ऐसी बलिदानी लाल मिर्चियों को शत-शत नमन



नामदेव दास त्यागी उर्फ कम्प्यूटर बाबा  मध्यप्रदेश में नर्मदा, मंदाकिनी और क्षिप्रा नदी न्यास के बकायदा अध्यक्ष बन गये हैं। इस फैसले को लेकर अपने दिमाग में अजीब भ्रम की स्थिति है। समझ नहीं आ रहा कि उन्हें यह ईनाम किसने और किस रूप में दिया है। क्या मुख्यमंत्री कमलनाथ की ओर से बाबा को दिग्विजय सिंह की हार पर यह पुरस्कार दिया गया है? या फिर दिग्विजय ने लोकसभा चुनाव में मिली पराजय के बावजूद ‘हिंदूवादी’ छवि कायम रखने के प्रयास के तहत उन्हें यह पद दिलवाया है? खैर, संतोष एक बात का ही है। वह यह कि पांच क्विंटल लाल मिर्चियों का बलिदान व्यर्थ नहीं गया। उन एक हजार साधुओं का हठयोग भी कारगर रहा, जो कम्प्यूटर बाबा द्वारा किये गये लाल मिर्च वाले इस हवन में शामिल हुए थे


यज्ञ भोपाल में दिग्विजय सिंह की जीत की कामना ही नहीं, बल्कि उद्घोषणा की गरज से किया गया था। सिंह हार गये तो क्या! बाबा तो अपने सियासी टेक-आॅफ में सफल हो गये हैं ना! अब भोपाल के उस यज्ञ स्थल पर बाबा की समाधि तो बनने से रही। हालांकि कम्प्यूटर बाबा ने भविष्यवाणी की थी कि यदि दिग्विजय हारे तो वह खुद उसी स्थान पर समाधि ले लेंगे। अब यह तो ‘हुआ तो हुआ’ वाला युग है। इसलिए बाबा की नहीं, कम से कम मिर्चियों की समाधि तो वहां देखी ही जा सकती है। सच कहूं तो मिर्ची की खेती की जैसी मीठी फसल कम्प्यूटर बाबा ने काटी है, उसे देखकर उनकी तदबीर और तकदीर, दोनो से ही जलन हो रही है।


अपन तो यही कहकर ‘नेति-नेति’ कर लें कि बाबा हो तो ऐसा! यज्ञ हो तो ऐसा!! और सिद्धयोग हो, तो भी ऐसा!!!  वैसे ऐसी कोशिश और इस निर्णय में गलती क्या है? राजनीति में सिंगल विंडो सिस्टम जैसी किसी चिड़िया का कोई अस्तित्व नहीं होता। इसलिए वहां से अपने निहितार्थ पूरा करने के लिए अनगिनत खिड़कियों की घोषित-अघोषित, नैतिक तथा अनैतिक खिड़कियों का इंतजाम रखा जाता है। इसमें से एक खिड़की धर्म को पहले कर्म और फिर प्रपंच बनाकर स्वार्थ पूर्ति के लिए भी प्रयुक्त की जाती रही है। कम्प्यूटर बाबा तो सन 2014 से ही इस खिड़की पर आवेदन लिए  सियासी हठयोग कर रहे थे। तब उन्होंने आम चुनाव में आम आदमी पार्टी सहित भाजपा से भी टिकट लेने का जतन किया था। पता नहीं, उनकी कोशिशों में कौन सा वायरस अटैक हो गया कि बाबा असफल रहे।


फिर नये सिरे से ‘प्रोग्रामिंग’ की गयी। बाबा ने भाजपा में लॉगइन कर लिया। हालांकि शायद डेटा करप्ट होने जैसी स्थिति आ गयी। बाबा ने लॉगआउट किया और शिवराज सरकार के जाते ही री-स्टार्ट मोड पर आ गये। नया डेटा फीड किया। नये सिरे से प्रोग्रामिंग की। नतीजा यह कि राजनीतिक रैंडम एक्सेस मैमोरी यानी रैम बढ़वाकर समाधि वाली जमीन को राह तकता छोड़कर वल्लभ भवन के एयरकंडीशंड कक्ष में जा विराजे। हां, देखने वाली बात अब यह होगी कि इस कम्प्यूटर का माउस किसके हाथ में रहेगा और कौन इसका की-बोर्ड संचालित करेगा। क्योंकि मामला मुख्यमंत्री और पूर्व मुख्यमंत्री वाली दोहरी कृपा का हो चुका है।  नर्मदा, मंदाकिनी और क्षिप्रा नदी का पानी के रूप में कहीं संगम नहीं होता।


किंतु वल्लभ भवन के ऊपर बताये गये कक्ष में आज यकीनन एयर कंडीशनर की हवा में इन तीन नदियों के जल की ठंडक अवश्य ही महसूस की गयी होगी। इन तीन नदियों का तेजी से खत्म होता अस्तित्व आज फिर उम्मीदों के सागर में गोता लगा रहा होगा। नदियों की यह आशा बलवती हुई होगी कि कचरे से परिपूरित उनका पानी का कुछ और इस्तेमाल हो सके या नहीं, किंतु उससे अब लाल मिर्ची की फसल की सिंचाई तो की ही जा सकेगी। एक बात और। कम्प्यूटर बाबा  ने आज ही एक हेल्पलाइन नंबर भी जारी किया है। इस पर आप इन नदियों की दशा तथा दिशा पर खयालात जाहिर कर सकते हैं। शिकायत भी करने का आपको हक है। निवेदन केवल एक है कि इस नंबर पर बाबाजी से समाधि लेने की अधूरी घोषणा और दिग्विजय की विजय की असफल भविष्यवाणी के बारे में प्रश्न न करें। कम्प्यूटर से इस बारे में सभी डेटा डिलीट कर दिया गया है। किसी अच्छे खां का बाप भी उसे री-स्टोर नहीं कर सकता। हां, नदियों से हटकर आप बाबा से तीखी मिर्ची की मीठी फसल के बारे में पूछ सकते हंै। मूड सही हुआ तो  वह आपको इस जोरदार सियासी फसल की भरपूर पैदावार का हठयोगनुमा लिंक दे सकते हैं। 

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रत्नाकर  त्रिपाठी

रत्नाकर त्रिपाठी

रत्नाकर त्रिपाठी की गिनती प्रदेश के उन वरिष्ठ पत्रकारों में होती है जिन्हें लेखनी का धनी माना जा सकता है। राष्ट्रीय सहारा, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर सहित कई अखबारों और ई टीवी तक अपनी विशिष्ट छाप छोड़ने वाले रत्नाकर प्रदेश के उन गिने चुने संपादकों में से एक है जिनकी अपनी विशिष्ट पहचान उनकी लेखनी से है।



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