गद्दारों के ऐसे हश्र से आप क्यों डरें?



आपातकाल वाले दौर के आसपास की बात है। एक रोचक लतीफा पढ़ने में आया। एक व्यक्ति सड़क पर बड़बड़ाता हुआ चला जा रहा था, ‘सब साले बेईमान हैं। निकम्मे हैं। देश को खाये जा रहे हैं। इनका वश चले तो अपने स्वार्थ के लिए खून की नदियां भी बहा दें।’ पुलिस ने उसे पकड़ लिया। कहा कि वह सरकार के खिलाफ भड़काऊ बातें कर रहा है। हैरत से भरे आदमी ने कहा, ‘लेकिन मैं ने तो एक भी बार सरकार का जिक्र तक नहीं किया।’ पुलिस बोली, ‘फालतू बातें मत कर। जो-कुछ तू बोल रहा था, वह सरकार के अलावा और किसी के लिए बोला ही नहीं जा सकता है।’ तो बंधुवर, अनुराग ठाकुर के मुंह से निकली गोली वाली बात यदि गाली की तरह बतायी जा रही है, तो क्या हालात इस लतीफे जैसे ही नहीं हैं? केंद्रीय मंत्री ने कहा कि देश के गद्दारों को गोली मार दी जाना चाहिए। इस पर उफान मच रहा है


जिन लोगों ने जेएनयू के छात्र शरजील इमाम के भारत-विरोधी कथनों पर मुंह में दही जमा लिया था, वे अब पानी पी-पीकर ठाकुर को कोस रहे हैं। तो ऐसा करने वाले मेहरबानी करके यह भी तो बता दें कि देशद्रोहियों के साथ क्या व्यवहार किया जाना चाहिए। क्या उन्हें ‘गुमराह’ की संज्ञा देकर अरविंद केजरीवाल के पास सिलाई मशीन और नकद आर्थिक सहायता लेने के लिए भेज दें? या उन्हें शाहीन बाग में 500 रुपए की दिहाड़ी एवं मुफ्त बिरयानी का बकायदा निमंत्रण दे दिया जाए? विकल्प और भी हैं। देश के ऐसे गद्दारों को ममता बनर्जी के ममतामयी आंचल का सहारा दे दिया जाए। उन्हें कश्मीर में पांच-पांच सौ रुपए के लिए सुरक्षा बलों पर पत्थर बरसाने वाले समूहों में शामिल करवा दिया जाए। मैं इस बात से सहमत हूं कि किसी केंद्रीय मंत्री के मुंह से कानून हाथ में लेने जैसी बात कतई शोभा नहीं देती है।


लेकिन सीएए एवं एनआरसी के खिलाफ देश का माहौल इतना खराब कर दिया गया है कि उसके आगे गोली मार देने जैसी बात हतप्रभ नहीं करती है। और इस स्थिति के सर्वाधिक जिम्मेदार वह दोगले हैं (चाहें तो बेशक ‘दोमुंहे’ शब्द का प्रयोग भी कर लें) जो ऐसे माहौल के बीच अपनी बात रखने के लंपटमयी पैंतरे आजमा रहे हैं। सोशल मीडिया पर सीएए का खुलकर विरोध कर रहे कई लोग मेरे अच्छे मित्रों में शामिल हैं। उनकी हर पोस्ट में कहीं देश तो कहीं संविधान की चिंता करते हुए नये कानून को गलत करार दिया जाता है। इस तरह यह जताने का प्रयास किया जाता है कि सीएए का विरोध करना ही असली देशभक्ति है। लेकिन ऐसे लोगों में से करीब 99 प्रतिशत वे रहे, जिन्होंने शेष देश से असम को अलग कर देने की बात कहने वाले शरजील इमाम के कथन की निंदा करना तो दूर, उस पर टिप्पणी करना भी उचित नहीं समझा।


लेकिन अनुराग ठाकुर के कथन पर वे सभी पिल पड़े हैं। उसी देश और लोकतंत्र की दुहाई दे रही है, जिस मुल्क तथा गणतंत्र को इमाम ने खत्म कर देने जैसे जहरीले विचार उजागर किए थे। जाहिर है कि विचारकों की यह टोली बेहद सधे हुए एजेंडे के अनुरूप काम कर रही है। बहुत कुछ उस तरह, जिस तरह बिहार के गये विधानसभा चुनाव से ऐन पहले देश में अवार्ड वापसी गैंग सक्रिय हो गयी थी। पूरा उसी भांति, जिस भांति देश के खिलाफ षड़यंत्र रचने के दोषी याकूब मेमन की फांसी रुकवाने का प्रयास किया गया था। यदि आप एक विशेष किस्म का चश्मा उतारकर देखें तो पाएंगे कि ठाकुर का बयान प्रतिक्रियावाद का प्रतीक है। यह बरसात के बाद वाली धूप की तरह साफ है कि सीएए से देश के वास्तविक नागरिक मुसलमानों का तनिक भी अहित नहीं होना है।


किंतु इस कानून के खिलाफ यह प्रचार किया जा रहा है कि यह मुस्लिमों के विरोध में हैं। एनआरसी को मुस्लिमों के विरोध में चित्रित किया जा रहा है, जबकि हकीकत यह है कि इस व्यवस्था से देश में यहां का वास्तविक निवासी ही रह सकेगा। झूठ तथा भ्रम का ऐसा माहौल हर ओर खींच दिया गया है कि सारा देश एक बार फिर 1947 के विभाजन जैसी स्थिति में पहुंच गया दिखता है। ऐसी क्रियाओं की प्रतिक्रिया वही है, जो ठाकुर के कथन में दिखी। उसे और व्यापक स्तर पर देखना हो तो यह भी देख लें कि सोशल मीडिया पर आज अनगिनत पोस्ट ‘..गोली मारो सालों को’ वाली ही दिख रही हैं। ठाकुर का विरोध करने वाले यह तो बताएं कि उन्हें गद्दारों की इतनी चिंता क्यों हो रही है। केंद्रीय मंत्री ने तो देश के विरोधियों के ऐसे हश्र वाली बात कही है, तो उसे आप अपने ऊपर क्यों ले रहे हैं? क्यों आरंभ में बतायी गयी पुलिस जैसा आचरण करने पर आमादा हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि केंद्रीय मंत्री ने चोर की दाढ़ी में छिपा तिनका उठाकर सामने ला दिया है...!!!!!!!!!!!!!!


प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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