सुरसा बनकर परीक्षा लेने मुँह खोले खड़ा है वक़्त ..



कौशल किशोर चतुर्वेदी सर अभी तक आप कांग्रेस में थे, अचानक बीजेपी में आ गए कैसा लगा आपको? मेरे बीच में तो ठीक है अच्छी खासी चलती हुई सरकार आपने गिरा दी, कैसा फ़ील हुआ आपको? हम बात करते हैं किसानों की तो कुछ दिन पहले आपके ज्योतिरादित्य सिंधिया जी ने ही ट्वीट किया था कि इतने किसानों का क़र्ज़ा माफ़ हुआ है। फिर अचानक आपके ज्योतिरादित्य सिंधिया ने बोल दिया कि किसी का क़र्ज़ा माफ नहीं हुआ है। मंत्री समर्थकों द्वारा वोटर के सवाल का विरोध करने पर आवाज आती है - मैं भी उनकी वोटर हूँ ...मेरा हक है सवाल पूछने का। इंदौर की कॉलोनी नरीमन प्वाइंट की उपासना शर्मा के यह सवाल निश्चित तौर से लाज़िमी हैं


यह सवाल कांग्रेस और भाजपा दोनों सरकारों में मंत्री पद से नवाजे गए, सांवेर विधानसभा चुनाव 2018 में कांग्रेस के टिकट पर चुनकर विधायक और फिर मंत्री बने और कांग्रेस से इस्तीफ़ा देकर भाजपा में शामिल होकर मंत्री बनकर उपचुनाव में भाजपा के टिकट पर विजय का वरण सुनिश्चित करने के लिए मतदाताओं के सामने पहुँचे वरिष्ठ अनुभवी राजनेता तुलसी सिलावट की बेचैनी ज़रूर बढ़ा रहे होंगे। हालाँकि वह अपनी कुशलता की छाप छोड़ने में कसर नहीं छोड़ेंगे। विश्व की सबसे बड़ी पॉलिटिकल पार्टी भाजपा के लाखों अनुशासित, समर्पित कार्यकर्ता अपने उम्मीदवार को जिताने और प्रदेश की भाजपा सरकार की लंबी आयु की कामना करने में समर्पण और परिश्रम की पराकाष्ठा कर देंगे। परंतु यह सवाल प्रजातंत्र के नीले आकाश में लगातार गूँजते रहेंगे। यह सवाल दलगत राजनीति का हिस्सा नहीं हैं।


अगर भाजपा सरकार गिराकर कांग्रेस ने इस तरह सरकार बनाई होती तब भी वोटर अपनी बेचैनी को दूर करने के लिए किसी सभा में उम्मीदवार के सामने इस तरह का सवाल ज़रूर दागता। दाग किसने लगाया, दाग क्यों लगा और दाग कब लगा...जैसे सवाल अब भले ही औचित्यहीन हो गए हों लेकिन मतदाता के मन में यह बेचैनी बनकर उमड़-घुमड़ रहे हैं। मतदाता को तो संतुष्ट करना ही पड़ेगा कि आख़िर पाँच साल के लिए दिए उसके वोट के साथ खिलवाड़ क्यों किया गया? यह सवाल सुनकर कांग्रेस नेताओं के मन में खुशी के लड्डू फूट रहे होंगे लेकिन उनकी खुशी परिणाम आने के बाद धूल के बवंडर की तरह उड़ती नज़र आ सकती है। जिस तरह सुप्रीम कोर्ट में दो दिन की सुनवाई के बाद कांग्रेस नेताओं ने उम्मीद लगाई होगी कि फैसला उनके प़क्ष में आने वाला है। विधायकों को बैंगलुरु से भोपाल जाकर विधानसभा अध्यक्ष की अदालत में पेश होने का आर्डर सर्वोच्च अदालत सुनाने वाली है और फिर बाज़ी पलटना तय है।


भाजपा और सिंधिया को मुँह की खानी पड़ेगी और मध्यप्रदेश की हवा में जय जय कमलनाथ के नारे गूंजेंगे पाँच साल तक। यह भ्रम तब भी पालना महँगा पड़ा था और ऐसा भ्रम अब भी पाला तो मुँह की खानी पड़ सकती है। वोटर का अधिकार है कि वह अपने दिमाग में बन गए संशय के जालों की सफ़ाई मतदान करने से पहले कर ले और अंतिम निर्णय से पहले किंतु-परंतु से मुक्त हो जाए। जो काम वोटर ज़िम्मेदारी और जागरूकता के साथ करेगा लेकिन वोटर अंतिम फैसला क्या लेगा यह कह पाना अभी जल्दबाज़ी होगी। पर यह बात तय है और कांग्रेस के पक्ष में है कि वोटर सवाल किए बिना नहीं रहेगा। यदि सवाल करने से रोका गया या आवाज दबाने की कोशिश की गई तो विस्फोट भाजपा के खेमे में होना तय है। यदि वोटर की क्रिया की तीखी प्रतिक्रिया देने की मिसाल क़ायम की गई तो विधानसभा के मतदाताओं की तीखी प्रतिक्रिया मतदान के समय होने से कोई नहीं रोक पाएगा।


जिस तरह उपासना शर्मा के मामले में तुलसी सिलावट के समर्थक फ़ेसबुक पर ट्रोल कर या अपमानजनक शब्द लिखकर कर रहे हैं।यदि ऐसा ही हुआ तो सांवेर से निकला यह भाजपा विरोधी जिन्न उन 22 विधानसभा उपचुनाव वाली सीटों पर हर मतदाता के दिमाग में भाजपा प्रत्याशियों के ख़िलाफ़ उल्टा लटका नज़र आएगा और लोकतंत्र की दुहाई देकर कांग्रेस भी अंतिम आहुति डालकर वापसी की हरसंभव कोशिश करने से नहीं चूकेगी। फिर न वर्चुअल रैली काम में आएगी न कोरोना काल में सभाएँ ही जादू बिखेर पाएँगी। पर यदि वोटर को सवाल करने के बदले में ज़लील करने की बजाय संतुष्ट करने की कोशिश की गई तो कैडर बेस पार्टी और मंत्री और पार्टी के दमख़म का दोगुना जोश और ताक़त लेकर भाजपा के 22 नवागत उम्मीदवार पार्टी को ख़ुशियाँ मनाने का पूरा अवसर देने का मौक़ा पा सकते हैं और शिवराज की मुस्कराहट को भी क़ायम रख सकते हैं। फ़िलहाल वक़्त भाजपा की परीक्षा लेने के लिए सुरसा की तरह मुँह खोले खड़ा है। सवालों पर सफ़ाई लेने का वोटर का हक कोई नहीं छीन सकता? सफ़ाई तो देना ही पड़ेगी और वोट के लिए दुहाई भी माँगनी पड़ेगी कि आख़िर किस तरह की मजबूरियाँ के चलते यह फैसला लेना ज़रूरी था। इसके बाद मतदाता की बारी का इंतज़ार भी करना पड़ेगा कि वह सफ़ाई दुहाई पर कांग्रेस के बाद अब भाजपा से चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों को आरोपों से रिहाई देने का मन बना पाता है या नहीं। हालाँकि मतदाता माँ की तरह वात्सल्य भाव से भरकर नटखट बच्चे की शैतानी पर भी मुग्ध हो सकता है या फिर पिता की तरह कठोर होकर रूष्ट होकर दंड देने का मन भी बना सकता है ताकि भविष्य में प्रजातंत्र के साथ शैतानी करने की सोच कोई मन में भी न लाए।&


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