वक्त और दिग्विजय सिंह



चार दशक हो गये। सुनने में यकीनन लम्बा समय लगता है। लेकिन जब समय साथ-साथ चलता महसूस होने लगे तो लंबा समय भी अच्छा ही महसूस होता है। तो एक फिल्म थी, ‘उमंग।’ युवावस्था पर केंद्रित। उसका एक गीत याद आ गया। बोल थे, ‘सच्चा प्यार तो झुक नहीं सकता, दिल की उमंग ये कहती है...’ अब प्यार के अपने-अपने मायने होते हैं। निहितार्थ भी। यह भी याद रखें कि प्यार का सहचर्य नफरत वाला होता है। लिहाजा, उमंग सिंघार यदि किसी ओर सच्चे प्यार के न झुकने वाली बात कह रहे हैं तो फिर यह किसी के प्रति नासपंदगी का समानांतर परिचायक भी है। युवा उमंग जब बढ़ती है, तो सबसे पहले उसका प्रतिशोध (यह देश, काल और परिस्थिति पर कें द्रित होता है) भी प्यार के समानांतर प्रकट हो ही जाता है। कहा जाता है कि सूक्ष्मदर्शी के नीचे दही रखकर देखा जाए तो उबकाई आ जाती है


दही, शरीर के लिए सर्वोत्तम में से एक आहार होता है, किंतु उसके भीतर बिलबिलाते सूक्ष्म जीव देखने के बाद उसका सेवन कर पाना यकीनन कलेजे वाली बात होती है। पता नहीं, कमलनाथ ने अपनी सरकार में विवशता बनकर पनपे दही के इन सूक्ष्म जीवों का साक्षात्कार करने से क्यूं आंख मूंद ली, किंतु उन्हें सिंघार ने नंगी आंखों से न सिर्फ देखा, अपितु उनके इलाज का भी इंतजाम कर लिया है। फिर एक दूसरी फिल्म पर आयें। क्योंकि माजरा पूरा चलचित्र वाला ही है। मध्यप्रदेश की सरकार और कांग्रेस में मचे ताजा घमासान में मुझे 'वक्त' फिल्म का गाना याद आ गया है। प्रदेश के दस साल इकलौते कांग्रेसी मुख्यमंत्री रहे दिग्विजय सिंह आज  समय के दोनों पहलुओं में नजर आ रहे हैं। साहिर लुधियानवी ने जब इसे लिखा था, तो फिल्म में बलराज साहनी के कैरेक्टर के लिए लिखा था। लेकिन यह कालजयी है। सभी पर समान रूप से लागू हो सकता है। इस समय दिग्विजय सिंह पर मौजू है।


'वक्त से दिन और रात, वक्त से कल और आज। वक्त की हर शै गुलाम, वक्त का हर शै पे राज।' इसी गाने की दो और लाइने थीं। 'आदमी को चाहिए, वक्त से डरकर रहे, कौन जाने किस घड़ी वक्त का बदले मिजाज।' तो साहब मध्यप्रदेश कांग्रेस का ताजा एपिसोड बता रहा है कि वक्त अब दिग्विजय सिंह के साथ नहीं रहा। बताने और यथार्थपरक अहसास दिलाने के बीच वक्त शायद उमंग सिघार के साथ है। मुझे 1998 का वाकया याद है। दिग्विजय सिंह सर्वशक्तिमान थे। तब भी कांग्रेस का आलाकमान आज जैसा ही कमजोर था। तब भी सोनिया गांधी राजनीति में बस औपचारिक तौर पर आई हीं थी और नई-नई कांग्रेसाध्यक्ष बनी थीं। तब दिग्विजय सिंह मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री और जमुना देवी उनकी उप मुख्यमंत्री थीं। जमुना देवी अपने भतीजे उमंग सिधार के लिए गंधवानी से ही विधानसभा का टिकट चाहती थीं। बुजुर्ग आदिवासी नेता जमुना देवी ने लाख सर पटका लेकिन उमंग को टिकट नहीं मिला।


अब उमंग अगर आज खुल कर दिग्विजय सिंह की बुजुर्गियत को भूल कर सामने खड़े हैं तो मन की टीस कहीं तो उभर कर सामने आ ही रही है। संयोग देखिए, सोनिया फिर कांग्रेस की नई-नई बनी अंतरिम अध्यक्ष हैं। दिग्विजय सिंह के मुख्यमंत्री पद से हटने और जमुना देवी के नेता प्रतिपक्ष बनने के बाद उमंग ने धार लोकसभा से दो बार चुनाव लड़ा। दोनों बार कम अंतर से चुनाव हारे। 2008 से उमंग लगातार गंधवानी से तीसरी बार विधायक निर्वाचित हुए हैं। जाहिर है जब जमुना देवी नेता प्रतिपक्ष के तौर पर कांग्रेस उम्मीदवारों की सिलेक्शन कमेटी तक पहुंच सकी, तभी अपने भतीजे का उद्धार कर पार्इं। दिग्विजय सिंह का कद कभी इतना छोटा नहीं रहा। उन्होंने जब चाहा अपने भाई, भतीजे, बेटे या अपने किसी भी समर्थक को टिकट दिलाया। कभी किसी ने सवाल नहीं उठाए ना ही रोकने की कोशिश की। अब आप ताज्जुब कर सकते हैं कि कोई भाजपाई नहीं, उमंग सिधार ही खुल कर दिग्विजय सिंह पर गंभीर आरोप लगा रहे हं।


केवल आरोप ही नहीं लगा रहे, बाकायदा सोनिया गांधी को चिट्ठी भी लिख भेज रहे हैं। इस बात को ध्यान रखें कि आलाकमान से भयग्रस्त कांगे्रस में शीर्ष स्तर तक खतो-किताबत करना मामूली बात नहीं है। ऐसा वही कर सकता है जो कफन सिर पर पहन कर निकला हो। अंजाम से बेफिक्र हो। सच्चा प्यार कांग्रेस के लिए हो तो फिर कफन भी सेमल की रूई वाले तकिये जैसा सुखद अहसास देता है। उस तकिये पर सिर रखकर उमंग ने खुद की बजाय पार्टी और उसकी प्रदेश सरकार के लिए आवाज बुलंद की है। तकिये पर सिर रखने के बावजूद यह आवाज खर्राटे वाली नहीं है। यह वह ताकत रखती है, जो अपने नुकसान से बेपरवाह होकर नींद में सो रहे किसी को झकझोर कर जगा देने की ताकत रखती है। अब यह कांग्रेस पर है कि वह ताकत का सम्मान करे या ताकत के नाम पर व्यक्तिगत स्वार्थ से भरे किसी शख्स को ढोने का काम जारी रखे। राहुल गांधी ही अध्यक्ष बने रहते, तो यह सब लिखने का कोई मतलब नहीं था। हां, सोनियाजी से उम्मीद बाकी है। इसलिए आज कलम को तकलीफ देने में जरा भी बुरा नहीं लग रहा है। वैसे तो इस समय कांग्रेस का दिल्ली से भोपाल तक कोई माईबाप नजर ही नहीं आ रहा। आलाकमान भी तभी प्रभावी होता है न जब सत्ता की ताकत उसके पास हो। फिलहाल वहां शून्य है।

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प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर

प्रकाश भटनागर वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल तथा इंदौर से प्रकाशित एल एन स्टार दैनिक समाचार पत्र के संपादक है। यह कालम अखबार के प्रथम पृष्ठ पर पहले कालम में प्रकाशित होता है, उसी को हम वेबखबर में भी प्रकाशित करते हैं। प्रकाश पिछले तीन दशक से भोपाल के कई प्रमुख अखबारों, दैनिक देशबंधु रायपुर और भोपाल, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण सहित अन्य अखबारों में काम करते रहे हैं। लेखक अपनी तल्ख राजनीतिक टिप्णियों और विश्लेषण के कारण मध्यप्रदेश की पत्रकारिता में अपनी विशेष पहचान रखते हैं।



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