यकीनन ‘अजीत’ हैं डोभाल



अजीत डोभाल एक बार फिर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बनाये गये हैं। उन्हें नरेंद्र मोदी मंत्रिमंडल में कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया गया है। यानी बहुत मुमकिन है कि देश की हिफाजत से जुड़े इस अहम पद की बात होते समय अगले  पांच साल तक आपको जासूसी कथाओं, पराक्रमी योद्धाओं और इन पर आधारित फिल्मों जैसे प्रसंग रह-रहकर याद आते रहें। क्योंकि डोभाल का मामला कुछ इस तरह का ही है।  जो लोग डोभाल से जुड़ी चर्चाओं को उरी हमले के बाद की सर्जिकल स्ट्राइक या पुलवामा हमले के जवाब में की गयी ऐसी ही कार्रवाई के बाद से ही जानते हैं, उनके लिए यह जानना दिलचस्प होगा कि यह शख्स किसी समय पाकिस्तान में मुस्लिम के रूप में रहते हुए भारत के लिए जासूसी करता था। तब का एक प्रसंग बेहद रोचक है। उन दिनों पाकिस्तान की एक मस्जिद से मुस्लिमों की परंपरागत टोपी और इस्लामिक पोशाक पहने बाहर निकल रहे शख्स की  नजर दूसरे मुस्लिम पर पड़ी। लंबी-सफेद दाढ़ी वाला वह शख्स उसे लगातार घूरे जा रहा था। फिर उसने पहले को पास बुलाकर कहा, ‘तुम हिंदू हो।’ उसने इनकार कर दिया। तब सफेद दाढ़ी वाले ने उससे कहा, ‘तुम्हारा एक कान छिदा हुआ है। यह काम मुसलमान नहीं करवाते हैं। यदि इस देश में हिंदू रहते हुए भी मुस्लिम बनकर सुरक्षित रहना है तो इस छेद को प्लास्टिक सर्जरी से खत्म करवा दो।’ पहला सकते में आ गया। तब दूसरे ने बताया कि वह खुद भी एक हिंदू है और इस देश में मुस्लिम बनकर ‘अपना काम’ कर रहा है। कहा जाता है कि दाढ़ी वाला वह शख्स खुद अजीत डोभाल थे। जिन्होंने वहां रहते हुए कभी भी अपनी पहचान उजागर नहीं होने दी। जिसके लिए देश के गुप्तचर जगत में उनका नाम बेहद सम्मान से लिया जाता है


क्योंकि डोभाल ने 90 के दशक में पाकिस्तान में इसी तरह सात साल तक अपनी जान पर खेलकर देश के लिए अहम सूचनाएं एकत्र करने का काम किया था।  किसी फिल्म या फंतासी कथा में यह काम बेहद आसान लग सकता है। हॉलीवुड में आप जेम्स बांड को ऐसा ही करते हुए हसीनाओं के साथ मस्ती करते हुए देख सकते हैं। बॉलीवुड में भी ‘बेबी’ जैसी हालिया या धर्मेंद्र अभिनीत ‘आंखें’ वाली पुरानी श्रेणी की फिल्में देखकर आपको जासूसी बहुत थ्रिलिंग लग सकती है। लेकिन सच इससे पूरी तरह उलट और भयावह है। क्योंकि जासूसी तो दूर, इसके संदेह में भी यदि कोई पकड़ा जाए तो फिर उसका जिंदा बच पाना नामुमकिन हो जाता है। फिर मामला पाकिस्तान जैसे दुश्मन देश का हो, तो जान बचने की न के बराबर ही गुंजाइश रहती है। बल्कि यह सिलसिला नारकीय यातनाएं देकर मरने के लिए मजबूर करने तक भी पहुंच जाता है। जैसा सरबजीत के साथ हुआ था और जैसा कुलभूषण जाधव के साथ करने की पूरी तैयारी थी।  भारत के हिस्से वाले पंजाब में जन्मे सरबजीत सन 1990 में रास्ता भटककर पाकिस्तान की सीमा में चले गये थे। वहां उन्हें जासूस बताकर गिरफ्तार कर लिया गया। तेईस साल तक पाकिस्तान यह आरोप साबित नहीं कर सका। लेकिन सरबजीत को रिहा भी नहीं किया गया। जब भारत ने उनकी रिहाई के लिए दबाव बनाया तो सन 2013 में सरबजीत की  पाकिस्तान की कोट लखपत जेल में हत्या कर दी गयी। कुलभूषण जाधव भारतीय नौसेना से रिटायर्ड हैं। ईरान में किसी काम के सिलसिले में गये थे। पाकिस्तान ने वहां से उनका अपहरण कराया और देश लाने के बाद जाधव पर जासूसी का आरोप मढ़ दिया। उन्हें मौत की सजा भी सुना दी गयी।


गनीमत है कि भारत के प्रयास से मामला अंतर्राष्ट्रीय अदालत में पहुंच गया और जाधव की फांसी पर वहां से रोक लगा दी गयी। यह बताने का आशय है कि डोभाल ने सात साल तक जो किया, वह करने के लिए बहुत बड़े कलेजे की जरूरत थी। पाकिस्तान को उनकी मौजूदगी की भनक भी नहीं लग सकी। बाद में डोभाल ने जब खुद अपने से जुड़े घटनाक्रम सार्वजनिक किए तो पाकिस्तान के मीडिया ने उन्हें ‘इंडियन जेम्स बॉन्ड’ कहना शुरू कर दिया।  उत्तराखंड में 1945 में जन्मे डोभाल ने 1968 में आईपीएस के तौर पर पुलिस सेवा में पदार्पण किया था। नॉर्थ ईस्ट, खासकर मिजोरम में विद्रोहियों के खिलाफ सरकार के अभियान में उन्होंने खास भूमिका निभाई थी। इसी तरह पंजाब में भी विद्रोह को दबाने में डोभाल की भूमिका रही। इसके बाद जब वह इंटेलिजेंस ब्यूरो के प्रमुख बने तो उन्होंने आईबी में भी मल्टी एजेंसी सेंटर की स्थापना की और फिर इंटेलिजेंस में पहली बार जॉइंट टास्क फोर्स बनाई। डोभाल को 1990 में कश्मीर में कूका पारे जैसे आतंकियों को राजी करने और फिर भारत विरोधी आतंकियों का सफाया करने के मिशन में शामिल रहे. इन प्रयासों के बाद ही 1996 में जम्मू व कश्मीर में चुनाव होना संभव हो सका था। इंटेलीजेंस ब्यूरो से डोभाल सन 2015 में रिटायर हुए। इसके बाद उन्होंने जन नीतियों का एक थिंक टैंक विवेकानंद इंटरनेशल फाउंडेशन बनाया था सन  2009 और 2011 में उन्होंने 'सीक्रेट बैंकों और टैक्स के स्वर्गों में जमा भारत का काला धन' विषय पर दो बड़े लेख संयुक्त रूप से लिखे थे। सन 2014 में मोदी सरकार बनने पर डोभाल को पहली बार राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार का बेहद अहम जिम्मा मिला।


अब वह इसी पद के साथ एक बार फिर काम करने जा रहे हैं। उपलब्धियों की ऐसी ‘त्रिफला’ भी - सितंबर 2016 में पाकिस्तान के भीतर की गई भारत की सर्जिकल स्ट्राइक डोभाल के ही दिमाग की उपज थी, जो भारत के लिए एक बड़ी कामयाबी मानी गयी। इस कदम के बाद विदेश सचिव एस जयशंकर को मोदी का बायां हाथ कहा जाता था तो डोभाल को मोदी सरकार के दाहिने हाथ के तौर पर देखा जाने लगा था। जयशंकर और चीन में राजदूत विजय केशव गोखले के साथ ही डोभाल को भी डोकलाम के मुद्दे को कूटनीतिक ढंग से सुलझाने का श्रेय दिया जाता है।  स्ट्रैटजिक पॉलिसी ग्रुप यानी एसपीजी का प्रमुख बनने के बाद बालाकोट एयरस्ट्राइक डोभाल के जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ है। मीडिया के खबरों के अनुसार डोभाल इस एयरस्ट्राइक के पीछे प्रमुख व्यक्ति थे और साथ ही, उन्होंने भारतीय वायुसेना के विंग कमांडर अभिनंदन को पाकिस्तान के कब्जे से जल्द छुड़वाने के लिए भी पूरी बिसात बिछाई थी। जून 2014 में डोभाल ने कूटनीतिक और जासूसी ढंग से इराक से 46 भारतीय नर्सों को सुरक्षित भारत लाने का मिशन बखूबी अंजाम दिया था. इन नर्सों को इराक के तिरकित में एक आतंकी संगठन ने अपने जाल में फंसा लिया था, लेकिन डोभाल की कोशिशों के चलते करीब एक महीने बाद इन्हें महफूज भारत लाने में कामयाबी मिली थी। साथ ही, डोभाल ने आर्मी चीफ जनरल दलबीर सिंह सोहाग के साथ मिलकर क्रॉस बॉर्डर सैन्य अभियान को भी अंजाम दिया था। म्यांमार से नागालैंड में आतंकी गतिविधियां चलाने वाले आतंकी संगठनों के खिलाफ इस मिशन की कामयाबी इस तरह बताई गई कि 50 आतंकी मारे गए।


काश! ऐसे ही खुशकिस्मत होते कौशिक भी डोभाल सात साल तक पाकिस्तान में जासूसी करने के बावजूद सुरक्षित भारत लौट आये। यह  पढ़कर सुकून मिलता है तो एक टीस भी उठती है। वह यह कि काश, रवींद्र कौशिक भी डोभाल जितने खुशकिस्मत होते। राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले के रहने वाले कौशिक ने 23 वर्ष की आयु में स्तानक की पढ़ाई करने के बाद ही भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ में नौकरी शुरू की। सत्ता सुधार इसकी पुष्टि नहीं करता, किंतु मीडिया रिपोर्ट कहती हैं कि सन 1975 में कौशिक को भारतीय जासूस के तौर पर पाकिस्तान भेजा गया था और उन्हें नबी अहमद शेख का नाम दिया गया। पाकिस्तान पहुंच कर कौशिक ने कराची के लॉ कॉलेज में दाखिल लिया और कानून में स्नातक की डिग्री हासिल की। जाने के पहले उनका खतना भी कराया गया था। इसके बाद वो पाकिस्तानी सेना में शामिल हो गए और मेजर के रैंक तक पहुंच गए, लेकिन पाकिस्तान सेना को कभी ये अहसास ही नहीं हुआ कि उनके बीच एक भारतीय जासूस काम कर रहा है। तीस साल तक कौशिक देश और घर से दूर रहकर पाकिस्तान के भारत-विरोधी मंसूबों को पलीता लगाते रहे। क्योंकि यह देश जो भी साजिश रचता, कौशिक के जरिये उसकी खबर यहां तक पहुंच जाती थी।  लेकिन 1983 में कौशिक का राज खुल गया। दरअसल रॉ ने ही एक अन्य जासूस कौशिक से मिलने पाकिस्तान भेजा था जिसे पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ने पकड़ लिया। पूछताछ के दौरान इस जासूस ने अपने इरादों के बारे में साफ साफ बता दिया और साथ ही कौशिक की पहचान को भी उजागर कर दिया। हालांकि कौशिक वहां से भाग निकले और उन्होंने भारत से मदद मांगी, लेकिन भारत सरकार पर आरोप लगते हैं कि उसने उन्हें भारत लाने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई गई। आखिरकार पाकिस्तानी सुरक्षा एजेंसियों ने कौशिक को पकड़ लिया और सियालकोट की जेल में डाल दिया। वहां न सिर्फ उनका शोषण किया गया, बल्कि उन पर कई आरोपों में मुकदमा भी चला। जेल में ही सन 2001 में बीमारी से उनका निधन हो गया। 

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रत्नाकर  त्रिपाठी

रत्नाकर त्रिपाठी

रत्नाकर त्रिपाठी की गिनती प्रदेश के उन वरिष्ठ पत्रकारों में होती है जिन्हें लेखनी का धनी माना जा सकता है। राष्ट्रीय सहारा, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर सहित कई अखबारों और ई टीवी तक अपनी विशिष्ट छाप छोड़ने वाले रत्नाकर प्रदेश के उन गिने चुने संपादकों में से एक है जिनकी अपनी विशिष्ट पहचान उनकी लेखनी से है।



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