पीएम मोदी-जिनपिंग की बैठक के लिए तैयार हुआ महाबलीपुरम, दोनों नेताओं के बीच होगी द्विपक्षीय बैठकें



कांचीपुरम। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच अगले हफ्ते (ममलापुरम) महाबलीपुरम में दूसरी अनौपचारिक बैठक होने वाली है। ममलापुरम का चीन से करीब 2000 साल पुराना संबंध है। इस वजह से इस बैठक को ऐतिहासिक बल मिलने की संभावना जताई जा रही है। जानकारी के मुताबिक, जिनपिंग शुक्रवार को 1.30 बजे दोपहर चेन्नई पहुंचेंगे। वे यहां करीब 24 घंटे रहेंगे


मोदी और जिनपिंग ममलापुरम के तीन प्रसिद्ध स्मारकों का दौरा करेंगे। करीब एक घंटे तक सांस्कृतिक कार्यक्रम में शामिल होंगे। दोनों नेताओं के बीच द्विपक्षीय बैठकें भी होंगी।




कार्यक्रम: अर्जुन की तपस्या, पंच रथ और शोर मंदिर के दर्शन और सांस्कृतिक कार्यक्रम में शामिल होंगे इसके बाद मोदी जिनपिंग के लिए डिनर का आयोजन करेंगे, फिर जिनपिंग होटल लौट जाएंगे अगले दिन बंगाल की खाड़ी के किनारे स्थित पांच सितारा होटल में दोनों नेताओं के बीच अनौपचारिक बैठक होगी इसके बाद इसी स्थल पर प्रतिनिध स्तर की औपचारिक बातचीत होगी इसके बाद जिनपिंग के एयरपोर्ट जाने से पहले मोदी इसी जगह चीनी राष्ट्रपति के साथ लंच करेंगे चीनी राष्ट्रपति 11-12 अक्टूबर को भारत आने वाले हैं: शक्तिशाली पल्लव वंश का लंबे समय तक ममलापुरम बंदरगाह रहा है। उनका चीन के साथ संबंध भी रहा। उन्होंने अपने शासनकाल के दौरान वहीं दूत भी भेजे थे। मोदी और जिनपिंग के बीच मुलाकात की तैयारी जोर-शोर से चल रही है। चीनी राष्ट्रपति 11-12 अक्टूबर को बैठक के लिए भारत आने वाले हैं। ममल्लापुरम और कांचीपुरम के चीन के साथ संबंध रहे: जाने-माने पुरातत्त्वविद् एस राजावेलु ने बताया कि तमिलनाडु के पूर्वी तट पर मिले पहली और दूसरी सदी के सेलाडॉन (मिट्टी के बर्तन) हमें इस इलाके में चीनी गतिविधियों के बारे में बताते हैं। इस इलाके में हमें चीन के सिक्के भी मिले हैं। इससे पता चलता है कि चीन के साथ हमारे व्यापारिक संबंध भी थे। उन्होंने कहा कि इस तरह के अन्य पुरातात्विक साक्ष्यों से पता चलता है कि ममल्लापुरम और कांचीपुरम के भी चीन के साथ संबंध रहे हैं। कांचीपुरम उस समय बौद्ध धर्म का केंद्र माना जाता था: पल्लव शासनकाल के दौरान सातवीं शताब्दी में चीनी यात्री ह्वेनसांग भी कांचीपुरम आए थे। बौद्ध धर्म के बारे में अधिक समझने और अपने धर्म के मूल ग्रंथों को प्राप्त करने के लिए उत्सुक, ह्वेन त्सांग ने कांचीपुरम का दौरा किया। कांचीपुरम उस समय बौद्ध धर्म का केंद्र माना जाता था।

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