यह बदलाव सिंधिया का



ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अब तक अपने आप को राजनीति का बड़ा उस्ताद तो साबित नहीं किया है। लेकिन कह सकते हैं फिलहाल उन्होंने मौका देख कर चौका मारा है। ट्विटर पर उनके स्टेटस को बदलाव को देखते हुए अब इतिहास का हिस्सा बन चुकी एक समय की लोकप्रिय साप्ताहिक पत्रिका 'रविवार' में एक लतीफा याद आ गया। लतीफा था, हॉलीवुड बेहद संभावनाओं वाली जगह है। वहां आप समुद्र किनारे रेत पर लेटकर सितारों को देख सकते हैं और जब चाहें, तब इसका ठीक उलटा भी कर सकते हैं। यहां गुलजार का लिखा एक गाना भी याद किया जा सकता है, 'जब तारे जमीं पर चलते हैं, आकाश जमीं हो जाता है। उस रात नहीं फिर घर जाता, वो चांद वहीं सो जाता है।' गोया कि सितारों पर चुटकुला भी बना है और उन्हें लेकर कमाल की कल्पना  भी हैं। तो फिलहाल जिस घटनाक्रम के हम गवाह बने हुए हैं, उसमें सितारों को किस रूप में देखा जाए? ज्योतिरादित्य सिंधिया यकीनन सितारा हैसियत वाले शख्स हैं। आला राजघरानों में उनके परिवार का गर्व से जिक्र किया जाता है। प्रदेश सरकार के मंत्री डॉ. गोविंद सिंह भी एक मौके पर सिंधिया को ग्वालियर स्टेट के 'महाराजा' कह चुके हैं। यह पड़ताल मत कीजिएगा कि सिंह ऐसा करते समय मजाक के मूड़ में थे या थे संजीदा


तो हुआ यह है कि कम से कम सोशल मीडिया पर सिंधिया ने अपनी सितारा हैसियत को नाराजगी की अमावस के हवाले कर दिया है। उनका स्टेटस अब कांग्रेस नेता वाली पहचान से विमुख दिखता है। वह खुद को मात्र जनेसवक और क्रिकेट का प्रेमी बता रहे हैं। सिंधिया घराने के भले ही अंग्रेजों से कितने भी मधुर संबंध क्यों न रहे हों, लेकिन आज खुद ज्योतिरादित्य स्टेटस बदलते समय अंग्रेजी को कोस रहे होंगे। वहां उन्हें अपने लिए पब्लिक सर्वेंट लिखना पड़ गया। सर्वेंट यानी नौकर। एक ऐसा ओहदा, शब्द, खयाल, गुस्ताखी, बदनुमा दाग आदि आदि, जो ज्योतिरादित्य सिंधिया की शान सहित सोच के भी पूरी तरह खिलाफ है। श्रीमंत सुनने के आदी हो चुके सिंधिया न किसी के नौकर हो सकते हैं और न ही किसी की नौकरी करना उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व का हिस्सा है। इस लोकतंत्र में मजबूरी जो न कराए वो कम है। गुना-शिवपुरी की जनता बीते लोकसभा चुनाव में बता चुकी है कि कैसे किसी सितारे की अकड़ को वह सितार के तार की तरह पल भर में तोड़ सकती है। ऐसे में समझदारी यही कहती है कि खुद को वह बता दिया जाए, जो जताने से परहेज करने के चलते ऐसी दुर्गत हो गयी। हां, क्रिकेट प्रेमी तो उन्हें यकीनन कहा जा सकता है। बात किसी क्रिकेट एसोसिएशन तक सीमित रखने की जुर्रत मत कीजिए।


मसला यह कि ज्योतिरादित्य बीते लम्बे समय से राजनीति की पिच पर सक्रिय हैं। यह बात और है कि छक्के-चौके वाला खेल वह अब तक नहीं दिखा सके हैं। गये विधानसभा चुनाव के ठीक बाद राहुल गांधी की गुगली ने उन्हें उलझा दिया और कालांतर में वह कमलनाथ-दिग्विजय सिंह की आक्रामक गेंदबाजी का सामना टुचुक-टुचुक खेलते हुए ही कर पा रहे हैं। इस खेल की दर्शक दीर्घा बहुत विस्तृत है। कई दर्शक मंत्रालय में बैठकर यह सब देख रहे हैं तो कई प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय में इसका नजारा कर रहे हैं। मौजूदा माहौल में कहा जा सकता है कि अधिकांश देखने वाले सिंधिया के क्लीन बोल्ड हो जाने की मिलीजुली आशंका तथा कामना से सराबोर हैं। लेकिन ज्योतिरादित्य आउट नहीं हो रहे हैं। यह भी नहीं कर रहे कि उनसे धुआंधार बल्लेबाजी की अपेक्षा करने वालों की ही मुराद पूरी कर दें। ऐसे में देखने वाली बात यह रहेगी कि सोमवार को सोशल मीडिया पर जड़ा गया यह शॉट किस गति को प्राप्त होगा। क्या गेंद सीधी बाउंड्रीलाइन के पार जाकर उनके खाते में छक्का दर्ज कर देगी? या मामला कैच आउट हो जाने वाला रहेगा? अंजाम खुदा जाने। लेकिन यदि कोई भी यह सोच रहा है कि इस तब्दीली के जरिये सिंधिया ने कांग्रेस को अलविदा कहने का मन बना लिया है तो वह गलत भी साबित हो सकता है।


फिर ये राजनीति है, कुछ भी संभव है। कहा ऐसा भी गया है कि 'रानी रूठेगी तो अपना ही सुहाग लेगी।' इसलिए रूठे हुए सिंधिया सुहाग खत्म करने का जोखिम नहीं लेंगे। वह कोशिश में हैं कि इस दबाव के जरिये अपनी खोयी हुई जमीन फिर हासिल कर सकें। उनके सामने चुनौतियां बहुत हैं। उत्तरप्रदेश में पार्टी का चुनाव प्रभारी होने के बावजूद लोकसभा के महासमर में सिंधिया वहां कोई कमाल नहीं दिखा सके। उलटे गुना-शिवपुरी की सिंधिया परिवार के लिए अजेय और परम्परागत सीट पर वह खुद खेत रहे। लाख दबाव बनाने के बावजूद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष का पद वह नहीं पा सके। इस सबसे उनकी नेतृत्व क्षमता पर अनेक सवालिया निशान लग गये हैं। ऐसे निशान जो सीधे-सीधे उस कमजोरी का प्रतीक हैं, जो किसी शक्तिशाली जिम्मेदारी से दूर रखने का स्वयमेव कारण बन जाते हैं। लेकिन जिन हालात में कांग्रेस की कमलनाथ सरकार चल रही है, सिंधिया सौ फीसदी तुरूप का पत्ता तो हैं ही। दहेज लोभी घाघ वर पक्ष का एक जोरदार गुण होता है। वह रिश्ता तय होने के बाद तरकीब से बेटे की कीमत बढ़ाता है। लड़की के पिता से कहता है, 'यूं तो आप जो देंगे, वह ले लूंगा, लेकिन वो क्या है ना कि अब भी बेटे के लिए लोग आपके मुकाबले दुगना पैसा देने के लिए तैयार हैं।


' होता फिर ऐसा है कि यह तरकीब काम कर जाती है। सिंधिया घाघ तो नहीं हैं, लेकिन महाराष्ट्र और कर्नाटक के सियासी घटनाक्रमों के बीच स्टेटस बदलकर उन्होंने यही तरकीब आजमाने की कोशिश की है। प्रयास है कि पार्टी मध्यप्रदेश में अपनी सरकार के लिए इसे संकट का संकेत मानकर कुछ झुक जाए। तो क्या मान लें कि अमित शाह ने सिंधिया के कंधे पर वह बंदूक रख दी है, जिसका निशाना सीधे मुख्यमंत्री निवास की ओर है? वैसे यहां घटपर्णी (अंग्रेजी नाम पिचर प्लांट) नामक पौधे का जिक्र जरूरी है। यह पौधा छोटे-छोटे कीट-पतंगों के लिए आकर्षक द्रव्य से भरा होता है। जैसे ही वे द्रव्य की लालच में उसके भीतर जाते हैं, पौधा उन्हें अपना निवाला बना लेता है। सियासत में भी ऐसे पौधे होते हैं। लेकिन क्योंकि ज्योतिरादित्य, सिंधिया हैं इसलिए भाजपा में उनका हाल ऐसा नहीं होगा। वो दादी और बुआओं की पार्टी है। एक तथ्य यह है कि दादी यानि अम्मा महाराज कांग्रेस से शुरू करके भाजपा की फाउंडर बनी। ज्योतिरादित्य के पिताजी ने जनसंघ से शुरूआत कर आखिरी तक कांग्रेस में राजनीति की तो होने को हो सकता है कांग्रेस से राजनीति शुरू करने वाले ज्योतिरादित्य का प्रारब्ध कुछ और हो। अब इससे ज्यादा और व्याख्या करने की कोई जरूरत शेष नहीं रह जाती है। फिलहाल तो तारे जमीं पर चल रहे हैं, आकाश जमीं हो गया दिखता है। देखना यह है कि चांद घर जाएगा या वहीं सो जाएगा।

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प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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