याददाश्त से उपजता दर्द



'दीवार' फिल्म का  वह दृश्य और संवाद तो याद होगा। 'भाई! तुम साइन करोगे या नहीं!!' वाला। देश में सेक्यूलर्स के नाम पर मौजूद ढोंगियों और दोमुंहों की जमात ऋचा भारती से पूछ रही है। 'ऋचा! तुम पांच कुरान वितरित करोगी या नहीं!!' ऋचा अदालत की इस व्यवस्था से नाखुश है। उसके समर्थन में भी स्वर उठने लगे हैं। मामला यह कि झारखंड की इस युवती ने फेसबुक पर एक आपत्तिजनक पोस्ट को साझा कर दिया। उसे दो दिन गिरफ्तार रखा गया। फिर कोर्ट ने इस शर्त पर उसे जमानत दे दी कि वह कुरान की पांच प्रतियां बतायी गयी जगहों पर वितरित करे। अदालत के फैसले पर सवाल उठाने वाले हम कोई नहीं हैं। ऐसा होना भी नहीं चाहिए। लेकिन याददाश्त तो दिमाग पर दस्तक दे रही है


याद दिला रही है कि इस लोकतंत्र में किसी भी अदालत ने सफेदपोश पेंटर मकबूल फिदा हुसैन को गीता या रामायण सहित हिंदुओं की किसी धार्मिक पुस्तक को वितरित करने का आदेश कभी नहीं दिया था। पूर्णत: लम्पट चरित्र के धनी हुसैन ने हिंदू देवियों का नग्न चित्रण किया था। याददाश्त में यह भी सुरक्षित है कि किसी भी कोर्ट ने आजम खान को यह हुक्म नहीं दिया था कि वे राष्ट्रगान या राष्ट्रगीत की प्रतियों का यहां-वहां वितरण करें। समाजवादी पार्टी के नेता खान ने सरेआम भारत माता को डायन कहा था।


यादों में यह भी सुरक्षित है कि न्याय व्यवस्था के किसी भी अंग ने ममता बनर्जी को दुर्गा सप्तशती या दुर्गा चालीसा की प्रतियां बांटने के लिए नहीं कहा, जिन्होंने लगातार पश्चिम बंगाल में दुर्गा प्रतिमाओं के विसर्जन में अड़ंगे लगाने की कोशिश की, और इसके लिए हर बार उन्हें अदालत में मुंह की खाना पड़ी। ऋचा ने जो किया, उसके सही-गलत का फैसला अदालत करेगी। मामला ऐसा ही चलता तो ठीक था, लेकिन यूं कुरान संबंधी आदेश देने की बात पर भाजपा की झारखंड इकाई द्वारा आश्चर्य जताने पर हैरत नहीं हो रही। क्या ऐसा इसलिए किया गया कि मामला किसी ऋचा का था? क्या इसकी वजह यह रही कि ऋचा की गिरफ्तारी के खिलाफ हिंदूवादी संगठन लामबंद हो गये ? जमानत पर तो कन्हैया कुमार, उमर खालिद और अनिर्बान भी हैं।


तीनों पर बेहद देशद्रोह का आरोप है। तो क्या ऐसा हुआ था कि कोर्ट ने जमानत के साथ यह शर्त लगायी थी कि ये तीनों देश के संविधान की पांच-पांच प्रतियां वितरित करेंगे? हार्दिक पटेल ने पुलिस वालों की जान लेने के लिए लोगों को उकसाया। उसकी जमानत के पहले ऐसा तो नहीं हुआ कि उसे भारतीय पुलिस की महानता से संबंधित किसी पुस्तिका को बांटने का निर्देश दिया गया हो। यकीनन किसी गलत के सुधार की कोशिश सराहनीय है। लेकिन ऐसा होने में निरपेक्षता नजर न आना अखरता है। पाकिस्तान बनने के बाद मोहनदास करमचंद गांधी ने सुधार के नाम पर हिंदुओं के साथ जो अनाचार किए, आजाद देश में आज भी रह-रहकर उनकी पुनरावृत्ति कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में देखने मिल रही है।


निश्चित ही किसी की धार्मिक भावनाओं का आहत करने की छूट किसी को नहीं दी जाना चाहिए, किंतु ऐसी सख्ती से पहले यह भी तो देखा जाए कि भावनाएं किसी समुदाय विशेष की ही नहीं होती हैं। वह उनकी भी होती हैं, जिनके आराध्य देवताओं के अस्तित्व पर ही सुप्रीम कोर्ट में सवालिया निशान लगा दिए जाते हैं। जिनके धार्मिक क्रियाकलापों को आहत करने का चलन जोरों पर है। जिनकी धार्मिक मान्यताओं को कट्टरता तथा रीति-रिवाजों को दकियानूसी बताने वालों की जमात को जमकर प्रश्रय मिल रहा है। यह बेहद दुर्भाग्य का विषय है कि इस देश में एक घोषित आतंकवादी की फांसी की सजा रुकवाने के लिए आधी रात को अदालत में सुनवाई हो जाती है, लेकिन एक मामले में अदालत से जमानत हासिल करने के बावजूद साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को चुनाव लड़ने से रोकने की कोशिशों पर कोई सवाल नहीं उठते हैं। यही वजह है कि किसी आपत्तिजनक कदम के बाद भी प्रज्ञा को समर्थन मिल रहा है। क्योंकि यह उस तबके का मामला है, जिसने खुद को देश में बहुसंख्यक होने के चलते लगातार उपेक्षित, प्रताड़ित, पीड़ित और अपमानित ही महसूस किया है। और देश में दक्षिणपंथ की जो राजनीतिक हवा बह रही है, उसके पीछे का मूल कारण भी शायद यही है।

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प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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