ये बेचारी विधवा सीटें



बेहद मोटी औरत के ठीक आगे लाइन में खड़ा दुबला-पतला शख्स पलटा। बोला, 'देवी जी, कृपया धक्का मत दीजिए। आप लगातार ऐसा कर रही हैं।' महिला बोली, 'भैया, क्या चाहते हो? अब क्या सांस भी न लू मैं !' तो आज की मोटी-मोटी बात उन छोटी-छोटी विवशताओं को समर्पित, जिनके चलते मध्यप्रदेश में कोरोना से नेता और नेतागिरी, दोनों बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं। कांग्रेस विधायक कुणाल चौधरी तो पीपीई किट में खुद को लपेटकर राज्यसभा के लिए मतदान कर आए, लेकिन उन भाईयों का क्या, जिन्हें अब वोट लेने जाना है। यदि वे मतदाता के बीच पीपीई किट ओढ़कर पहुंच गए तो यह सोशल डिस्टेंसिंग राज्य विधानसभा से उनकी दूरी का रास्ता खोल देगी


और यदि किट नहीं पहनी तो उनके लिए इहलोक से परलोक के बीच का रास्ता खुलने की आशंका का खतरा सामने खड़ा है। विधायक ओमप्रकाश सकलेचा दक्षिणपंथी कही जाने वाली भाजपा में हैं। लेकिन कोरोना का मामला आया तो वाम अंग यानी पत्नी की तरफ से। अर्द्धांगिनी की जांच कराई। वह कोरोना से प्रभावित मिलीं। लेकिन सकलेचा तब तक बीजेपी के कई कार्यक्रमों में शामिल हो चुके थे। तब तक न तो उन्हें पत्नी के पाजिटिव होने का पता था न खुद में कोई लक्षण थे। लिहाजा, उनका ऐसा करना गलत भी नहीं था। लेकिन खा गए गच्चा। खुद कोरोना से संक्रमित निकले हैं।


अब उन भाजपाइयों को आशंका की खट्टी डकारें परेशान कर रही हैं, जिन्होंने राज्यसभा के मतदान से एक रात पहले सखलेचा के साथ बैठकर भोजन सूता था और बैठकें भी की थीं। एक अखबार ने रविवार को बाकायदा एक से ज्यादा फोटो छापकर बताया है कि कैसे नेतागण मास्क से परहेज कर अपनी और दूसरों की सेहत से खिलवाड़ कर रहे हैं। लेकिन नेता करें तो क्या करें? कदम में चमचे और सिर पर आका न दिखाई दे तो भाइयों को दिमागी कब्ज हो जाती है। जयकारे लगाती या अपने काम के लिए खींसे निपोरते हुए माला पहनाने वाली भीड़ न दिखे तो बेचारे राजनीतिक रूप से ढीले पड़ जाते हैं। लेकिन ये मुआ कोरोना है कि मानता नहीं।


जरा उनकी सोचो, जिन्हें चौबीस सीटों के उपचुनाव के लिए किस्मत आजमाना है। यही आलम रहा तो क्या मतदाता से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये वोट मांगेंगे! महामारी ने बैठे-ठाले उनके लिए 'एक आग का दरिया है और डूब के जाना है' वाली स्थिति पैदा कर दी है। और भी मुसीबत यह कि निगोड़ा कोरोना वो कलंक है, जो 'दाग अच्छे हैं' वाली बात से भी परे है। एक बार लगा, तो फिर अगले की हो गयी छह महीने-साल भर की छुट्टी। जहां जाओ, लोग बदली हुई निगाहों से देखेंगे। पास आना तो दूर, सामने पड़ने से भी कतराएंगे। बशीर बद्र को तो कोई काम है नहीं।


कलम उठायी और पेल गए, 'ये नए मिजाज का शहर है, जरा फासले से मिला करो' बेचारे नेता ऐसा कैसे कर सकते हैं। फासले का यह फलसफा उनकी तबियत से बिलकुल जुदा है। अरे! जो तबका अपना काम निकालने के लिए नागनाथ से लेकर सापनाथों तक को गले लगाने से न हिचकता हो, उसे कोरोना क्या खाक डरायेगा! लेकिन बेचारे फिलहाल डरे हुए दिख रहे हैं। सचमुच ये तो कलयुग का वह चरम है, जिससे निपटने कल्कि को चाहिए कि अपने सफेद घोड़े की जीन कसकर उस पर सवार हो जाएं। आखिर प्रदेश की दो दर्जन विधानसभा सीटों का मामला है। बेचारी, पंद्रह महीने में ही विधवा हो गयीं। अब जो वीर शिरोमणी उनके लिए स्वयंवर में हिस्सा लेना चाहते हैं, उन्हें कोविड-19 नामक दुष्ट परेशान कर रहा है। सत्ता सुख की अभिलाषा को सता रहा यह रोग भगवान करे कि खुद ही बीमार हो जाए। पूरे देश की ही तरह मध्यप्रदेश में भी जनता की मांग भले ही अनसुनी रहे, लेकिन इन दो दर्जन विधानसभा सीटों की मांग सूनी रहने का पाप यूं ही चलता रहा तो यकीन मानिए मेरा तो इंसानियत और ईश्वर, दोनों से यकीन उठ जाएगा।


प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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