शराब ठेकेदारों का कोरोना रूदन और सामाजिक सरोकार के नाटक.......



दिल्ली में शराब की दुकानों के सामने सोशल डिस्टेंस को धता बताती लंबी कतारों ने देश के सामने एक अलग कहानी सामने ला दी है। शराब किसी भी कीमत, किसी भी मात्रा में, कहीं भी हासिल करने की चाहत ने समाज में शराब की स्वीकार्यता को नापने के सारे मापदंड ध्वस्त कर दिए हैं। शराब को कोरोना ने हाइड्रो क्लोरो क्वीन से ज्यादा बड़ी जरूरत के रूप में स्थापित कर दिया है। करोना ने बता दिया है कि भूख, गरीबी,बेरोजगारी के बाद शराब हासिल करना भी भारत की एक प्रमुख समस्या है। अब चाहे तो इस विषय पर परीक्षा में निबंध लिखने के लिए भी कहा जा सकता है और शराब की उपलब्धता का संकट मीडिया की नई सुर्खियां बन सकता है। लोगों में शराब की सामाजिक स्वीकार्यता के कारण ही शायद आज आबकारी विभाग सरकारों के लिए राजस्व की उगाही में टाप थ्री में शामिल हो गया है। सैनिटाइजर से लेकर शराबबंदी और फिर शराब की सोशल डिस्टेंस के साथ बिक्री ने विभाग को राजस्व उगाहने के दायित्व के साथ सामाजिक भूमिका से भी जोड़ दिया है। कोरोना के बाद के इतिहास में आबकारी विभाग के लिए कोविड-19 फेस चेंजर और गेम चेंजर के रूप में याद किया जाएगा


होशंगाबाद के एक शराब ठेकेदार और एक बड़े शराब समूह से जुड़े राहुल जायसवाल ने मीडिया में बयान दिया कि अपने सामाजिक दायित्व की पूर्ति के उद्देश्य शराब कारोबारी दुकान नहीं खोलेंगे क्योंकि इससे कोरोना का प्रकोप बढ़ सकता है और ठेकेदार भी समाज के अंग हैं। इसके अलावा राहुल जायसवाल ने सरकार पर आरोप लगाया कि सरकार ने राजपत्र से परे जाकर शराब दुकानों के ठेके जबरदस्ती उठवाएं हैं। शराब ठेकेदारों का कहना है कि यदि शासन उन्हें 2019 -20 की कीमत पर ही दुकान चलाने देता है तो वे उसे तुरंत चलाने को तैयार हैं। या फिर दूसरा रास्ता यह है कि जितनी दुकान में बिक्री हो, सरकार उतने की ही ड्यूटी फीस वसूले। इन दोनों शर्तों पर शराब दुकान खोलने को राजी शराब ठेकदारों के सामाजिक दायित्व का बोध लापता हो गया। सोशल डिस्टेंस, मजदूरों की समस्या और शराब परिवहन की समस्या शर्तों को मानते ही हवा में विलीन। शराब ठेकेदारों ने सरकार के साथ मीटिंग में कहा कि शासन ने 2020-21 में जिस राजपत्र के आधार पर दुकानें दी थी वह शर्तें आज लागू नहीं हो सकती हैं। लिहाजा दुकानें नहीं चलाएंगे या फिर अदालत में जाएंगे। सरकार ने इसकी तैयारी को देखते हुए खुद भी अदालत में केविएट दायर कर दी है।


अगर शराब ठेकेदार 2019- 20 के राजपत्र के कानूनी आधारों पर दुकान चलाने को तैयार हैं तो क्या यह 2020-21 की कानूनी शर्तों का उल्लंघन नहीं होगा। क्या ठेकेदारों को फायदा देने वाले नियम शर्तों के उल्लंघन में नहीं आएंगे? और शराब से सरकार की कमाई के मामले में तय शर्तें उल्लघंन के दायरे में आ जाएंगी? क्या ठेकेदारों के पास कुछ सवालों के जवाब हैं। जैसे, शराब ठेकेदारों ने लाक डाउन के दौर में तस्करी से शराब दो या तीन गुने दामों पर लोगों को नहीं बेची? दिल्ली व छत्तीसगढ़ के आज के टीवी फुटेज को देखकर अनुमान लगाया जा सकता है कि मध्य प्रदेश में किस स्तर की कालाबाजारी करके करोड़ों रुपए शराब ठेकेदारों ने लॉक डाउन के दौर में कमाए होंगे। एक शराब कंपनी ने तो सैनिटाइजर भी शराब के ब्रांड के नाम पर इस कारण रखा कि प्लेन मदिरा के नाम पर बेचकर जनता का हाथ और जेब दोनों साफ किए जाएं। शराब ठेकेदार की क्या यह जिम्मेदारी नहीं है कि वे शासकीय राजस्व के लिए सिर्फ एक साल दे दें। यदि उन्हें सामाजिक सरोकारों की इतनी ही चिंता है तो। सरकार को इस पैसे से करोना और उससे उपजी समस्याओं का समाधान करने में मदद मिलेगी।


इस भारी विपदा के दौर में जब सरकार आर्थिक संकट का सामना कर रही है, तब अपने सामाजिक सरोकारों का दावा करने वाले शराब ठेकेदार हम दुकान नहीं चलाएंगे का नारा क्यों दे रहे हैं। इससे किस सामाजिक दायित्व की पूर्ति मध्यप्रदेश के ठेकेदार कर रहे हैं? क्या यह सही नहीं है कि ठेकेदार शासन पर समाज व करोना के नाम पर दबाव डालकर ज्यादा पैसा कमाने की चाहत दिखा रहे हैं। पता लगाना चाहिए कि 11 हजार करोड़ का राजस्व देने वाले शराब ठेकेदार और डिस्टलरों ने करोना के लिए सीएम रिलीफ फंड में कुल कितनी राशि दी है? क्या दी गई कुल राशि एक ठेकेदार या डिस्टलरी वाले अपने बच्चों की शादी में नहीं खर्च कर देता है। इसी पैसे से वो अपनी शान भी बताता है। क्या ठेकेदारों से कोर्ट उनकी सामाजिक उपयोगिता पर सवाल नहीं खड़ा करेगा? एक ठेकेदार एक जगह से शराब बेचने का लाइसेंस प्राप्त करता है और कम से कम 20 जगह भेजता है? यह किस कानूनी राज्य पत्र अथवा शर्तों में लिखा होता है? यह अनुबंध अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए कौन तोड़ रहा है? शराब ठेकेदार राजपत्र ,कोर्ट व वकील के माध्यम से सामाजिक दायित्व के नाम पर अपने व्यक्तिगत खजाने को भरने की नीयत दिखाने के अलावा और कुछ नहीं कर रहे हैं।


मुझे लगता है कोई भी व्यक्ति शराब ठेकेदारों की नैतिकता विषय पर लाइन का निबंध भी नहीं लिख सकता। इनकम टैक्स की रेड में करोड़ों रुपए सरेंडर करने वाले ठेकेदार पिछले दो महीने से न कालाबाजारी से चूक रहे हैं और न शासन को ब्लैकमेल करने से बाज आ रहे हैं। ठेकेदार सैनिटाइजर से भी लाभ कमाते हैं शराब से भी लाभ कमाते हैं और अब करोना के नाम पर भी शासन को इस विकट परिस्थिति में पैसा न देकरअपने लाभ का गुणा भाग करने में इस तरह जुटे हुए हैं जैसे साठ के दशक में ग्रामीण पृष्ठभूमि की किसी फिल्म में किसी लाला का किरदार हुआ करता था। ठेकेदार अगर कोर्ट में गए भी तो उच्च न्यायालय इन ठेकेदारों से यह जरूर पूछेगा की कोरोना पर आपका सामाजिक योगदान क्या है? सरकार के राजस्व में जब सरकार संकट में थी आपने क्या सहयोग किया? संभव है कि उच्च न्यायालय इन ठेकेदारों को दुकान चलाने का मौका दें और अगर ऐसा ठेकेदार नहीं करते हैं तब अदालत के निर्देश पर शासन प्रदेश के सभी दुकानों को फिर से नीलाम करेगा। जाहिर है इसका खर्चा भी सरकार इन सामाजिक प्रतिष्ठित लोगों से ही एक साल के अंदर वसूल कर लेगी। शराब ठेकेदारों के लिए कोरोनावायरस भी शराब की तरह एक केवल और केवल एक प्रोडक्ट है। जिससे वह सिर्फ पैसा ही कमा सकते हैं। अब सरकार का रूख इस बात को तय करेगा कि मोती महल, वल्लभ भवन और अदालत में इन शराब ठेकेदारो का कौन सा चरित्र सामने आता है? सामाजिक या फिर निरा व्यवसायिक?


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