बेहद शोचनीय स्थिति



'मैं भी मर्यादा पुरुषोत्तम' की च्युइंग गम को आज भी खींचा जा सकता है। इमरती देवी ने पंद्रह महीने काबीना मंत्री के तौर पर कमलनाथ सरकार को नजदीक से देखा था। और नाथ को राजनीति में उनके आरोहण के समय से जानने वाले भी उनके बारे में कई तथ्य करीब से देखने की बात कहते हैं। तो इमरती ने कहा कि नाथ ने विधायकों को सरकार के प्रति वफादार बनाए रखने के लिए उन्हें हर महीने पांच-पांच लाख रुपए दिए थे। जो लोग कमलनाथ को जानते हैं, उनके लिए इमरती के इस दावे में चौंकाने जैसी कोई बात नहीं है। क्योंकि कमलनाथ भामाशाही छवि के भी धनी हमेशा से ही रहे हैं


और यह तथ्य भी किसी से नहीं छिपा है कि कमलनाथ की सरकार यदि अपने विधायकों को 'मासिक भुगतान' के आधार पर चली तो बसपा, सपा और निर्दलीय विधायकों को थामे रहने के लिए भी कैश या काइंड के रूप वाले कुछ 'द्विपक्षीय' समझौते जाहिर तौर पर किए ही गए होंगे। अब खुद को मर्यादा पुरुषोत्तम कहने वाले फिर सवालों के घेरे में हैं। कमलनाथ सरकार गिरने के शुरूआती दौर में सरकार के मैनेजरों ने तगड़ी लामबंदी कर उस समय भाजपा की तरफ पहुंच गए कांग्रेसी और बाकी विधायकों को वापस अपनी तरफ खींच लिया था। मगर उनमें से एक भी विधायक ने आज तक यह नहीं कहा कि भाजपा ने उन्हें पैसे देने की पेशकश की है।


जबकि कांग्रेस का आरोप था कि नाथ सरकार गिराने के लिए एक-एक विधायक को पच्चीस से पैंतीस करोड़ रुपए की पेशकश की गई इस खोखले दावे की बुनियाद उतनी ही कमजोर थी, जितनी आखिरकार कमलनाथ सरकार की नीव कमजोर साबित हुई। कल शिवराज सिंह चौहान ने जो कुछ कहा, उसमें दो बात तो सोलह आने सच हैं। पहली यह कि भाजपा ने शुरू में नाथ को हटाने में कोई रुचि नहीं ली थी, और दूसरी यह कि रणवीर जाटव सहित ढेर सारे विधायक वाकई अपनी ही सरकार से खफा चल रहे थे। ऐसे में गिर्राज दंडोतिया को सरकार गिराने का आॅफर देना कुछ असहज करने वाला मामला नहीं था।


क्योंकि पांच लाख की 'खैरात' के बाद कमलनाथ का विधायकों के लिए 'चलो-चलो' वाला अपमानजनक रवैया किसी से छिपा नहीं था। पद मिलने के बाद उसके दम्भ में ऐसा अमर्यादित आचरण करने के बाद कमलनाथ आज खुद को मयार्दा पुरुषोत्तम मान रहे हैं, तो फिर इस पर हंसना स्वाभाविक है। हां, शिवराज के कथन से आप यह कह सकते हैं कि जो बीजेपी अब तक यह कहती आ रही थी कि नाथ सरकार को उसके विधायकों ने गिराया, उसने यह भी मान लिया कि इस बारे में पहले ख्वाब ने शिवराज के दिमाग में ही अंगड़ाई ली थी। बाकी बुनावट इसी हिसाब से बेहद योजनाबद्ध तरीके से की गई।


लेकिन यह भी तो सोचना होगा कि शिवराज ने ऐसा उस चुनावी सभा में कहा, जिसमें बे-सिर-पैर की बात कहने का चलन कांग्रेस ने ही शुरू किया है। नाथ की टीम में 28 मंत्री थे. जबकि कांग्रेस के कुल 114 विधायक जीते थे। टेके-बल्ली की जरूरत पड़ी तो बसपा और सपा सहित बाहरी छह लोगों ने सरकार को समर्थन दे दिया। यानी इमरती देवी की बात माने तो कमलनाथ हर महीने 92 लोगों को यह रकम देते थे. यानी पन्द्रह महीने में नाथ ने सरकार बचाने के लिए 69 करोड़ रुपए खर्च कर दिए। यह रोचक आंकड़ा है। कांग्रेस के आरोप अगर सही हैं तो मानना पड़ेगा कि कमलनाथ ने सस्ते में सरकार चला ली है। इधर, कांग्रेस के विधायक सज्जन सिंह वर्मा को कैलाश विजयवर्गीय की सूरत में रावण दिखने लगा है। सत्ता की रतौंधी के शिकार का ऐसे दृष्टि भ्रम का शिकार हो जाना स्वाभाविक है। सब अपनी-अपनी तकलीफ के शिकार हैं। कोई चुन्नु है तो कोई मुन्नू है। कोई भी पूरी तरह भला-चंगा नजर नहीं आ रहा, बेहद शोचनीय हालात हैं। और अभी तो दो सप्ताह से ज्यादा का समय बाकी है, चुनाव भले ही अट्ठाईस सीटों पर हो रहे हैं लेकिन पूरे मध्यप्रदेश को इस बार हर चुनाव से अलग रंग नजर आएगा।


प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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