हे राम! ऐसी सियासत से बचाओ



  स्वामी विवेकानंद ने कभी कामना की थी कि ईश्वर उन्हें मनुष्य बना दें। वह व्यक्तित्व,जिसे ज्ञान और संस्कार के लिहाज से जीते-जी ईश्वर के समतुल्य मान लिया गया था, वह तक इस अधूरेपन के भाव के साथ जी रहा था कि ईश्वरत्व पाना तो दूर, वह मनुष्यत्व तक नहीं पा सका है। और अब देखिए कि उन लोगों के बीच मर्यादा पुरूषोत्तम बनने की होड़ मची है, जो किसी भी दृष्टि से देवत्व पाना तो दूर, 'मयार्दा' या 'उत्तम' के लिहाज से भी दशमलव एक प्रतिशत की मात्रा में भी फिट नहीं बैठते हैं। लेकिन भाई लोगों का कोई क्या करे! चमचत्व का मामला है। इसलिए कांग्रेस के रणनीतिकारों ने कमलनाथ को मर्यादा पुरुषोत्तम राम के समकक्ष लाकर बैठा दिया। इसे घनघोर दिमागिया खालीपन के अलावा और कुछ ठहराया ही नहीं जा सकता है


कुछ दिन पहले तक यही लोग कमलनाथ को हनुमान भक्त बता रहे थे। अब इतनी जल्दी ये धार्मिक प्रमोशन कर दिया गया कि हनुमान के भक्त अपने आराध्य को सुपरसीड कर खुद ही मर्यादा पुरूषोत्तम बन बैठे। अब तो यही कसर रह गयी है कि नाथ के नाम से 'असली मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम' नाम का मंदिर तान दिया जाए और उसकी दीवार पर 'मिलते-जुलते नाम वालों से सावधान' या 'नोट-हमारी कोई ब्रांच नहीं है' लिख दिया जाए।


सिख-विरोधी दंगों में शामिल होने का आरोप, छिंदवाड़ा की शिकारपुर कोठी के सच्चे झूठे किस्से, हजारों लोगों की जबरिया नसबंदी कर देने वाले का पूजने की हद तक सम्मान, इमरजेंसी जैसे काले दिनों में काली करतूतों को प्रत्यक्ष समर्थन देने जैसे दृष्टांत, यदि इन सबके बाद भी आप खुद को मर्यादा पुरुषोत्तम राम के चरणों की धूल के बराबर भी मानते हैं तो धिक्कार है ऐसी सोच पर। यूं भी आज की राजनीति में मर्यादा की खोज तो चील के घोसले में मांस तलाशने जैसी बेवकूफी हो चुकी है। मामला फिर चाहे कांग्रेस के नेताओं का हो या फिर भाजपा या अन्य दलों के नेताओं का। सत्ता की दौड़ और होड़ में साम,दाम,दंड, भेद जैसी चालबाजियों में मर्यादा शब्द का कोई अस्तित्व ही नहीं है। इसलिए बात अकेले कमलनाथ की ही नहीं है।


राम के नाम पर राजनीति चमकाने वाली भाजपा में भी यदि कोई खुद को ईश्वरत्व के करीब बताएगा तो उसकी भी ऐसी ही निंदा करना चाहिए। वर्तमान सियासी माहौल में मर्यादा की कोई गुंजाईश ही नहीं रह गयी है। हां, कांग्रेस की तरफ से ऐसे आचरण बहुत ज्यादा बुरा लगना स्वाभाविक है। यह उस दल की बात है, जिसने भगवान राम को अदालत में काल्पनिक चरित्र बताया था। महात्मा गांधी 'हे राम' कहते हुए प्राण त्यागते हैं और उन्हें अपनी व्यक्तिगत प्रापर्टी मानने वाली पार्टी की सरकार अदालत में हलफनाम देकर राम को काल्पनिक मानती है। जिसने रामसेतु को काल्पनिक बताकर उसके नाम पर समुद्र में मौजूद स्ट्रक्चर को तोड़ने की वकालत की थी।


जो पार्टी बरसों-बरस जालीदार टोपियों या दमघोंटू काले कपड़ों के पीछे इस तथ्य के लिए अपना मुंह छिपाती रही कि उसके नेता राजीव गांधी ने ही अयोध्या में राम जन्मभूमि का ताला खुलवाया था। बौखलाहट में मूर्खता हो जाना स्वाभाविक है। मध्यप्रदेश में फिलहाल कांग्रेस भी बौखलाहट से भरी है। उसके नेता दिनेश गुर्जर द्वारा शिवराज सिंह चौहान को 'भूखा-नंगा' बोलने पर बीजेपी ने 'मैं भी शिवराज' अभियान चला दिया। कांग्रेस को लेने के देने पड़ गए। और कुछ नहीं सूझा तो यह दल 'मैं भी मयार्दा पुरुषोत्तम' की महा-भूल कर बैठा। भूल तो भूल, यह तो वह काम है, जो राम के अरबों उपासकों को आहत करेगा। यहां एक तथ्य भी बरसात के बाद की धूप की तरह साफ है। वह यह कि इस दौर में कोई भी राम तो दूर, मर्यादा पुरुषोत्तम तक नहीं बन सकता लेकिन यही लोकतंत्र की वह खूबसूरती है, जिसमें कांग्रेस के शब्दों में किसी भूखे-नंगे परिवार या मर्यादित शब्दों में किसी परिवार से भी निकलकर कोई किसी प्रदेश का मुख्यमंत्री या देश का प्रधानमंत्री बन सकता है। कांग्रेस ने जो किया, वह उसके लिए ही तकलीफ का सबब बनने जा रहा है। लेकिन उनकी तकलीफ का क्या, जो यह देख कर सन्न रह गए हैं कि किस तरह सियासी लाभ के लिए आस्थाओं को तोड़-मरोड़कर कुचलने का प्रयास किया गया है। है राम! ऐसी सियासत से बचाओ।


प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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