ग्वालियर-चंबल संभाग में अपने पैरों में कुल्हाड़ी मारने की तैयारी में कांग्रेस



तो फिर बगावत करने वालों को गद्धार की संज्ञा कैसे दे पाएंगे कांग्रेस के नेता भोपाल। प्रदेश में कमलनाथ सरकार को गिराने का बड़ा कारण बने सिंधिया समर्थक विधायकों को उपचुनावों में पटकनी देने की कांग्रेस की योजनाओं पर पार्टी के ही कुछ बड़े नेता पानी फेरने की तैयारी में हैं। सरकार गिरने के बाद पूर्व मुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेसाध्यक्ष कमलनाथ कोशिश कर रहे हैं कि चौबीस विधानसभा क्षेत्रों में पार्टी पूरी ताकत झौंक कर प्रदेश की राजनीति में आए बदलाव के पांसे को पलट दें। कोरोना महामारी के कारण अब यह संभावना लगभग नहीं है कि जून में विधानसभा की रिक्त सीटों पर उपचुनाव होंगे। अब उपचुनाव सिंतम्बर-अक्टूबर से पहले होने की संभावना नहीं है। लिहाजा, कांग्रेस के पास तैयारी करने के लिए पर्याप्त समय है


इन उपचुनावों को जीत कर बाजी पलटने के लिए कांग्रेस ने अभी से तैयारी शुरू कर दी है। इन सीटों पर उपचुनाव के लिए उम्मीदवारों की खोज भी उसके लिए एक कठिन काम होगा। लिहाजा, उम्मीदवारों को चयन को लेकर कांग्रेस अभी से सक्रिय है। सबसे ज्यादा उपचुनाव ग्वालियर चंबल संभाग की सीटों पर होना है। सिंधिया समर्थक 16 विधायकों के इस्तीफे और एक विधायक के निधन के कारण इस अंचल में सत्रह सीटों पर उपचुनाव होना है। कांग्रेस ने इस सीटों पर जीतने लायक उम्मीदवारों की खोजबीन शुरू कर दी है। इसी सिलसिले में एक नाम सामने आया है पिछला विधानसभा चुनाव भाजपा के टिकट पर भिंड से हारे चौधरी राकेश सिंह का। कांग्रेस के कुछ बड़े नेता कोशिश कर रहे हैं कि चौधरी राकेश सिंह को मेहगांव विधानसभा सीट से उम्मीदवार बना दिया जाए।


राकेश सिंह की वापसी हालांकि पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान ज्योतिरादित्य सिंधिया ने ही शिवपुरी में कराई थी। उल्लेखनीय है कि 11 जुलाई 2013 को विधानसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान कांग्रेस विधायक दल के उपनेता रहते हुए चौधरी राकेश सिंह ने पाला बदल लिया था। और उसी दिन कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में शामिल हो गए थे। 2013 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने चौधरी राकेश सिंह को चुनाव लड़ाने की बजाय उनके भाई मुकेश चतुर्वेदी को मैदान में उतारा था। मुकेश ने यहां से चुनाव जीत लिया था लेकिन राकेश सिंह को भाजपा ने पिछले पांच सालों में कहीं एडजस्ट नहीं किया। 2018 में मुकेश का टिकट काट कर भिंड से राकेश सिंह को जरूर चुनाव लड़वाया गया। लेकिन वे बुरी तरह चुनाव हारे। तबसे वे कांग्रेस में वापसी के प्रयास कर रहे थे।


लेकिन जुलाई, 13 में नेता प्रतिपक्ष रहे अजय सिंह के विरोध के चलते चौधरी राकेश सिंह की कांग्रेस में वापसी नहीं हो पा रही थी। सूत्रों का कहना है कि चौधरी राकेश सिंह की कांग्रेस के दो बड़े नेताओं से निकटता रही है। इनमें से एक पूर्व प्रदेश कांग्रेसाध्यक्ष सुरेश पचौरी हैं और दूसरे पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह। सुरेश पचौरी कमलनाथ सरकार के दौरान भी लगभग हाशिए पर ही रहे और अभी भी संगठन में वे एक तरह से किनारे पर ही हैं। लेकिन दिग्विजय सिंह के बारे में माना जाता है कि मध्यप्रदेश में सरकार के दौरान और अभी भी उन्हें कमलनाथ का आंख और कान माना जा सकता है। लिहाजा माना जा रहा है कि दिग्विजय सिंह इस बार चौधरी राकेश सिंह के तारणहार बनते नजर आ रहे हैं।


मेहगांव में इस बार कांग्रेस छोड़कर आएं ओपीएस भदौरिया भाजपा से उम्मीदवार होंगे। पिछला चुनाव उन्होंने भाजपा के राकेश शुक्ला को हराया था। लिहाजा इस सीट का गणित बताता है कि जातिवाद से प्रभावित इस अंचल में मेहगांव सीट पर ब्राहम्ण और ठाकुर दोनों प्रभावी जातियां हैं। भदौरिया भाजपा से उम्मीदवार होंगे तो जाहिर है कांग्रेस के लिए ब्राह्मण उम्मीदवार उतारना ही मुफीद होगा। लेकिन चौधरी राकेश सिंह को यदि उम्मीदवार बनाया गया तो कांग्रेस किस मुंह से सिंधिया के साथ गए अपने पुराने विधायकों को गद्धार के संबोधन से लताड़ लगा पाएगी। आखिर चौधरी राकेश सिंह ने तो ऐसे समय पर पार्टी को चोट दी थी जब नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस शिवराज सरकार को विधानसभा में उसके किए धरों पर घेर रही थी। जाहिर है, यदि राकेश सिंह मेहगांव से कांग्रेस के उम्मीदवार बनते हैं तो सिंधिया और उनके समर्थकों के दलबदल को गद्धारी से परिभाषित करने में कांग्रेस को उलटी मुंह की खाना पड़ सकती है। ;


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