैं, तब इस उम्मीद में चुप रहना अपराध है कि एक-न-एक दिन कोई सच बोलेगा।’ मुखर्जी की मृत्यु आज भी रहस्य के परदों में है। हालांकि यह कांच की तरह साफ तथ्य है कि अवसान के पश्चात भी मुखर्जी, ‘एक देश में दो विधान, दो निशान और दो प्रधान’, जैसी व्यवस्थाओं के पुरजोर विरोधी के तौर पर हमेशा याद किए जाएंगे। रविवार, 23 जून को मुखर्जी की पुण्यतिथि के अवसर पर सत्ता सुधार उनसे जुड़ी यह विशेष सामग्री पेश कर रहा है।  मुखर्जी के रहस्यमय निधन की भूमिका उस समय ही तय हो गयी थी, जब उन्होंने जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला की नीतियों और उन्हें पंडित जवाहर लाल नेहरू के संरक्षण के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था


वह संविधान के अनुच्छेद 370 के इस प्रावधान के घोर विरोधी थे, जिसके तहत कोई भी भारत सरकार से बिना परमिट लिए हुए जम्मू-कश्मीर की सीमा में प्रवेश नहीं कर सकता था। उन्होंने इस प्रावधान के विरोध में भारत सरकार से बिना परमिट लिए हुए जम्मू व कश्मीर जाने की योजना बनाई। इसके साथ ही उनका अन्य मकसद था वहां के वर्तमान हालात से स्वयं को वाकिफ कराना, क्योंकि अब्दुल्ला की सरकार ने वहां के सुन्नी कश्मीरी मुसलमानों के बाद दूसरे सबसे बड़े स्थानीय भाषाई डोगरा समुदाय के लोगों पर असहनीय जुल्म ढाना शुरू कर दिया था। इस अत्याचार की परिणति में डोगरा समुदाय के नेता प्रेमनाथ डोगरा ने बलराज मधोक के सहयोग से ‘जम्मू और कश्मीर प्रजा परिषद पार्टी’ की स्थापना की थी। यह दल शुरू से ही अब्दुल्ला की नाराजगी का सबब बना हुआ था।


तत्त्कालीन इंटेलिजेंस ब्यूरो के प्रमुख बीएन मलिक ने अपनी किताब ‘माई इयर्स विद नेहरू: कश्मीर’ में लिखा है कि शेख अब्दुल्ला चाहते थे कि सारे डोगरा कश्मीर छोड़कर भारत चले जाएं, और अपनी जमीन उन लोगों के लिए छोड़ दें, जिन्हें शेख अब्दुल्ला प्राणपन से चाहते थे। जब कूच किया कश्मीर की ओर  फिर आयी, 8 मई, 1953 की वह तारीख, जब मुखर्जी ने बलराज मधोक, अटल बिहारी वाजपेयी, टेकचंद, गुरुदत्त वैध और कुछ पत्रकारों के साथ दिल्ली से कश्मीर की ओर कूच किया। यह समूह एक ट्रेन में सवार था। किसी ने भी वहां जाने का परमिट नहीं लिया था। जिस समय उन्होंने जालंधर से अमृतसर की ट्रेन पकड़ी, तब एक शख्स ने खुद को सरकारी अफसर बताते हुए कहा कि वह मुखर्जी तथा सहयोगियों की गिरफ्तारी के लिए सरकारी आदेश का इंतजार कर रहा है। लेकिन इसी शख्स ने पठानकोट में मुखर्जी से कहा कि उन्हें बगैर परमिट कश्मीर की सीमा में प्रवेश की अनुमति दे दी गयी है। लेकिन रावी नदी के पुल पर यकायक मुखर्जी को गिरफ्तार कर लिया गया।


बता दें कि यह वह जगह थी, जहां भारतीय सुप्रीम कोर्ट का क्षेत्राधिकार लागू नहीं होता था। मुखर्जी को यहां पहुंचकर बताया गया कि उन्हें कश्मीर में न घुसने देने का आदेश यात्रा शुरू करने के दो दिन बाद ही जारी कर दिया गया था। मुखर्जी बगैर परमिट कश्मीर में जाने की बात पर अड़े रहे। उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। मजे की बात यह कि गिरफ्तारी का आ देश भी 10 मई को ही तैयार कर लिया गया था। यानी पूर्व नियोजित तरीके से यह गिरफ्तारी ऐसी जगह की गयी, जहां शेख अब्दुल्ला की हुकूमत चलती थी।  मुखर्जी को निशात बाग के करीब एक छोटे से कमरे में बंद  रखा गया। यह अस्थायी उपजेल ऐसी थी, जिसकी बहुत सारी सीढ़िÞयां थीं। चूंकि मुखर्जी पहले से ही पैर की तकलीफ से गुजर रहे थे। इसलिए इस उपजेल तक पहुंचना उनके लिए बेहद कष्टकारी हो गया था। यहां से मुखर्जी जो चिट्ठियां लिखते थे, उन्हें पूरी जांच के बाद ही जाने दिया जाता  था। उन्हें तमाम जरूरी सुविधाएं मुहैया नहीं करायी गयी थीं।


जानकारों के अनुसार शेख अब्दुल्ला ने यह आदेश दे रखा था कि डॉ.मुखर्जी को कोई अतिरिक्त सहूलियत तब-तक न दी जाए, जब तक वे खुद आदेश न दें। यहां तक कि उनके बड़े बेटे अनुतोष की पिता से मिलने की अर्जी भी ठुकड़ा दी गई। वह जेल में प्रतिदिन डायरी लिखा करते थे, जो कि उनके बारे में जानकारी का एक अच्छा स्त्रोत हो सकता था परन्तु शेख अब्दुल्ला की सरकार ने उनकी मौत के बाद उस डायरी को जब्त कर लिया और बार-बार गुजारिश के बावजूद भी अभी तक लौटाया नहीं गया है। 22 जून की सुबह उनकी तबियत अचानक बहुत ज्यादा बिगड़ गई। जेल अधीक्षक को सूचित किया गया। काफी विलम्ब से वह एक टैक्सी (एम्बुलेंस नहीं) लेकर पहुंचे और वह डॉ.मुखर्जी को उस नाजुक हालात में भी उनके बेड से चलवाकर टैक्सी तक ले गए। उनके बाकी दो साथियों को उनके साथ उनकी देखभाल करने के लिए अस्पताल जाने की इजाजत नहीं दी गई। उन्हें कोई निजी नर्सिंग होम में नहीं बल्कि राजकीय अस्पताल के स्त्री प्रसूति वॉर्ड में भरती कराया गया। एक नर्स जो कि डॉ.मुखर्जी के जीवन के अंतिम दिन उनकी सेवा में तैनात थी, ने डॉ.मुखर्जी की बड़ी बेटी सविता और उनके पति निशीथ को काफी आरजू-मिन्नत के बाद श्रीनगर में एक गुप्त मुलाकात के दौरान यह बताया था कि उसी ने डॉ. मुखर्जी को वहां के डॉक्टर के कहने पर आखिरी इंजेक्शन दिया था। उसने बताया कि जब डॉ मुखर्जी सो रहे थे तो डॉक्टर जाते-जाते यह बता कर गया कि, डॉ. मुखर्जी जागें तो उन्हें इंजेक्शन दे दिया जाए और उसके लिए उसने एम्प्यूल नर्स के पास छोड़ दिया।’

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