सिंधिया के गढ़ में स्वास्थ्य और गृहमंत्री मिश्रा ने संभाला मोर्चा, भाजपा के असंतुष्ट नेताओं को मनाने ग्वालियर पहुंचे नरोत्तम



ग्वालियर। प्रदेश में प्रस्तावित 24 विधानसभा सीटों पर उपचुनावों के लिए लॉकडाउन के बीच सियासत अनलॉक हो गई है। बयानबाजी के बाद अब मैदानी जंग की तैयारी होने लगी है। ज्योतिरादित्य सिंधिया के भाजपा ज्वॉइन करने के बाद और 24 में से 16 सीटें ग्वालियर चंबल से होने के कारण सरकार और विपक्ष दोनों की निगाहें इसी अंचल पर टिकी हैं। लेकिन सिंधिया के गढ़ में हमेशा सिंधिया को घेरने वालों को अब उनके साथ काम करने के लिए तैयार करना बड़ी चुनौती है


बीजेपी ने इसकी जिम्मेदारी अपने संकटमोचक यानी नरोत्तम मिश्रा को सौंपी है। मिश्रा ग्वालियर दौरे पर है उन्होंने वहां भाजपा के वरिष्ठ नेताओं से वन-टू वन चर्चा की और रुठे हुए नेताओं को मनाने का प्रयास किया। ग्वालियर चंबल अंचल को जहां ज्योतिरादित्य सिंधिया का गढ़ कहा जाता है, वहीं ये भारतीय जनता पार्टी को गढ़ने वाली राजमाता विजया राजे सिंधिया यानि ज्योतिरादित्य सिंधिया की दादी की कर्मभूमि भी है।


प्रदेश से लेकर देश तक की राजनीति कहीं ना कहीं ग्वालियर से प्रभावित होती ही है। चाहें सत्ता के केंद्र में बीजेपी हो या कांग्रेस, ग्वालियर उसका बड़ा केंद्र रहता है। इस बार भी जब कांग्रेस की सरकार प्रदेश से विदा हुई तो उसमें भी ग्वालियर चंबल ने बड़ी भूमिका निभाई। गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा रविवार देर शाम ग्वालियर पहुंचे।


ग्वालियर में वे पूर्व मंत्री और पूर्व सांसद अनूप मिश्रा से आधा घंटे चर्चा करने के बाद 7:45 बजे वे पूर्व मंत्री नारायण सिंह कुशवाह के घर पहुंचे और उनसे चर्चा की। यहां आधा घंटे चर्चा के बाद मिश्रा 8:15 बजे पूर्व मंत्री जयभान सिंह पवैया से उनके निवास पर पहुंचे। यहां भी आधे घंटे चर्चा करने के बाद वे पूर्व मंत्री माया सिंह के निवास पर चर्चा करने पहुंचे।


आधा घंटा माया सिंह से चर्चा करने के बाद मंत्री मिश्रा 9:15 बजे संघ कार्यालय पहुंचे उसके बाद बड़े भाई आनंद मिश्रा से मिलने पहुंचे। कांग्रेस छोड़कर 22 विधायकों के लाव लश्कर के साथ 'महाराज' गए तो उसमें से 16 ग्वालियर चंबल के ही थे। अब इन सबके भाजपा में शामिल हो जाने के बाद भाजपा के पुराने और स्थापित नेताओं में बेचैनी है। उन्हें अपने राजनैतिक भविष्य पर ग्रहण लगता दिखाई दे रहा है, उनके नाराज और रूठने की खबरें सरकार और संगठन तक पहुंच रही हैं । उपचुनाव से पहले बीजेपी, पार्टी के पुराने नेताओं को भरोसे में लेना चाहती है, जिससे चुनावों में उनका बेहतर उपयोग कर सकें और उनके अनुभव का लाभ लेकर उपचुनाव में अधिक सीटें जीतकर सरकार में बने रहें।


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