ये हवा और पानी का संगम



तो ये एक गहरा और दिलचस्प मामला है। भोपाल शहर में कुछ स्थानों पर कॉलोनियों में जमीन के भीतर से आ रही आवाजों का सच सामने आ गया है। जानकार कह रहे हैं कि यह और कुछ नहीं, बल्कि पानी और हवा की करतूत है। बारिश ज्यादा हुई तो आमतौर से ज्यादा पानी जमीन के अंदर  पहुंच गया। वहां यह हवा से मिलकर ऐसी आवाजें निकाल रहा है, गोया कि इलाके में भूकम्प आने वाला हो। इस राज्य की जनता खुशकिस्मत है। जमीन के भीतर और बाहर, दोनों ही जगह नकली भूकम्प के असली लक्षण देख रही है। बीते विधानसभा चुनाव में भाजपा का पानी उतर गया। इधर-उधर से मिले समर्थन की बदौलत कांगे्रस पानीदार होकर सत्ता पर काबिज हो गयी


अब हवा का तो दस्तूर है कि हर हलके को उड़ा ले जाए। तो हलकापन करने पर आमादा शिवराज सिंह चौहान इसके पंख पर सवार होकर उड़ रहे हैं। किसी समय कमलनाथ ने जो ट्वीट चौहान की सरकार के खिलाफ किया था, पूर्व मुख्यमंत्री अब उसी ट्वीट में तुकबंदी का तड़का लगाकर उसे ट्विटर पर परोस चुके हैं। सयाने कह गये हैं कि नकल में भी अकल की जरूरत होती है। चौहान ने अकल लगायी होती तो ऐसी भौंडी नकल नहीं करते।


उन्हें सोचना चाहिए था कि ट्वीट को दोहराकर वह अपने शासनकाल की उन तमाम विफलताओं की याद एक बार फिर सार्वजनिक रूप से ताजा कर गये हैं, जिन विफलताओं ने विधानसभा चुनाव में अंतत: उन्हें किनारे पर खड़ा होकर तमाशा देखने पर मजबूर कर दिया था। तेज हवा में सूखी रेत उड़कर कहर ढा जाती है। यह लोगों की आंख में चली जाए तो कुछ देर के लिए सब-कुछ दिखना बंद हो जाता है। फिर यहां तो मामला उस रेत का है, जो पूरे तीन घंटे तक सुखायी गयी। भ्रष्टाचार की आग पर रखकर। वह भी होशंगाबाद कलेक्टर के कार्यालय में। आग कलेक्टर शीलेंद्र सिंह ने लगायी या एसडीएम रवीश श्रीवास्तव ने, मैं नहीं जानता।


हां, इतना पता है कि तीन घंटे बाद जब चैम्बर का दरवाजा खुला तो रेत ने आरोप-प्रत्यारोप की हवा के असर से ऐसा कहर बरपाया कि भोपाल में बैठे शासक वर्ग तक को सब-कुछ दिखना बंद हो गया। सोचिए कि सीताशरण शर्मा यदि सत्तारूढ़ दल में होते तो इस रेत की उड़ान का वेग और कितना अधिक हो जाता। फिलहाल अब रेत जर्रा-जर्रा होकर वल्लभ भवन की फाइलों में कैद है। जहां तक हवा का सवाल है तो वह बाहर बह रही है और कलेक्टर तथा एसडीएम के भीतर भी बंद हो गयी है। क्योंकि इस मामले की गाज इन दो में से किसी एक, या फिर दोनों पर ही गिरना तय है। गुलजार ने लिखा था, 'हवाओं पे लिख दो, हवाओं के नाम, हम अनजान परदेसियों का सलाम।


' इंदौर में कल दो परदेसियों छिंदवाड़ा फेम कमलनाथ और ग्वालियर मुकाम वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया ने जमकर हवाओं पे हवाओं के नाम अपना सलाम लिखा। वह भी अलग-अलग। दोनों अपने-अपने काम से वहां पहुंचे और राजनीतिक अदावत का पूरा सम्मान करते हुए एक-दूसरे से मिलने की जरूरत तक नहीं समझी। यानी, दो दिग्गज कांग्रेसियों ने एक ही शैली में एक-दूसरे का पानी उतार दिया। मामला बहुत बड़े कद वालों का है, लिहाजा पानी भी जमकर ही उतरा होगा। जो इंदौर की जमीन के भीतर जाकर वहां भी भूकम्प जैसी आवाज निकालने लगा है। मानसून की प्रदेश से विदाई का समय आज नहीं तो कल आने ही वाला है। लेकिन सियासी मूसलाधार से इसकी जमीन के भीतर इतना पानी पहुंच चुका है कि वह वहां मौजूद अटकलों वाली हवा से मिलकर अजीबो-गरीब आवाजें पैदा करता रहेगा। पेट के भीतर पानी और हवा से होने वाली आवाजों का इलाज मौजूद है। लेकिन जमीन के अंदर के लिए ऐसा कोई इलाज उपलब्ध नहीं है। यह इस तरह के सारे घटनाक्रम की खासियत है। वैसे है यह सब कुल मिलाकर निराशाजनक।

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प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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