गुटबाजी से नहीं उठ पा रही कांग्रेस...



 मंदसौर। प्रदेश में गिरते पड़ते कांग्रेस की सरकार बन गई। पहले लग रहा था सरकार ज्यादा दिन नहीं चलेगी, लेकिन मुख्यमंत्री बने कमलनाथ के मैनेजमेंट ने सब समहाल लिया और सरकार को करीब 10 महीने हो गए है। सरकार बनने के बाद भी कांग्रेस गुटबाजी से उभर नहीं पा रही है। प्रदेश में तीन गुट चल रहे है। एक मुख्यमंत्री कमलनाथ का दूसरा पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का ओर तीसरा महाराज ज्योतिरादित्य सिंधिया का है। हर कोई अपने गुट को पॉवरफुल बनाने में लगा है। सिंधिया गुट चाहता है के महाराज प्रदेशाध्यक्ष बने तो उनका गुट पॉवरफुल हो


कमलनाथ प्रदेश ओर पार्टी दोनों के मुखिया है तो उन का गुट अभी सब से पॉवरफुल है। दिग्विजयसिंह मझे हुए राजनेता है वो जानते है कैसे सुर्खियों में रहना है। आए दिन दिग्गी राजा के पत्र और उनके ट्वीट जनचर्चाओं में रहते है। इनके समर्थक समय समय पर सार्वजनिक रूप से दूसरे नेता का विरोध करते रहते है। प्रदेश के किसी भी क्षेत्र का दौरा हो जिस गुट का मुखिया आता है उस के नेता लग जाते है सेवा में बाकी पार्टी एकता दिखाने भर मिलने पहुंचते है। अफीम नीति में सुधार की मांगों को लेकर सोमवार को मल्हारगढ़ विधानसभा के नेता श्यामलाल जोकचंद ने किसानों के साथ धरना प्रदर्शन कर ज्ञापन दिया।


मंगलवार को फिर उन्हीं मांगों को लेकर इसी विधानसभा सीट के इस बार के कांग्रेस प्रत्याक्षी परशुराम सिसौदिया ने धरना ओर ज्ञापन दिया। बतादे जोकचंद 2008 ओर 2013 विधानसभा चुनाव कांग्रेस से लड़े ओर हार गए।फिर इसी विधानसभा क्षेत्र से जनपद उपाध्यक्ष परशुराम सिसौदिया ने कांग्रेस से 2018 में चुनाव लड़ा मगर वो भी हार गए। यहां यह बताना जरूरी है, कि जोकचंद मीनाक्षी नटराजन के गुट से आते है ओर परशुराम सिंधिया गुट से। पिछले विधानसभा चुनाव में मीनाक्षी दीदी गुट पर सिंधिया गुट भारी पड़ गया ओर कांग्रेस से टिकिट परशुराम को मिल गया। इस विधानसभा सीट पर महाराज ने अपने चेले को जिताने में कोई कसर नहीं छोड़ी।


लगातार दौरे किए, फिल्म अभिनेत्री नगमा का दौरा करवाया। किसान आंदोलन की जन्मभूमि होने के कारण सरकार को खूब घेरा, लेकिन हुआ वही जो होता आ रहा था, कांग्रेस चुनाव हार गई और भाजपा ने अपनी यह सीट फिर बचा ली। सूत्र बताते है इस हार में जोकचंद की बड़ी भूमिका थी। उस समय जोकचंद टिकिट कटने से नाखुश थे। सूत्र बताते है दो बार चुनाव हारना ओर मीनाक्षी दीदी का स्थानीय विरोध होना उनका टिकिट कटने का मुख्य कारण बना था। जोकचंद की नाराजगी परशुराम को भारी पड़ी और वो चुनाव हार गए। इस गुटबाजी ओर आपसी लड़ाई में फायदा एक बार फिर भाजपा का ही हुआ।


लेकिन उस के बाद भी ना तो ये दोनों नेता समझ रहे है और ना ही कांग्रेस पार्टी समझ रही है की इस का नुकसान उन्हें खुद उठाना पड़ रहा है। जितनी भी लड़ाई है टिकिट मिलने तक कि होना चाहिए। टिकिट मिलने के बाद पूरी कांग्रेस जिस दिन एक हो कर लड़ ली उस दिन कांग्रेस वापस जितना शुरू कर देंगी।  जोकचंद परशुराम की लड़ाई में पिस्ते कार्यकर्ता... सोमवार को जोकचंद की सेना का धरना प्रदर्शन था और मंगलवार को परशुराम की सेना का। दोनों के निजी कार्यकर्ता (जिन्हें कांग्रेस से कोई लेना देना नहीं है) अपने-अपने नेताओं को चने के झाड़ पर चढ़ा रहे है। अपना धरना सफल उस का फेल कह कर। लेकिन इस लड़ाई में उन खाटी कांग्रेसी कार्यकर्ताओं का नुकसान हो रहा है जो सिर्फ पंजे को जितना चाहते है। ऐसे दो दो धरने की वजह से किस धरने में जाएं और किस में नहीं यह कार्यकर्ताओं के लिए परेशानी का कारण बन रहा था।

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