जागिए कि इतनी तेजी से खत्म हो रहा है जमीन के भीतर का पानी



देश में वर्ष 2008 से 2017 के दौरान 52 प्रतिशत कुंओं के भूमिगत  जल स्तर में गिरावट आयी है। केंद्र सरकार ने सोमवार को राज्यसभा में एक प्रश्न के उत्तर में यह चिंताजनक जानकारी दी। मामला इसलिए और गंभीर हो जाता है कि जानकार रह-रहकर यह चेतावनी दे रहे हैं कि देश में भूमिगत जल का स्तर ऐसा ही गिरता रहा तो सन 2025 तक बहुत बड़ी आबादी पानी से वंचित हो सकती है। सरकार ने आज कहा कि जल की मांग में वृद्धि , वर्षा में अनियमितता, औद्योगीकरण और शहरीकरण आदि में लगातार पानी के उपयोग से देश के विभिन्न भागों में भूमिगत जल स्तर में गिरावट आ रही है। इस जानकारी के अनुसार मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश सहित बिहार, पंजाब, उत्तराखंड, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, छत्तीसगढ़, दिल्ली, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर, महाराष्ट्र  और मेघालय  आदि राज्यों में भूगर्भ जल में तेजी से गिरावट हो रही है। जाहिर है कि पानी को बचाना आज की सबसे बड़ी जरूरतों में से एक बन गया है। इसके लिए यह समझना भी आवश्यक है कि आखिर ऐसे हालात के मुख्य कारण क्या हैं।  भारत दुनिया का सबसे बड़ा भूजल उपयोगकर्ता है। यहां सिंचाई के लिए 230 अरब घन मीटर भूजल प्रतिवर्ष दोहन होता है। भारत में कुल अनुमानित भूजल 122 से 199 अरब घन मीटर पाया गया है। देश के कुल सिंचित क्षेत्रफल के 60 प्रतिशत से अधिक भूभाग में सिंचाई के लिए भूजल का ही उपयोग किया जाता है


ऐसे क्षेत्रों में सिंधु-गंगा के मैदान और भारत के उत्तर-पश्चिमी, मध्य और पश्चिमी भाग शामिल हैं। कुछ क्षेत्रों (पश्चिमी भारत और सिंधु-गंगा के मैदान) में 90 प्रतिशत से अधिक भाग भूजल द्वारा सिंचित किया जाता है।  भारत में प्रागैतिहासिक काल से भूमिगत जल का इस्तेमाल हो रहा है। कुएं जलापूर्ति के महत्त्वपूर्ण साधन रहे हैं। मत्स्य पुराण में भी कुआं खोदे जाने का उल्लेख है। हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की खुदाई से पता चला है कि 3000 ई.पू. में सिंधु घाटी सभ्यता के लोगों ने ईंटों से कुओं का निर्माण किया था। मौर्यकाल में भी ऐसे कुओं का उल्लेख मिलता है। चंद्रगुप्त मौर्य के शासनकाल (300 ई.पू.) के दौरान कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी रहट के जरिए कुओं से सिंचाई का विवरण प्राप्त होता है। वराहमिहिर के ‘बृहद संहिता’ नामक ग्रंथ में भूमिगत जल के स्रोतों का पता लगाने की विभिन्न विधियों का विस्तार से वर्णन किया गया है। इस ग्रंथ में विशेष रूप से इस बात का उल्लेख किया गया है कि किस पौधों, दीमक की बाँधियों तथा मृदा एवं चट्टानों से जमीन के नीचे के पानी यानी भूमिगत जल के बारे में संकेत प्राप्त होता है। आज भी जल वैज्ञानिक मिट्टी की विशेषताओं, पेड़ों एवं झाड़ियों तथा जड़ी-बूटियों आदि की मौजूदगी से भूमिगत जल की मौजूदगी का पता लगाते हैं। आधुनिक युग में, ब्रिटिशकाल के दौरान सन 1900 में सिंचित भूक्षेत्र का क्षेत्रफल 1.3 करोड़ हेक्टेयर था। इसमें से 40 लाख हेक्टेयर की सिंचाई भूमिगत जल से की जाती थी।


इस प्रकार कुल सिंचाई जल का लगभग 30 प्रतिशत भूमिगत जल द्वारा प्राप्त किया जाता था। --------------------------------------------------------------------------- तेजी से बढ़ रहा कार्बन का उत्सर्जन बड़े पैमाने पर पानी के पंपों या ट्यूबवेल के जरिए हो रहा भूमिगत जल का दोहन दो रूपों में कार्बन उत्सर्जन को भी बढ़ावा दे रहा है। पानी निकालने के लिए पंपों के उपयोग से होने वाला उत्सर्जन और बायोकाबोर्नेट के निष्कर्षण से होने वाला कार्बन डाइआॅक्साइड उत्सर्जन इसमें शामिल है।अधिकांश भूजल भंडारों में रेत, बजरी, मिट्टी और कैल्साइट होते हैं। हाइड्रॉन आयन कैल्साइट के साथ अभिक्रिया करके बाइकाबोर्नेट और कैल्शियम बनाते हैं। भूजल जब वायुमंडल के संपर्क में आता है तो कार्बन डाइआॅक्साइड उत्सर्जित होती है और कैल्साइट गाद के रूप में जमा हो जाता है। बीते साल के अंत मेें भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, गांधीनगर के शोधकर्ताओं ने पंपिंग हेतु आवश्यक ऊर्जा और भूजल के रासायनिक गुणों संबंधी आंकड़ों के माध्यम से पंपिंग और बाइकाबोर्नेटों के कारण होने वाले कार्बन उत्सर्जन का आकलन किया था। उन्होंने पाया कि देश में प्रति वर्ष होने वाले कुल कार्बन डाइआॅक्साइड उत्सर्जन में भूजल दोहन से होने वाले कार्बन डाइआॅक्साइड उत्सर्जन (पंपिंग एवं बाइकाबोर्नेट) का भी दो से सात प्रतिशत योगदान होता है। यह हैं ऐसे हालात के प्रमुख कारण पूरे भारत में कई शहरों में कोल्ड ड्रिंक के प्लांट लगाए गए हैं। इन प्लांट्स की वजह से जमीनी पानी पर असर पड़ता है।


ये कंपनियां भारत में नियमों का अभाव होने से उसका फायदा उठाती हैं। तेजी से बढ़ रहा औद्योगिकीकरण भी इसका जिम्मेदार है। इसके अलावा लगातार हो रहे खनन और खुदाई की वजह से भी जमीन के पानी पर बहुत बुरा असर पड़ता है। इधर, शहरी इलाकों में लगातार आबादी बढ़ने की वजह से शहरीकरण हो रहा है और इमारते बनती जा रही हैं, जिसकी वजह से भूजल स्तर पर असर पड़ता है। पानी की जरूरत इमारत बनाने में भी होती है और यहां रहने वाले लोगों को भी। साथ ही गांवों में भी काफी तेजी से विकास के नाम पर पक्के मकान बनते जा रहे हैं और खेती की जमीन कम होती जा रही है। इसी वजह से खेती की जमीन की गुणवत्ता पर भी असर पड़ता है। शहरों में आबादी का दबाव तेजी से बढ़ता जा रहा है। आबादी का असर यहां बनने वाले अपार्टमेंट्स और कॉलोनियों के रूप में देखा जा सकता है। इन कॉलोनियों और अपार्टमेंट्स में मोटर लगाकर पानी जमीन से खींचा जाता है। बता दें कि सूखा और अनियंत्रित बाढ़, दोनों ही जमीन के पानी पर असर डालते हैं। जमीन के पास पानी को सोखने की क्षमता होती है। बाढ़ या सूखा पड़ने से ये शक्ति खत्म हो जाती है। -------------------------------------------------------------------- इतने भयावह होने जा रहे हैं हालात नदियों के जल स्तर कम होने का परिणाम भी जमीन के पानी में कमी आना है। ऐसा होने से नदियों के आस-पास के इलाकों में भूजल स्तर में गिरावट आती है। अगर ऐसा ही चलता रहा तो साल 2025 तक भारत पानी की कमी की चपेट में होगा।


बढ़ती आबादी के कारण जहां जल की आवश्यकता बढ़ी है, वहीं प्रति व्यक्ति जल की उपलब्धता भी समय के साथ कम होती जा रही है। कुल आकलनों के अनुसार सन 2000 में जल की आवश्यकता 750 अरब घन मीटर (घन किलोमीटर) यानी 750 जीसीएम (मिलियन क्यूबिक मीटर) थी। सन 2025 तक जल की यह आवश्यकता 1050 जीसीएस तथा सन 2050 तक 1180 बीसीएम तक बढ़ जाएगी। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय देश में प्रति व्यक्ति जल की औसत उपलब्धता 5000 घन मीटर प्रति वर्ष थी। सन 2000 में यह घटकर 2000 घन मीटर प्रतिवर्ष रह गई। सन 2050 तक प्रति व्यक्ति जल की उपलब्धता 1000 घन मीटर प्रतिवर्ष से भी कम हो जाने की आशंका है।  बोतलबंद ने बढ़ायी और समस्या जल प्रदूषण की समस्या ने बोतलबंद जल की संस्कृति को जन्म दिया। बोतलबंद जल बेचने वाली कम्पनियां भूमिगत जल का जमकर दोहन करती हैं। नतीजतन, भूजल-स्तर में गिरावट आती है। गौरतलब है कि भारत बोतलबंद पानी का दसवां बड़ा उपभोक्ता है। हमारे देश में प्रति व्यक्ति बोतलबंद पानी की खपत पांच लीटर सालाना है, जबकि वैश्विक औसत 24 है। देश में सन 2013 तक बोतलबंद जल का कारोबार 60 अरब रुपये था। सन 2018 में यह 160 अरब तक पहुंच गया था।  &&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&

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